मल्हार अध्याय 10 तरुण के स्वप्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-05

इस अध्याय के बारे में

पाठ की विधा गद्य है — यह एक भाषण/उद्‌बोधन का अंश है, किसी कहानी या निबंध का नहीं। इसलिए इसमें सीधा संबोधन है (‘हे मेरे तरुण भाइयो!’), लंबे-लंबे वाक्य हैं और अंत में एक आह्वान है। नेताजी अपना स्वप्न देशबंधु चित्तरंजन दास से जोड़ते हैं — ‘वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा।’ फिर कहते हैं, ‘उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।’ उस आदर्श समाज की पाँच शर्तें पाठ में गिनाई गई हैं — व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो, जातिभेद का स्थान न हो, नारी को पुरुषों के समान अधिकार हों, अर्थ की विषमता न हो, और हर व्यक्ति को शिक्षा तथा उन्नति का समान सुअवसर मिले। इन शर्तों के साथ एक शर्त कर्म की है — ‘जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा, वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।’ नेताजी की दृष्टि केवल भ

  1. मेरी समझ से
  2. मिलकर करें मिलान
  3. पंक्तियों पर चर्चा
  4. सोच-विचार के लिए
  5. अनुमान और कल्पना से
  6. शीर्षक
  7. भाषा की बात
  8. विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग
  9. आपकी बात
  10. मिलान कीजिए
  11. सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज के लिए प्रयास
  12. स्त्री सशक्तीकरण
  13. आपके प्रिय स्वतंत्रता सेनानी
  14. “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।”
  15. परियोजना कार्य
  16. साझी समझ
  17. खोजबीन के लिए
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