मल्हार अध्याय 10 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपनी कक्षा में साझा कीजिए। (क) “उस समाज में अर्थ की विषमता न हो।”
उत्तर

यहाँ अर्थ का मतलब है धन, और विषमता का मतलब है असमानता। पंक्ति का सीधा अर्थ है — उस समाज में धन का बँटवारा इतना असमान न हो कि कुछ लोगों के पास सब कुछ हो और बहुतों के पास कुछ भी नहीं।

यह शर्त इस भाषण में क्यों आई: नेताजी इससे पहले कह चुके हैं कि उस समाज में ‘व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो’। पर जिस व्यक्ति के पास दो वक्त का भोजन नहीं, वह कागज़ पर स्वतंत्र होकर भी स्वतंत्र नहीं होता — उसकी हर पसंद पेट से तय होती है। इसीलिए नेताजी आर्थिक बराबरी को स्वाधीनता की शर्त बनाते हैं, कोई अलग दान-पुण्य की बात नहीं। ध्यान दीजिए कि अगली ही पंक्ति में वे इसका उपाय भी बता देते हैं — सबको ‘शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर’।
शब्द जोड़िए: ‘विषमता’ का विपरीतार्थक शब्द ‘समानता’ है — यह जोड़ा इसी पाठ के ‘विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग’ अभ्यास में भी आया है।
प्र2.
(ख) “वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा।”
उत्तर

यह पंक्ति देशबंधु चित्तरंजन दास के बारे में है। इसका अर्थ है — जो स्वप्न उन्होंने देखा, वही उनकी सारी शक्ति का स्रोत था और वही उनके आनंद का न सूखने वाला झरना था।

शब्दार्थ — उत्स = सोता, स्रोत (जहाँ से पानी फूटकर निकलता है)। निर्झर = झरना, प्रपात।

भाषा कैसे काम करती है: यह रूपक है — स्वप्न को सीधे पानी का सोता और झरना कह दिया गया है, ‘जैसे’ या ‘समान’ जैसा कोई शब्द बीच में नहीं। और यह रूपक अधूरा नहीं छोड़ा गया, दो कदम चलता है: पहले उत्स, जहाँ से पानी निकलता है — यानी शक्ति कहाँ से आती है; फिर निर्झर, जो लगातार बहता और छलकता रहता है — यानी आनंद कैसा है। पहाड़ का सोता कभी थकता नहीं; इसी तरह जिस व्यक्ति के पास कोई बड़ा लक्ष्य है, उसकी शक्ति और खुशी भी चुकती नहीं।
आगे जोड़िए: इसके तुरंत बाद नेताजी कहते हैं — ‘उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।’ यानी वह झरना सूखा नहीं, उसकी धारा अगली पीढ़ी तक आ गई है।
प्र3.
(ग) “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो।”
उत्तर

इसका अर्थ है — उस समाज में व्यक्ति की स्वतंत्रता किसी एक तरह की न हो, हर तरह की हो। केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि जाति, धन, भय, रूढ़ि और सामाजिक दबाव — सबसे मुक्ति।

‘सब दृष्टियों से’ पर ज़ोर क्यों: यह भाषण 1929 का है, जब देश पराधीन था और ‘मुक्ति’ शब्द से लोग पहले अंग्रेज़ी शासन से आज़ादी समझते। नेताजी उसी शब्द को चौड़ा कर देते हैं। इसका प्रमाण अगली पंक्तियों में ही है — वे बारी-बारी से जातिभेद, नारी के असमान अधिकार और ‘अर्थ की विषमता’ को हटाने की बात करते हैं। यानी ‘सब दृष्टियों से’ कोई सजावटी वाक्यांश नहीं, आगे आने वाली पूरी सूची का शीर्षक है।
साथ की पंक्ति मत छोड़िए: पूरी बात है — ‘व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं।’ दूसरा हिस्सा बताता है कि नेताजी को किस बंधन की सबसे अधिक चिंता थी — बाहर के शासक की नहीं, अपने ही समाज के दबाव की।
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