प्र1.
नीचे स्तंभ 1 में कुछ नारे दिए गए हैं। नारों के सामने लिखिए कि यह किसके द्वारा दिया गया? आप पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता भी ले सकते हैं।
नारे — स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। / करो या मरो / मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा / इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद / पूर्ण स्वराज
उत्तर
| नारा | स्वतंत्रता सेनानी | संदर्भ |
|---|---|---|
| स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। | बाल गंगाधर तिलक | पूरा वाक्य है — ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।’ ‘जन्मसिद्ध’ शब्द ही सबसे बड़ी बात कह देता है — स्वराज्य कोई माँगी हुई भीख नहीं, जन्म के साथ मिला अधिकार है। |
| करो या मरो | महात्मा गाँधी | 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय दिया गया आह्वान — अब या तो देश आज़ाद कराएँगे या इसी प्रयत्न में मिट जाएँगे। |
| मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा | चंद्रशेखर आजाद | उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वे जीवित पुलिस के हाथ नहीं आएँगे, और अंत तक इसे निभाया। |
| इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद | भगत सिंह (और उनके साथी) | 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली में यही नारा गूँजा था। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ पद मूलतः कवि हसरत मोहानी का गढ़ा हुआ माना जाता है, पर इसे घर-घर तक भगत सिंह और उनके साथी ले गए। ‘इंकलाब’ का अर्थ है क्रांति। |
| पूर्ण स्वराज | जवाहरलाल नेहरू / कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन (1929) | दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में, जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की, ‘पूर्ण स्वराज’ का प्रस्ताव पारित हुआ और 26 जनवरी 1930 को पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। |
नारे इतने असरदार क्यों होते हैं: नारा कुछ ही शब्दों में एक पूरा विचार पकड़ा देता है और बोलने में लय के कारण याद रह जाता है — इसीलिए वह भीड़ को एक साथ बोलने और एक साथ सोचने पर ले आता है। पाठ में भी यही कहा गया है कि ये नारे स्वतंत्रता सेनानियों के ‘अदम्य साहस, निर्भीकता और देश-प्रेम को दर्शाते हैं’। इसी कारण नेताजी का ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ भी केवल वाक्य नहीं रहा — वह एक सौदा था, जिसमें त्याग पहले माँगा गया और फल बाद में देने का वचन दिया गया।