यह उत्तरदायित्व की मनोवृत्ति दर्शाती है — कि सड़क पर दिख रहे बच्चे किसी और की नहीं, अपने ही समुदाय की जिम्मेदारी हैं।
कमल परमार एक छोटी-सी ऑटो फेब्रिकेशन वर्कशॉप के मालिक थे। न वे अध्यापक थे, न उनके पीछे कोई संस्था थी, और न किसी ने उनसे कहा था। उन्होंने बस उन बच्चों को देखा जिनमें कुछ ने पढ़ाई छोड़ दी थी और कुछ कभी विद्यालय गए ही नहीं थे, और अपने नियमित काम के बाद हर दिन शाम 5.30 से रात 9.30 बजे तक पढ़ाना शुरू कर दिया, साथ में मुफ्त भोजन भी।
| उन्होंने क्या किया | यह कौन-सी मनोवृत्ति दिखाता है |
|---|---|
| बच्चों को देखा ही | उन्होंने उन्हें सड़क का हिस्सा मानकर अनदेखा नहीं किया। जिम्मेदारी देखने से ही शुरू होती है |
| जो उनके पास था — शामें — उसी से शुरू किया | आरंभ करने के लिए धन या पद नहीं, आरंभ करने का निश्चय चाहिए |
| पूरे दिन काम के बाद रोज़ चार घंटे | यह एक दिन का आयोजन नहीं, निरंतर निभाया गया संकल्प था |
| भोजन भी कराया | वे समझते थे कि भूखा बच्चा नहीं पढ़ सकता — उन्होंने पूरे बच्चे को देखा |
| दूसरे भी जुड़े — विद्यालय के अध्यापक और बड़े विद्यार्थी स्वयंसेवक बनकर | एक व्यक्ति की पहल से एक समुदाय बन गया — यही अध्याय का ‘समुदाय’ बनते हुए दिखता है |
एक स्वयंसेवक की बात इसका सार है — “हम वहाँ पढ़ाने गए थे, किंतु हमने उनसे बहुत कुछ सीखा।” यह ऊपर से नीचे देखने वाली दया नहीं, बराबरी का मेल है, जिसमें दोनों पक्ष कुछ पाते हैं।