क्योंकि उस वर्ष चित्तप्पा का परिवार त्योहार के नए कपड़े नहीं खरीद सकता था, और परिवार में जो एक के पास होता है वह सबका होता है।
कहानी घटनाओं की कड़ी स्पष्ट रूप से बताती है —
चित्तप्पा की नौकरी छूट गई, चित्ती गृहिणी हैं → परिवार आर्थिक कठिनाइयों में था
अच्चम्मा ने शालिनी के पिता को यह बात बताई → बड़ों ने आपस में बात की
ओणम आ रहा था → त्योहार पर सबके लिए नए कपड़े होते हैं
इसलिए शालिनी के माता-पिता चित्तप्पा, चित्ती और चिन्नी के लिए भी कपड़े लाए
पैसा उतने में ही बाँटना पड़ा → शालिनी को रेशमी नहीं, सादे सूती कपड़े मिले
इस प्रश्न का उत्तर स्वयं अच्चम्मा के शब्दों में है — “परिवार में सभी एक-दूसरे की सहायता करते हैं और उनके पास जो कुछ भी है, उसे आपस में साझा करते हैं।”
यह केवल दयालुता से अधिक क्यों है: अध्याय पहले ही बता चुका है कि परिवार कौन-से मूल्य सिखाता है — दान, सेवा और त्याग। शालिनी के माता-पिता ने दान किया और शालिनी ने बिना कहे त्याग किया। यह भी देखिए कि यह किस तरह किया गया — किसी को छोटा महसूस नहीं होने दिया गया। कपड़े सबकी खरीददारी के साथ ही चुपचाप ले लिए गए, ताकि चित्तप्पा का परिवार त्योहार में बराबरी से सम्मिलित हो, दान लेने वाले की तरह नहीं। इसीलिए कहानी की अंतिम पंक्ति हानि की नहीं, खुशी की है — “उसे इस बात की खुशी थी कि सभी सदस्यों को नए कपड़े मिले।”