कवि हम सबको एक ही बगीचे के फूल कहता है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सुमन | फूल |
| उपवन | बगीचा, बाग़ |
अद्यतन2026-09-19
कवि हम सबको एक ही बगीचे के फूल कहता है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सुमन | फूल |
| उपवन | बगीचा, बाग़ |
सरल अर्थ: हम सबकी धरती एक ही है। हम सब इसी मिट्टी में जन्मे हैं। हम सब पर एक ही सूरज की धूप पड़ती है। हम सब एक ही जल से सींचे गए हैं।
कवि क्या चित्र बना रहा है: कवि हमें बगीचे के पौधे मान रहा है। एक ही क्यारी की मिट्टी, एक ही धूप और एक ही पानी — फिर भेद कैसा?
| कविता की बात | उसका अर्थ |
|---|---|
| एक धरती | हम सबका देश एक है |
| एक धूप | सूरज सबको बराबर मिलता है |
| एक जल | नदियों का पानी सबके लिए है |
कवि समझाना चाहता है कि हमारा अलग-अलग होना ही हमारी सुंदरता है।
सरल अर्थ: हम सबके रंग और रूप अलग-अलग हैं। हम अलग-अलग क्यारियों में खिले हैं। फिर भी बगीचे की सारी शोभा हम सबके मिलने से ही बनती है।
दोनों में सूरज की बात है, पर तरीका अलग है।
| पाठ ‘हमारा आदित्य’ | कविता ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ | |
|---|---|---|
| सूरज क्या है | एक तारा, जो बहुत गरम है | सबका साझा सूरज, जो सबके मन खिलाता है |
| बात कैसे कही गई | बातचीत (संवाद) के रूप में | कविता के रूप में |
| मुख्य बात | सूर्य के रहस्य और आदित्य-एल 1 | आपस में मिलकर रहना |
पंक्ति का सरल अर्थ: सूरज हम सबका एक ही है। उसकी किरणें हमारे हृदय (उर) की कली को खिला देती हैं, यानी मन को खुश कर देती हैं।
सीख यह है कि कठिनाइयों के बीच भी हँसते हुए जीना चाहिए।
सरल अर्थ: फूल काँटों के बीच खिलता है, फिर भी मुरझाता नहीं। वह हँसता हुआ खिला रहता है। हमें भी वैसे ही रहना चाहिए।
आगे कवि कहता है —
इसका अर्थ है — अलग-अलग फूल एक धागे में बँधकर सुंदर माला बन जाते हैं। इसी तरह हम सब मिलकर रहें तो देश की शोभा बनते हैं।
इस कविता के कवि हैं — द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी। उनका नाम कविता के अंत में छपा है।
तुक मिलने वाले शब्दों के जोड़े —
| जोड़ा | कविता की पंक्तियाँ |
|---|---|
| क्यारी – सारी | “अलग-अलग है क्यारी-क्यारी” / “है उपवन की शोभा सारी” |
| खिलातीं – नहलाती | “किरणें उर की कली खिलातीं” / “जिसकी हम सबको नहलाती” |
| सीखा – सीखा | “हँस-हँसकर है जीना सीखा” / “हार गले का बनना सीखा” |
| पवन के – गगन के – गुंजन के | हर अंतरा इन्हीं जैसे शब्दों पर समाप्त होता है |