प्र1.
आप किन पारंपरिक भारतीय वाद्ययंत्रों के विषय में जानते हैं?
उत्तर
भारतीय वाद्ययंत्रों को चार सरल समूहों में बाँटा जा सकता है — जिन्हें पीटते हैं, जिनमें फूँकते हैं, जिनमें तार होते हैं, और जिन्हें बजाकर या टकराकर बजाया जाता है।
| समूह | वाद्ययंत्र | आपने कहाँ सुना होगा |
|---|---|---|
| ढोल — जिन्हें पीटते हैं | तबला, ढोलक, ढोल, मृदंग, पखावज, नगाड़ा, खोल, थविल, इडक्का, ढमा, खंजीरा | पृष्ठ 88 के चित्र में यही ग्यारह ढोल हैं |
| फूँक वाले | बाँसुरी, शहनाई, नादस्वरम्, पुंगी, बीन | विवाह में शहनाई; फ़िल्मी गीतों में बाँसुरी |
| तार वाले | सितार, वीणा, सरोद, संतूर, सारंगी, इकतारा, तानपूरा, दिलरुबा | हिंदुस्तानी संगीत में सितार; कर्नाटक-संगीत में वीणा |
| टकराकर या हिलाकर बजने वाले | मंजीरा, घुँघरू, घटम् (मिट्टी का घड़ा), चिमटा, करताल | भजन में मंजीरा; कथक नर्तक के पैरों में घुँघरू |
पुस्तक में बताई गई दो संगीत परंपराएँ:
कर्नाटक संगीत (दक्षिण भारत) — मृदंग, वीणा, नादस्वरम्, घटम्, खंजीरा
हिंदुस्तानी संगीत (उत्तर भारत) — सितार, शहनाई, तबला, सरोद, सारंगी, पखावज
हिंदुस्तानी संगीत (उत्तर भारत) — सितार, शहनाई, तबला, सरोद, सारंगी, पखावज
एक ढोल दूसरे जैसा क्यों नहीं होता: ढोल उसी सामग्री से बनता है जो उस जगह मिलती है — शरीर के लिए लकड़ी, मिट्टी या धातु; ऊपर के लिए चमड़ा; कसने के लिए रस्सी या चमड़े की डोरी। आकार, लकड़ी और कसाव बदलते ही ध्वनि पूरी तरह बदल जाती है। इसीलिए तमिलनाडु का थविल, असम का खोल और पंजाब का ढोल — तीनों ढोल होते हुए भी अलग-अलग सुनाई देते हैं।
अपने क्षेत्र के बारे में लिखिए: वही वाद्ययंत्र लिखिए जो आपने सचमुच सुने हैं — विवाह में, मंदिर या मस्जिद में, गाँव के मेले में, विद्यालय के कार्यक्रम में। ये पुस्तक के प्रसिद्ध नामों से अधिक महत्व रखते हैं।