प्र1.
लोककथा के लिखित रूप में आने से पहले कहानियों का प्रचलन मौखिक रूप में ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता था। … अब आप अपने समूह के साथ मिलकर इस लोककथा को रोचक ढंग से सुनाइए। लोककथा को प्रभावशाली और रोचक रूप में सुनाने के लिए नीचे कुछ सुझाव दिए गए हैं जो लोककथा को और भी आकर्षक बना सकते हैं— (कथा सुनाना: स्वर में उतार-चढ़ाव, भावनाओं की अभिव्यक्ति, पात्रों के लिए अलग-अलग स्वर, हाथों और शरीर का उपयोग, हास्य का प्रयोग, विवरणात्मक भाषा का उपयोग, रोचक मोड़, संवादों को स्पष्ट और प्रासंगिक बनाना।)
उत्तर
यह सुनाने का अभ्यास है — इसे कक्षा में करना है। नीचे कथा को चार दृश्यों में बाँटकर एक तैयार योजना दी गई है, जिसमें पुस्तक के आठों सुझाव लगाए गए हैं।
| दृश्य | क्या सुनाना है | कौन-सा सुझाव कैसे लगाएँ |
|---|---|---|
| 1. पिता की सीख | निर्धन पिता का बेटों से कहना — “दूसरे प्रकार का धन संचित करो।” | स्वर धीमा और गंभीर। पिता के संवाद में स्नेह झलके। ‘पैनी दृष्टि’ कहते समय अपनी आँखों की ओर उँगली से संकेत कीजिए। |
| 2. यात्रा और तीन अनुमान | चालीस दिन की यात्रा, फिर तीनों भाइयों के तीन वाक्य। | तीनों भाइयों के लिए तीन अलग स्वर — बड़ा भारी स्वर में, मझला सामान्य, छोटा हल्का ऊँचा। यहीं रोचक मोड़ पर रुकिए — “अब सोचिए, बिना ऊँट देखे यह कैसे संभव है?” |
| 3. घुड़सवार और राजा का दरबार | तलवार निकालना, चोर कहकर धमकाना, पेटी मँगवाना। | स्वर तेज़ और नाटकीय। हाथ से तलवार घुमाने का अभिनय। राजा के लिए रोबदार भारी स्वर। पेटी वाला क्षण सबसे रहस्यमय — यहाँ स्वर धीमा करके ठहर जाइए। |
| 4. कच्चा अनार और सम्मान | पेटी खुलना, भाइयों का तर्क बताना, राजा का प्रसन्न होना। | आश्चर्य का भाव चेहरे पर लाइए — आँखें बड़ी कीजिए। अंत में स्वर में प्रसन्नता और हल्की मुसकान। खिड़की की ओर संकेत करते हुए कहिए — “देखिए, सब अनार कच्चे हैं!” |
सुनाने से पहले तीन तैयारी:
- कथा को याद मत कीजिए — केवल क्रम याद रखिए: सीख → यात्रा → तीन अनुमान → आरोप → परीक्षा → तर्क → सम्मान।
- तीन-चार संवाद ज्यों के त्यों याद रखिए, जैसे — “हमने तुम्हारे ऊँट का मुँह तक नहीं देखा।”
- एक बार घर पर, दर्पण के सामने या साथी को सुनाकर अभ्यास कीजिए।
ऐसा क्यों करते थे: लोककथाएँ पहले लिखी नहीं जाती थीं। कहने वाला यदि रोचक ढंग से सुनाता तो सुनने वालों को कथा याद रह जाती और वे आगे सुनाते। इसी तरह ये कथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी बचीं — यही कारण है कि लोककथा में छोटे-छोटे संवाद, दोहराव और नाटकीय मोड़ अधिक होते हैं।