यह आपके अपने घर से जुड़ा प्रश्न है, इसलिए इसका उत्तर हर विद्यार्थी का अलग होगा। पहले यह समझ लीजिए कि प्यार के नाम बनते कैसे हैं —
| बनने का ढंग | उदाहरण |
|---|---|
| असली नाम को छोटा कर देना | सुरेंद्र → सुरी; कविता → कवि; अभिषेक → अभि; रुक्मिणी → रुक्मी |
| नाम को दुहरा देना | मीना → मीनू-मीनू; गोलू-मोलू; टीना-मीना |
| रिश्ते का ही प्यार-भरा रूप | बेटी → बिटिया, बिट्टो, बिटिया रानी; बेटा → बेटवा, बबुआ, लल्ला |
| गुण या आदत से बना नाम | गोलू (गोल-मटोल), चीकू, लाडो, राजा बेटा, नन्ही |
| अपनी बोली का शब्द | भोजपुरी में ‘बबुनी’, अवधी में ‘गुड्डो’, मराठी में ‘बाळ’, बांग्ला में ‘खोका/खुकी’, असमिया में ‘बापु/माजोनी’ |
नमूना उत्तर:
“मेरा नाम अनुराधा है, पर घर पर मुझे कोई इस नाम से नहीं बुलाता। माँ मुझे ‘अनु’ कहती हैं और जब बहुत प्यार आता है तो ‘बिटिया रानी’। पापा मुझे ‘गुड़िया’ कहते हैं। दादी मुझे अपनी बोली में ‘लाडो’ पुकारती हैं, और मेरा छोटा भाई मुझे ‘दीदू’ कहता है। मुझे ‘लाडो’ सबसे अच्छा लगता है, क्योंकि यह नाम केवल दादी के मुँह से निकलता है और इसे सुनते ही लगता है कि कोई मुझे बहुत चाहता है।”