सांस्कृतिक मेला पूरे अध्याय को एक दोपहर में बदल देता है। इसे कैसे चलाएँ और कैसे अच्छे ढंग से समाप्त करें, यह रहा।
चरण 1 — समूह बनाइए और राज्य बाँटिए। चार-पाँच बच्चों के समूह। हर समूह एक कटोरी से एक राज्य या केंद्रशासित प्रदेश की पर्ची निकाले। उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और पूर्वोत्तर — सब आ जाएँ, इसका ध्यान रखिए।
चरण 2 — हर समूह अपने राज्य के लिए यह छह-खाने वाला चार्ट भरे।
चरण 3 — स्टॉल बनाइए। राज्य के रेखा-मानचित्र वाला पोस्टर। वेशभूषा के कटआउट। भोजन के चित्र या मिट्टी के छोटे मॉडल। उस राज्य की भाषा के दस शब्दों का चार्ट। कोई ढोल या ताल जो समूह बजाकर दिखा सके। चार्ट को तीन भागों में मोड़िए ताकि वह मेज़ पर स्वयं खड़ा रहे।
चरण 4 — मेला चलाइए। आधा समूह स्टॉल पर रहकर बताए, आधा दूसरे स्टॉल देखने जाए। फिर अदल-बदल कीजिए, ताकि सबको दोनों बारी मिलें। हर देखने वाले को एक पर्ची दीजिए, जिस पर वह हर स्टॉल से एक नई बात लिखे।
चरण 5 — अंतिम गोल घेरा। दोनों प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
आपने प्रत्येक राज्य में क्या अनूठी विशेषताएँ देखीं?
नमूना उत्तर: हर स्टॉल पर कुछ ऐसा था जो और कहीं नहीं था। केरल में नौका दौड़ और केले के पत्ते पर परोसा भोजन था। राजस्थान में रेगिस्तान, कठपुतली का खेल और चटख साफा था। असम में एक सींग वाला गैंडा और चाय के बगान थे। नगालैंड में हॉर्नबिल महोत्सव और ऐसा बुना शॉल था जिसका नमूना ही बता देता है कि पहनने वाला कौन है। कश्मीर में शिकारा और इतना महीन शॉल था कि अँगूठी से निकल जाए। तमिलनाडु में मंदिर का गोपुरम और सुबह द्वार पर बनी कोलम थी।
आपने कौन-सी समानताएँ या साझा मूल्य देखे?
नमूना उत्तर: ऊपर से अलग दिखने वाले ये स्टॉल भीतर से आश्चर्यजनक रूप से एक जैसे थे।
- हर राज्य में फ़सल का पर्व था — बैसाखी, बिहू, ओणम, पोंगल, नुआखाई, लोहड़ी। नाम अलग, पर फ़सल के लिए वही धन्यवाद।
- हर राज्य अतिथि का स्वागत भोजन से करता है। व्यंजन बदलता है, स्वागत नहीं।
- हर राज्य के पास अपना नृत्य और अपना ढोल है, और विवाह तथा पर्वों पर उनका उपयोग होता है।
- हर राज्य अपनी नदियों, पहाड़ों और पेड़ों का सम्मान अपने गीतों और कथाओं में करता है।
- हर राज्य बड़ों और शिक्षकों का आदर करता है, और उसके अभिवादन का अपना ढंग है।
- हर राज्य में हाथ से बना कोई शिल्प है, जो माता-पिता से बच्चों को मिलता आया है।
यह मेला वास्तव में क्या सिखाता है: केवल ऊपर से देखिए तो भारत अनेक अलग-अलग देशों जैसा लगता है — अलग कपड़े, अलग भोजन, अलग लिपियाँ। थोड़ा भीतर देखिए तो हर जगह वही कुछ बातें मिलती हैं — फ़सल के लिए धन्यवाद, अतिथि का स्वागत, बड़ों का आदर, संगीत से प्रेम, भूमि की देखभाल। ये साझी बातें धागा हैं; भिन्नताएँ रंग हैं। दोनों मिलकर एक सशक्त, जीवंत वस्त्र बुनते हैं। अध्याय जिसे वसुधैव कुटुम्बकम् कहता है, वह यही है — सारा संसार एक परिवार।
मेले के बाद इसे सँभालकर रखिए: सब समूहों के छह-खाने वाले चार्ट एक साथ बाँधकर एक पुस्तक बना लीजिए और कक्षा के पुस्तकालय में रखिए। अगले वर्ष उसमें और जोड़िए। कुछ वर्षों में आपके विद्यालय के पास बच्चों का बनाया भारत का अपना एटलस होगा।