आप क्या पाएँगे: पृथ्वी बना विद्यार्थी हर चक्कर के ठीक आधे समय तक “दिन” कहता है और आधे समय तक “रात” — और उसे कोई बताता भी नहीं कि कब बदलना है। ‘सूर्य’ बना विद्यार्थी बिलकुल नहीं हिलता, फिर भी दिन और रात एक के बाद एक आते रहते हैं।
खेल कैसे खेलें —
- कक्षा में जगह बनाइए या मैदान में चले जाइए।
- एक विद्यार्थी बीच में स्थिर खड़ा हो। यही सूर्य है। सूर्य को न हिलना है, न घूमना है।
- दूसरा विद्यार्थी लगभग चार कदम दूर सूर्य की ओर मुँह करके खड़ा हो। यही पृथ्वी है।
- अब पृथ्वी अपनी जगह पर धीरे-धीरे घूमे — लट्टू की तरह, बिना कहीं चले। इसी को घूर्णन कहते हैं।
- पृथ्वी को सदा सीधे सामने ही देखना है; गर्दन घुमाकर सूर्य को नहीं झाँकना है। पूरी बात इसी पर टिकी है।
- जब तक सूर्य सामने दिखाई देता रहे, पृथ्वी कहती रहे — “दिन… दिन… दिन”।
- जैसे ही सूर्य दिखना बंद हो, वह कहने लगे — “रात… रात… रात”।
- शेष कक्षा चक्कर गिने और ध्यान दे कि शब्द कब बदलता है।
| ‘पृथ्वी’ कितना घूम चुकी है | क्या ‘सूर्य’ दिखाई देता है? | विद्यार्थी क्या कहता है |
|---|---|---|
| सूर्य के ठीक सामने | हाँ, बिलकुल सामने | दिन (यह मध्याह्न जैसा है) |
| चौथाई चक्कर घूमने पर | केवल आँख के कोने में | दिन, पर समाप्त होता हुआ — सूर्यास्त जैसा |
| सूर्य की ओर पीठ करके | नहीं | रात (यह अर्धरात्रि जैसा है) |
| तीन-चौथाई चक्कर घूमने पर | फिर दिखने लगता है | दिन आरंभ — सूर्योदय जैसा |