प्र1.
छोटे-छोटे समूह बनाइए और किसी एक दुपट्टे अथवा स्कार्फ को सिर पर पहनने वाला परिधान बनाने में एक-दूसरे की सहायता कीजिए।
उत्तर
तीन-तीन के समूह बनाइए। एक पहनने वाला, एक बाँधने वाला, एक खुला सिरा पकड़ने वाला। लंबा दुपट्टा, स्टोल या बड़ा स्कार्फ काम आएगा। न कुछ काटना है न सिलना, इसलिए कपड़ा ख़राब नहीं होगा।
सरल साफा-शैली की पगड़ी:
- दुपट्टे को लंबाई में दो-तीन बार मोड़िए, जिससे एक हथेली चौड़ी लंबी पट्टी बन जाए।
- पट्टी का मध्य भाग पहनने वाले के माथे पर, भौंहों से ठीक ऊपर रखिए।
- दोनों सिरे कानों के ऊपर से पीछे ले जाइए, सिर के पीछे आड़े कीजिए और फिर सामने लाइए।
- अब उन्हें सिर पर बार-बार लपेटिए, हर लपेट पिछली लपेट से थोड़ी ऊपर, ताकि सुंदर शंकु बन जाए।
- अंतिम सिरा पीछे की किसी तह में मज़बूती से खोंस दीजिए। कुछ भी लटकना नहीं चाहिए।
- ऊपर से एक छोटा कोना निकालकर पंखे जैसा फैला दीजिए — जैसे राजस्थानी साफे की कलगी।
सरल टोपी-शैली: स्कार्फ को त्रिकोण में मोड़िए, लंबा किनारा माथे पर रखिए, दोनों कोने पीछे ले जाकर चपटी गाँठ लगाइए, और लटकता कोना गाँठ के नीचे खोंस दीजिए।
| यदि बार-बार खिसक जाए | क्या ठीक करें |
|---|---|
| पगड़ी ढीली हो जाती है | तहें अधिक चौड़ी थीं। पट्टी पतली बनाइए और हर लपेट को कसकर खींचिए। |
| बहुत ऊँची बैठती है और डगमगाती है | माथे से, नीचे से आरंभ कीजिए और पहली लपेट सपाट रखिए। |
| सिरा टिकता ही नहीं | उसे एक नहीं, दो तहों के नीचे खोंसिए। पीछे एक छोटी सेफ़्टी पिन लगाई जा सकती है। |
करने से क्या सीखा: पगड़ी केवल एक लंबा कपड़ा है — न सिलाई, न बटन। उसका पूरा आकार लपेटने के ढंग से बनता है। इसीलिए वही कपड़ा राजस्थान, पंजाब, कर्नाटक और महाराष्ट्र में अलग-अलग ढंग से बँधता है, और वहाँ के लोग एक नज़र में एक-दूसरे की बँधाई पहचान लेते हैं।
सावधानी और शिष्टाचार: किसी के सिर पर कुछ बाँधने से पहले अनुमति लीजिए। कुछ लोग सिर का परिधान अपनी आस्था के कारण पहनते हैं — वह वेशभूषा नहीं होता। सादे स्कार्फ से, सीखने की भावना से, एक-दूसरे पर अभ्यास कीजिए।