प्र1.
प्याज भारत के अधिकांश भागों में भोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कुछ ऋतुओं में इसकी आपूर्ति बाजार में कम हो जाती है। आपके विचार में ऐसा होने पर प्याज के मूल्यों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
मूल्य बढ़ जाता है, और प्रायः बहुत तेजी से।
बाजार में प्याज की आपूर्ति घटती है
माँग लगभग वैसी ही रहती है — भारत की लगभग हर रसोई को प्याज चाहिए
→ थोड़े प्याज के पीछे बहुत से क्रेता
→ क्रेता बिना प्याज रहने के बजाय अधिक देने को तैयार हो जाते हैं
→ मूल्य ऊपर चढ़ जाता है
माँग लगभग वैसी ही रहती है — भारत की लगभग हर रसोई को प्याज चाहिए
→ थोड़े प्याज के पीछे बहुत से क्रेता
→ क्रेता बिना प्याज रहने के बजाय अधिक देने को तैयार हो जाते हैं
→ मूल्य ऊपर चढ़ जाता है
प्याज के मामले में यह वृद्धि विशेष रूप से तीखी क्यों होती है —
- मूल्य बढ़ने पर भी माँग बहुत कम नहीं होती। रोज प्याज पकाने वाला परिवार खाना बदलने के बजाय ₹60 किलो देना पसंद करेगा — बस मात्रा थोड़ी घटा देगा।
- आपूर्ति जल्दी बढ़ाई नहीं जा सकती। फसल को महीनों लगते हैं; जिस सप्ताह कमी हो, उस सप्ताह प्याज बनाया नहीं जा सकता।
- प्याज लंबे समय तक टिकता नहीं। महीनों रखने पर सड़ने और अंकुरित होने से हानि होती है, इसलिए भंडार सीमित रहते हैं।
- कुछ व्यापारी और ऊँचे मूल्य की आशा में माल रोक लेते हैं, जिससे कमी और बढ़ जाती है।
ऐसा क्यों होता है: यह अमरूद वाली कहानी का उलटा रूप है। वहाँ बहुत ऊँची कीमत पर बहुत अधिक अमरूद बचे रह गए थे। यहाँ माँग वैसी की वैसी है और प्याज बहुत कम हैं, इसलिए मूल्य तब तक चढ़ता है जब तक इतने क्रेता पीछे न हट जाएँ कि थोड़ा-सा प्याज सबमें बँट जाए।