आर्थिक गतिविधियों को किस प्रकार वर्गीकृत किया जाता है?
उत्तर
आर्थिक गतिविधियों को तीन आर्थिक क्षेत्रकों में वर्गीकृत किया जाता है — प्राथमिक क्षेत्रक, द्वितीयक क्षेत्रक और तृतीयक क्षेत्रक। पृष्ठ 196 इसका आधार बताता है — “कुछ आर्थिक गतिविधियों में समान विशेषताएँ होती हैं और इनके आधार पर इन्हें एक व्यापक समूह में वर्गीकृत किया जा सकता है, जिन्हें आर्थिक क्षेत्रक कहते हैं। प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक तीन प्रकार के मुख्य आर्थिक क्षेत्रक हैं।”
प्राथमिक — कच्चा माल सीधे प्रकृति से लिया जाता है द्वितीयक — उसी कच्चे माल को रूपांतरित करके नई वस्तु बनाई जाती है तृतीयक — इन दोनों को सहारा देने वाली सेवाएँ दी जाती हैं
भारतीय अर्थव्यवस्था के तीन क्षेत्रक, प्रत्येक में वास्तविक उदाहरणों के साथ। तृतीयक क्षेत्रक नीचे इसलिए दिखाया गया है क्योंकि उसकी सेवाएँ तीनों को छूती हैं।
वर्गीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी। पृष्ठ 196 बताता है कि पहले के समय में लोग मुख्यत: “कृषि, पशुपालन, औजारों का निर्माण, मिट्टी के बर्तन बनाना और कपड़े बुनना” जैसी गतिविधियों में लगे थे। आज लोग कंप्यूटर, मोबाइल फोन और ड्रोन बनाते हैं; बैंक, विद्यालय और होटल में कार्य करते हैं; वाहन चलाते हैं; फर्नीचर बनाते हैं; मशीन से कपड़े सिलते हैं; सॉफ्टवेयर बनाते हैं और रेफ्रिजरेटर तथा वॉशिंग मशीन की मरम्मत करते हैं। इतनी विविधता में “इन सभी गतिविधियों के वर्गीकरण से हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि ये कैसे कार्य करती हैं और इनके मध्य क्या संबंध है।”
सुझाव: तृतीयक क्षेत्रक को सेवा क्षेत्रक भी कहते हैं, क्योंकि इसमें वस्तु नहीं, सेवा तैयार होती है। यदि उत्पाद को उठाकर घर नहीं ले जाया जा सकता, तो वह प्राय: तृतीयक ही होता है।
प्र2.
विभिन्न आर्थिक गतिविधियों को क्षेत्रकों (सेक्टरों) में समूहबद्ध करने का क्या आधार है?
उत्तर
आधार यह है कि प्रत्येक गतिविधि प्रकृति के कच्चे माल के साथ क्या करती है। केवल एक प्रश्न — सामग्री कहाँ से आई और यह गतिविधि उसका क्या करती है? — हर गतिविधि को उसका सही क्षेत्रक दे देता है।
क्षेत्रक
गतिविधि क्या करती है
पुस्तक की परिभाषा
भारतीय उदाहरण, चरण दर चरण
प्राथमिक
कच्चा माल सीधे प्रकृति से लेती है। कुछ बनाया नहीं जाता — उगाया, पकड़ा, खोदा या पाला जाता है
“जिन आर्थिक गतिविधियों में लोग प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं के उत्पादन के लिए प्रकृति पर निर्भर रहते हैं” (पृष्ठ 196)
विदर्भ का किसान अपने खेत से कपास चुनता है
द्वितीयक
उसी कच्चे माल का रूप बदलकर नई और अधिक उपयोगी वस्तु बनाती है
“जिनमें लोग प्राथमिक क्षेत्रक पर आधारित वस्तुओं को रूपांतरित करके अन्य वस्तु का उत्पादन करते हैं” (पृष्ठ 199)
कोयंबटूर की मिल कपास से सूत कातती है, कपड़ा बुनती है और तिरुप्पूर की इकाई टी-शर्ट सिलती है
तृतीयक
कोई वस्तु नहीं बनाती। यह वह सेवा देती है जिसके बिना शेष दोनों क्षेत्रक चल ही नहीं सकते
वे गतिविधियाँ “जो प्राथमिक और द्वितीयक गतिविधियों में सम्मिलित लोगों को सहायता प्रदान करती हैं” (पृष्ठ 200)
ट्रक टी-शर्ट ढोता है, बैंक इकाई को ऋण देता है, दुकानदार कमीज आपको बेचता है
परीक्षा में काम आने वाली तीन कसौटियाँ।
क्या प्रकृति सीधे आपूर्तिकर्ता है? यदि कार्य मिट्टी, जल, वन, खदान या पशु से जुड़ा है तो वह प्राथमिक है — धान की रोपाई, केरल में रबड़ का दोहन, बैलाडीला में लौह अयस्क का खनन, राजस्थान में भेड़ पालन।
क्या सामग्री का रूप बदला? गन्ना प्राथमिक है, किंतु कोल्हापुर की मिल में उससे बनी चीनी द्वितीयक है। लौह अयस्क प्राथमिक है, भिलाई का इस्पात द्वितीयक। पुस्तक निर्माण तथा पानी, बिजली और गैस की आपूर्ति को भी यहीं रखती है।
क्या उत्पाद वस्तु नहीं, सेवा है? तब वह तृतीयक है — परिवहन, व्यापार, बैंकिंग, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षण, मरम्मत, भंडारण, बीमा, सॉफ्टवेयर।
एक ही वस्तु तीनों क्षेत्रकों में क्यों दिखती है: क्योंकि क्षेत्रक कोई वस्तु नहीं, कार्य का चरण है। जब किसान गाय से दूध निकालता है तो वह प्राथमिक है, जब डेयरी उसी दूध से घी बनाती है तो द्वितीयक, और जब ट्रक घी को दुकान तक ले जाता है तो तृतीयक। यह देखिए कि व्यक्ति क्या कर रहा है, यह नहीं कि वस्तु क्या है।
प्र3.
यह तीन क्षेत्रक (सेक्टर) आपस में किस प्रकार संबंधित हैं?
उत्तर
ये एक ही शृंखला की कड़ियाँ हैं — प्राथमिक क्षेत्रक कच्चा माल देता है, द्वितीयक उसे रूपांतरित करता है और तृतीयक उसे ढोता, वित्त देता तथा बेचता है — और तीनों में से कोई भी शेष दो के बिना नहीं चल सकता। पृष्ठ 201 कहता है कि तीनों क्षेत्रक “प्राकृतिक कच्चे माल को अंतिम उत्पाद में परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।”
गुजरात के आणंद जिले के एक गाँव से आपकी थाली तक दूध का सफर देखिए।
अध्याय की अमूल शृंखला, क्षेत्रकवार। हरा प्राथमिक, नारंगी द्वितीयक और नीला तृतीयक है — देखिए कितने चरण सेवाओं के हैं।
पुस्तक स्वयं इस शृंखला का सार देती है (पृष्ठ 204)। गायों को दुहना “प्राथमिक क्षेत्रक की आर्थिक गतिविधि” है “क्योंकि दुग्ध उत्पादन एक प्राकृतिक स्रोत (गाय या मवेशी) से प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त किया जाता है।” कारखानों में दूध को “एक रूप (तरल) से अन्य खाद्य रूपों, जैसे – दूध का पाउडर, घी, पनीर, मक्खन” में बदलना द्वितीयक गतिविधि है। और “यहाँ परिवहन, विपणन और खुदरा (फुटकर) विक्रेता तृतीयक गतिविधि में सम्मिलित हैं।”
यह केवल पंक्ति नहीं, परस्पर निर्भरता क्यों है: तीर केवल एक दिशा में नहीं चलते। डेयरी को किसान का दूध चाहिए, किंतु किसान को भी डेयरी चाहिए — वरना उसका दूध फट जाएगा और उसका कोई मूल्य नहीं रहेगा। ट्रक को ढोने के लिए माल चाहिए और माल को पहुँचने के लिए ट्रक। हर क्षेत्रक एक साथ दूसरे का ग्राहक भी है और आपूर्तिकर्ता भी। पृष्ठ 206 इसे ठीक इन्हीं शब्दों में कहता है — “इस प्रक्रिया की कोई भी गतिविधि संभव नहीं होती, अगर यह तीनों क्षेत्रक एक साथ कार्य नहीं करते।”
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