प्र1.
चलती जाऊँ बिना पाँव के / लंबे रास्ते खेत-गाँव के / ऊपर देखो चाँद सितारे / मुझमें चम-चम चमके सारे। / प्यास बुझाती, चलती जाती / जीवन देती, बढ़ती जाती / पर्वत से सागर तक देखो / मैं लहराती, बहती जाती।। — मैं कौन हूँ?
उत्तर
एक नदी। इस अध्याय में जो नदी बोल रही है, वह गोदावरी है।
पहेली की एक-एक पंक्ति फिर से पढ़िए। हर पंक्ति एक संकेत देती है।
| पंक्ति | यह क्या बताती है |
|---|---|
| “चलती जाऊँ बिना पाँव के” | बिना पैरों के चलना — जल बहता है। गोदावरी 1456 किलोमीटर चलती है। |
| “लंबे रास्ते खेत-गाँव के” | वह खेतों और गाँवों से होकर बहती है। |
| “ऊपर देखो चाँद सितारे, मुझमें चम-चम चमके सारे” | रात में भी वह रुकती नहीं; उसके जल में चाँद-तारों का प्रतिबिंब चमकता है। |
| “प्यास बुझाती, जीवन देती” | लोग उसका जल पीते हैं और किसान उससे फसल उगाते हैं। |
| “पर्वत से सागर तक” | पहाड़ से आरंभ और सागर पर समाप्ति — यही नदी की यात्रा है। |
उत्तर केवल नदी ही क्यों: बादल भी चलता है, पर वह भूमि पर प्यास नहीं बुझाता और न पर्वत से सागर तक जाता है। नहर मनुष्य बनाता है और वह पर्वत से नहीं निकलती। पहेली की चारों बातें केवल नदी पर ठीक बैठती हैं।
बोलने वाली से मिलिए: “मैं गोदावरी नदी हूँ। महाराष्ट्र के त्र्यंबकेश्वर में ऊँचाई पर स्थित पश्चिमी घाटों से मेरी यात्रा आरंभ होती है।” पूरा अध्याय उसी की अपनी कहानी है।