प्र1.
ऊपर दिए गए फा-शिएन के यात्रा-विवरण को पढ़िए और उनके द्वारा वर्णित समाज की मुख्य विशेषताओं की पहचान कीजिए। अपने विचारों को लिखिए और सहपाठी मित्रों के साथ अपने लेख की तुलना कीजिए। आपको यह देखकर आश्चर्य हो सकता है कि अन्य लोग एक ही अंश की कितनी भिन्न व्याख्या कर सकते हैं।
उत्तर
अंश की एक-एक पंक्ति को एक विशेषता में बदलिए। छह विशेषताएँ स्पष्ट रूप से निकलती हैं।
| गुप्तकालीन समाज की विशेषता | फा-शिएन के अपने शब्द |
|---|---|
| बड़ी और संतुष्ट जनसंख्या | “लोग अत्यधिक संख्या में हैं और प्रसन्न हैं” |
| हल्का शासकीय हस्तक्षेप | “उन्हें पंजीकृत कराने या अधिकारियों के पास जाने की आवश्यकता नहीं होती” — न अनिवार्य पंजीकरण, न दैनिक जीवन में दखल |
| सरल भू-राजस्व व्यवस्था | “जो लोग राजकीय भूमि पर खेती करते हैं, वे अपने अनाज का एक भाग कर के रूप में देते हैं” — उपज का अंश, और वह भी केवल राजकीय भूमि पर खेती करने वालों से |
| वेतनभोगी राजकर्मी | “राजा के अंगरक्षकों और सेवकों को वेतन मिलता है” — अधिकारी वेतन पाते थे, प्रजा से वसूली पर निर्भर नहीं थे |
| समृद्ध, सुव्यवस्थित नगर और सशक्त व्यापारी वर्ग | “साम्राज्य के मध्य में नगर … सबसे बड़े हैं और निवासी धनी, समृद्ध … हैं”; “नगर में अनेक धनवान वरिष्ठ वैश्य और विदेशी व्यापारी रहते हैं, जिनके घर सुंदर हैं”; “गलियों को अच्छी तरह से व्यवस्थित रखा गया है” |
| संगठित दान और नि:शुल्क चिकित्सा | “वैश्य परिवारों के मुखिया दान और औषधि के लिए भवन बनवाते हैं … निर्धनों, अनाथों और रोगियों की देखभाल की जाती है … वैद्य उपचार करते हैं और निर्धन को भोजन व औषधि मिलती है” |
अब वह पक्ष जो अंश में नहीं है। अगले ही पृष्ठ पर अध्याय चेतावनी देता है कि ऐसे वर्णन “मात्र एक विशेष समय और समाज के सीमित वर्ग के प्रति ही लेखक के दृष्टिकोण को दर्शाते हैं”। इसी यात्रा-वृत्तांत में अन्यत्र फा-शिएन ने चांडालों के साथ हुए कठोर व्यवहार का वर्णन किया है, जिन्हें बहिष्कृत माना जाता था और जिन्हें नगर की सीमा के बाहर रहना पड़ता था। अर्थात यह अंश सच है — पर अधूरा।
दो पाठक दो उत्तर क्यों देंगे: जिस पाठक की दृष्टि ‘पंजीकृत कराने की आवश्यकता नहीं’ पर जाती है, उसे यह स्वतंत्र समाज दिखता है; जो ‘अनाज का एक भाग कर के रूप में’ पर रुकता है, उसे किसानों पर टिका राज्य दिखता है; और जो ‘धनवान वैश्य और विदेशी व्यापारी’ पर ध्यान देता है, उसे ऐसा असमान समाज दिखता है जिसमें निर्धन की रक्षा अधिकार से नहीं, दान से होती थी। तीनों पाठ एक ही अनुच्छेद के ईमानदार पाठ हैं। इसीलिए इतिहासकार निष्कर्ष से पहले अन्य स्रोतों से पुष्टि करते हैं।
यह भी पूछिए: फा-शिएन चीन से आए एक बौद्ध तीर्थयात्री थे, जो पवित्र स्थलों और पांडुलिपियों की खोज में थे। उन्होंने मुख्यतः नगर, विहार और यात्रियों का आतिथ्य करने वाले लोग देखे। किसी दूर के गाँव के किसान या नगर के बाहर रहने वाले चांडाल का वर्णन बिलकुल भिन्न होता।