प्र1.
न्त्र – मन्त्री, ष्ट्र – राष्ट्रम् — एतयोः वर्ण-वियोगं कुर्वन्तु ।
उत्तर
दोनों में तीन-तीन व्यञ्जन जुड़े हैं और तीसरा व्यञ्जन दोनों में ‘र्’ ही है।
| संयुक्त-व्यञ्जनम् | पदम् | वर्ण-वियोगः | अर्थः |
|---|---|---|---|
| न्त्र न् + त् + र = न्त्र | मन्त्री | म् + अ + न् + त् + र् + ई | मन्त्री |
| ष्ट्र ष् + ट् + र = ष्ट्र | राष्ट्रम् | र् + आ + ष् + ट् + र् + अ + म् | राष्ट्र, देश |
‘मन्त्री’ के अन्त में ‘ई’: मूल शब्द ‘मन्त्रिन्’ है; उसका प्रथमा-एकवचन रूप मन्त्री बनता है। इसीलिए वर्ण-वियोग में अन्त में हलन्त ‘न्’ नहीं, दीर्घ स्वर ई लिखा जाता है — म् + अ + न् + त् + र् + ई।
अर्थ: राष्ट्रम् = देशः (राष्ट्र, देश) — नपुंसकलिङ्ग। मन्त्री = यः मन्त्रं ददाति सः — जो सलाह देता है। दोनों पद आज भी हिन्दी में ज्यों के त्यों चलते हैं।