कक्षा ५ हमारा अद्भुत संसार अध्याय 5 लिखिए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
आप किन पारंपरिक भारतीय वाद्ययंत्रों के विषय में जानते हैं?
उत्तर

भारतीय वाद्ययंत्रों को चार सरल समूहों में बाँटा जा सकता है — जिन्हें पीटते हैं, जिनमें फूँकते हैं, जिनमें तार होते हैं, और जिन्हें बजाकर या टकराकर बजाया जाता है।

समूहवाद्ययंत्रआपने कहाँ सुना होगा
ढोल — जिन्हें पीटते हैंतबला, ढोलक, ढोल, मृदंग, पखावज, नगाड़ा, खोल, थविल, इडक्का, ढमा, खंजीरापृष्ठ 88 के चित्र में यही ग्यारह ढोल हैं
फूँक वालेबाँसुरी, शहनाई, नादस्वरम्, पुंगी, बीनविवाह में शहनाई; फ़िल्मी गीतों में बाँसुरी
तार वालेसितार, वीणा, सरोद, संतूर, सारंगी, इकतारा, तानपूरा, दिलरुबाहिंदुस्तानी संगीत में सितार; कर्नाटक-संगीत में वीणा
टकराकर या हिलाकर बजने वालेमंजीरा, घुँघरू, घटम् (मिट्टी का घड़ा), चिमटा, करतालभजन में मंजीरा; कथक नर्तक के पैरों में घुँघरू

पुस्तक में बताई गई दो संगीत परंपराएँ:

कर्नाटक संगीत (दक्षिण भारत) — मृदंग, वीणा, नादस्वरम्, घटम्, खंजीरा
हिंदुस्तानी संगीत (उत्तर भारत) — सितार, शहनाई, तबला, सरोद, सारंगी, पखावज
एक ढोल दूसरे जैसा क्यों नहीं होता: ढोल उसी सामग्री से बनता है जो उस जगह मिलती है — शरीर के लिए लकड़ी, मिट्टी या धातु; ऊपर के लिए चमड़ा; कसने के लिए रस्सी या चमड़े की डोरी। आकार, लकड़ी और कसाव बदलते ही ध्वनि पूरी तरह बदल जाती है। इसीलिए तमिलनाडु का थविल, असम का खोल और पंजाब का ढोल — तीनों ढोल होते हुए भी अलग-अलग सुनाई देते हैं।
अपने क्षेत्र के बारे में लिखिए: वही वाद्ययंत्र लिखिए जो आपने सचमुच सुने हैं — विवाह में, मंदिर या मस्जिद में, गाँव के मेले में, विद्यालय के कार्यक्रम में। ये पुस्तक के प्रसिद्ध नामों से अधिक महत्व रखते हैं।
प्र2.
स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री से एक वाद्ययंत्र बनाने का प्रयास कीजिए।
उत्तर

हर वाद्ययंत्र तीन में से किसी एक ढंग से बजता है — कुछ तानकर पीटा जाता है, कुछ तानकर छेड़ा जाता है, या किसी नली के भीतर की हवा को हिलाया जाता है। तीनों बना लीजिए, तो सब समझ में आ जाएगा।

1. ढोल (छोटा ढोलक)

  1. खाली टिन या ऊपर से कटी प्लास्टिक की बाल्टी लीजिए।
  2. मोटे गुब्बारे या पुरानी ट्यूब से मुँह से थोड़ा बड़ा गोल टुकड़ा काटिए।
  3. उसे मुँह पर कसकर तानिए और मज़बूत डोरी या रबर के छल्ले से बाँध दीजिए।
  4. अँगुलियों से थपकिए। फिर डोरी और कसकर थपकिए — ध्वनि ऊँची हो जाएगी।

2. तार वाला यंत्र (एक तार का इकतारा)

  1. मज़बूत गत्ते का डिब्बा या ऊपर से खुला टिन लीजिए।
  2. खुले मुँह पर अलग-अलग मोटाई के दो-तीन रबर बैंड तान दीजिए।
  3. दोनों सिरों के पास बैंडों के नीचे एक-एक पेंसिल फँसा दीजिए, ताकि वे डिब्बे से ऊपर उठ जाएँ।
  4. अब उन्हें छेड़िए। पतला बैंड ऊँची और मोटा बैंड नीची ध्वनि देगा।

3. फूँक वाला यंत्र (स्ट्रॉ की शहनाई)

  1. पीने वाले स्ट्रॉ का एक सिरा चपटा करके पतले V आकार में काटिए।
  2. वही सिरा होंठों में हल्के से दबाकर ज़ोर से फूँकिए। वह भिनभिनाएगा।
  3. फूँकते-फूँकते स्ट्रॉ को थोड़ा-थोड़ा काटते जाइए। हर बार स्वर ऊँचा होता जाएगा।
आपने जो बनायाध्वनि किससे बनती हैस्वर कैसे बदलें
टिन का ढोलतनी हुई रबर काँपती हैअधिक कसने पर ऊँचा, ढीला करने पर नीचा स्वर
रबर बैंड का इकतारातना हुआ बैंड काँपता हैपतला या अधिक तना बैंड ऊँचा स्वर देता है
स्ट्रॉ की शहनाईस्ट्रॉ के भीतर की हवा काँपती हैछोटा स्ट्रॉ ऊँचा स्वर देता है
बोतल जलतरंगपानी के ऊपर की हवा काँपती हैबोतल में अधिक पानी हो तो स्वर नीचा
इन सबके पीछे एक ही नियम: ध्वनि तब बनती है जब कोई वस्तु तेज़ी से काँपती है — ढोल का चमड़ा, रबर बैंड, नली की हवा। जितनी तेज़ी से काँपेगी, स्वर उतना ऊँचा होगा। छोटी, कसी और नाटी चीज़ें तेज़ी से काँपती हैं, इसलिए ऊँचा स्वर देती हैं। बड़ी, ढीली और लंबी चीज़ें धीरे काँपती हैं, इसलिए नीचा स्वर देती हैं।
मिलकर बजाइए: ढोल, इकतारा और स्ट्रॉ लेकर तीन बच्चे एक मंडली बन जाते हैं। पहले ढोल पर एक स्थिर ताल रखिए, फिर बाकी उसी ताल पर जुड़ें। असली मंडली भी ऐसे ही आरंभ करती है।
क्या यह उपयोगी रहा?