मल्हार अध्याय 8 तीन बिहू

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) एंजेला और उसकी माँ एलेसेंड्रा कौन-से बिहू के अवसर पर भारत आए थे? लिखिए।
उत्तर

वे रोंगाली या बोहाग बिहू के अवसर पर भारत आए थे — वही बिहू जो बैसाख में, यानी सामान्यतया अप्रैल में मनाया जाता है।

तीन प्रमाण, तीनों पाठ से —

  • महीना — “वे जब यहाँ आ रहे थे तब अप्रैल का महीना चल रहा था।” और पुस्तक की तालिका कहती है कि रोंगाली या बोहाग बिहू “बैसाख, सामान्यतया अप्रैल में” पड़ता है।
  • नया साल — “असम में यह नए साल का वक्त होता है।” मिलान वाली गतिविधि में भी बोहाग बिहू की पहचान यही दी गई है — “असम में नए साल की शुरुआत और बसंत के आगमन का प्रतीक है।”
  • ऋतु — “बसंत के आने की खुशी में वे सभी एक त्योहार मनाते हैं” और “वह मंत्रमुग्ध होकर वहाँ लड़के-लड़कियों को बसंत ऋतु के आगमन पर नृत्य करते देख रही थी।”

एक और सुराग़ यह भी है कि एंजेला की बसंत की छुट्टियाँ चल रही थीं, जिन्हें माँ ने एक हफ़्ते और बढ़वाया था। यानी यात्रा बसंत में ही हुई।

तीनों नाम याद रखने का तरीक़ा: हर बिहू के दो नाम हैं — एक भाव बताता है और एक महीना। रोंगाली (रंग) = बोहाग (बैसाख); भोगाली (भोग यानी खाना-पीना) = माघ; कोंगाली (कंगाल यानी अभाव) = काटी (कार्तिक)। नाम में ही त्योहार का मिज़ाज छिपा है।
प्र2.
(ख) तीनों बिहू के लिए लिखिए कि उस समय किसान खेतों में क्या कर रहे होते हैं?
उत्तर

पाठ में इसका सूत्र स्वयं दे दिया गया है —

“असम में बिहू साल में तीन बार मनाया जाता है।
सबसे पहले जब किसान बीज बोते हैं, फिर जब वे धान रोपते हैं
और फिर तब, जब खेतों में अनाज तैयार हो जाता है।”

इसी सूत्र को पुस्तक की तालिका के तीन महीनों पर बिठाइए —

बिहूमहीनाउस समय किसान खेतों में क्या कर रहे होते हैं
रोंगाली या बोहागबैसाख — सामान्यतया अप्रैलयह खेती के नए वर्ष की शुरुआत है। किसान खेत जोतकर तैयार कर रहे होते हैं और बीज बो रहे होते हैं। इसीलिए यह सबसे रंगीन और उत्साह से भरा बिहू है — काम शुरू करने की खुशी का त्योहार।
कोंगाली या काटीकार्तिक — सामान्यतया अक्तूबरधान के पौधे खेतों में खड़े होकर बढ़ रहे होते हैं, पर फ़सल अभी कटी नहीं होती। घर के भंडार लगभग ख़ाली होते हैं। किसान खेतों की रखवाली और देखभाल करते हैं और फ़सल की सलामती के लिए तुलसी के पौधे के पास दीप जलाते हैं। इसीलिए यह सबसे सादा बिहू है।
भोगाली या माघमाघ — सामान्यतया जनवरीफ़सल कट चुकी होती है और अनाज घर आ चुका होता है। खेत का बड़ा काम पूरा है, इसलिए किसान खेतों में विश्राम और साझा भोज करते हैं। इसीलिए इसे भोगाली — यानी भोग यानी खाने-पीने वाला बिहू — कहते हैं।
तीनों नामों का मतलब यहीं खुल जाता है: जब खेत में काम शुरू हो — रंग (रोंगाली); जब खेत में फ़सल खड़ी हो और घर ख़ाली — कंगाली (कोंगाली); जब अनाज घर आ जाए — भोग (भोगाली)। यानी असम का किसान अपने खेत की हालत के हिसाब से त्योहार का मिज़ाज तय करता है। यही ‘बिहू एक कृषि आधारित त्योहार है’ का असली अर्थ है।
ध्यान दीजिए: पाठ ने तीन काम गिनाए हैं — बीज बोना, धान रोपना, अनाज तैयार होना। बीज बोना बोहाग में होता है और अनाज तैयार होकर घर आना माघ तक पूरा हो जाता है; धान की रोपाई इन दोनों के बीच के महीनों में होती है, और काटी बिहू तक वही रोपा हुआ धान खेत में लहलहा रहा होता है।
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