प्र1.
किसी समाचार-पत्र का या पुराने कागज का एक आयताकार टुकड़ा लीजिए और उसे एक पतली नली के चारों ओर घुमाकर लपेटिए। किनारों को गोंद से चिपका दीजिए जिससे वह खुले नहीं। फिर उसे एक सपाट सतह पर सीधा खड़ा कर दीजिए। क्या वह खड़ा रहता है?
उत्तर
नहीं। सादी कागज की नली खड़ी नहीं रहती। वह डगमगाकर तुरंत गिर जाती है।
क्या करना है, चरण-दर-चरण।
- पुराने समाचार-पत्र का एक आयताकार टुकड़ा लीजिए।
- उसे एक लंबे किनारे से कसकर लपेटकर अपने अँगूठे जितनी मोटी पतली नली बनाइए।
- खुले किनारे पर गोंद लगाकर दबा दीजिए। एक मिनट सूखने दीजिए, जिससे नली फिर न खुले।
- नली को मेज़ पर एक सिरे के बल सीधा खड़ा कीजिए।
- अब धीरे से हाथ हटाइए और देखिए।
आप क्या देखेंगे। हाथ हटाते ही नली एक ओर झुकती है और चपटी होकर गिर जाती है। यदि किसी तरह एक क्षण के लिए संतुलन बन भी जाए, तो हवा का एक झोंका या मेज़ का हल्का-सा हिलना उसे गिरा देता है।
यह क्यों गिरती है: नली का निचला सिरा मेज़ को केवल एक बहुत छोटे-से गोले में छूता है। जो वस्तु ऊँची हो और बहुत छोटे स्थान पर टिकी हो, वह आसानी से लुढ़क जाती है। ज़रा-सा झुकते ही उसका भार उस छोटे गोले से बाहर चला जाता है, और वह गिरती चली जाती है। ठीक यही किसी ऊँचे वृक्ष के साथ होता, यदि उसका तना पतला होता और जड़ें फैली हुई न होतीं।
परीक्षण ईमानदारी से कीजिए: नली को किसी खाँचे में मत दबाइए और न किसी पुस्तक के सहारे टिकाइए। उसे समतल सतह पर स्वतंत्र खड़ा कीजिए। परीक्षण का यही अर्थ है।