कुर्सी बनाने के लिए लकड़ी की लागत ₹600 है, तो शेष राशि ₹400 (₹1000–₹600) किसके लिए है?
उत्तर
यह ₹400 राजेश के कार्य का मौद्रिक मूल्य है — “यह राजेश के कौशल, समय और प्रयास का मौद्रिक मूल्य है जो उन्हें उस कुर्सी को बनाने में लगा था।” उन्हें यह ₹400 कहीं से मिले नहीं; उन्होंने साधारण लकड़ी को ऐसी कुर्सी में बदलकर इसे उत्पन्न किया जिस पर कोई बैठना चाहे। पुस्तक इसी को मूल्य संवर्धन कहती है।
कुर्सी का विक्रय मूल्य = ₹1000 खरीदी गई लकड़ी की लागत = ₹600 राजेश द्वारा जोड़ा गया मूल्य = ₹1000 − ₹600 = ₹400
₹1000 − ₹600 = ₹400। यह अंतर किसी से छीना गया लाभ नहीं है — यह उस कार्य का मूल्य है जिसने लकड़ी के ढेर को कुर्सी बना दिया।
ग्राहक यह ₹400 प्रसन्नता से क्यों देता है: ₹600 की बिखरी लकड़ी पर कोई बैठना नहीं चाहता। ग्राहक के लिए कुर्सी का मूल्य लकड़ी से कहीं अधिक है, और यह पूरी वृद्धि राजेश के हाथों से आई है। पृष्ठ 189 का यही आशय है कि आर्थिक गतिविधियों से “किसी वस्तु के अन्य रूपों में रूपांतरण की प्रक्रिया के प्रत्येक चरण पर उसके मूल्य में भी वृद्धि होती है।” यही आपके चारों ओर होता है — कपास से धागा, धागे से कपड़ा, कपड़े से अनु के माता-पिता की दुकान की कमीज, और हर जोड़ी हाथ कुछ मूल्य जोड़ती जाती है।
सावधान: यह ₹400 जोड़ा गया मूल्य है, राजेश का शुद्ध लाभ नहीं। इसी में से उन्हें “विशेष प्रकार के उपकरणों” और अन्य सामग्री का व्यय भी निकालना है — कील, गोंद, पॉलिश, गद्दी — तथा आरी और कार्यशाला की टूट-फूट भी। इन सबके बाद जो बचे, वही उनकी वास्तविक कमाई है। अत: “राजेश को ₹400 का लाभ हुआ” मत लिखिए; लिखिए कि “राजेश ने ₹400 का मूल्य संवर्धन किया, जिसमें सामग्री का व्यय तथा उनके कौशल, समय और प्रयास का मूल्य दोनों सम्मिलित हैं”।
स्वयं जाँचिए: यदि उस कुर्सी पर राजेश के उपकरण, कील और पॉलिश का व्यय ₹150 हो, तो उनके कौशल, समय और प्रयास के लिए कितना बचा? ₹400 − ₹150 = ₹250। और यदि वे सप्ताह में ऐसी 4 कुर्सियाँ बनाते हैं, तो उस सप्ताह का मूल्य संवर्धन = 4 × ₹400 = ₹1600।
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