प्र1.
जब जल वाष्पित होता है, तो यह शीतलन प्रभाव उत्पन्न करता है। यदि वायु में जल की मात्रा पहले से ही अधिक (उच्च आर्द्रता) है, तो जल धीरे-धीरे वाष्पित होगा। ऐसा सामान्यतया वर्षा के दिनों में होता है।
उत्तर
कक्षा 6 विज्ञान के ये दो तथ्य ही पूरी आर्द्रता की कुंजी हैं।
- वाष्पन ठंडक देता है। जल वाष्प में बदलते समय उस सतह से ऊष्मा ले जाता है जिसे वह छोड़ रहा है। इसीलिए पसीना त्वचा को ठंडा करता है, मटका जल को ठंडा रखता है और गीला फर्श पैरों तले ठंडा लगता है।
- नम वायु वाष्पन धीमा कर देती है। वायु एक सीमा तक ही जलवाष्प रख सकती है। यदि वह पहले से लगभग भरी हो, तो और वाष्प बहुत कम बन पाएगी — इसीलिए वर्षा के दिनों में गीले कपड़े गीले ही रह जाते हैं और पसीना त्वचा पर टिका रहता है।
शुष्क वायु (कम आर्द्रता) → तेज वाष्पन → अधिक ठंडक → आप सहज अनुभव करते हैं
नम वायु (उच्च आर्द्रता) → धीमा वाष्पन → कम ठंडक → चिपचिपाहट और उमस
नम वायु (उच्च आर्द्रता) → धीमा वाष्पन → कम ठंडक → चिपचिपाहट और उमस
‘सापेक्षिक’ आर्द्रता का अर्थ यही है: जिस वायु में बिल्कुल भी जलवाष्प न हो उसे 0 प्रतिशत कहा जाता है (जो प्रकृति में असंभव है), और जलवाष्प से पूरी तरह संतृप्त वायु को 100 प्रतिशत। अर्थात सापेक्षिक आर्द्रता वास्तव में यह बताती है कि वायु पहले से कितनी भरी हुई है — और इसीलिए यह भी कि वह आपके गीले कपड़ों, आपकी त्वचा या किसान की मिट्टी से अब और कितना जल ले सकती है।
स्वयं जाँचिए: हाथ के पिछले भाग को गीला कीजिए और उस पर फूँक मारिए। ठंडक लगेगी, क्योंकि आपने वाष्पन तेज कर दिया। अत्यधिक आर्द्र दिन में यही कीजिए — ठंडक कहीं कम अनुभव होगी।