नेताजी ने एक नए सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर टिके एक स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न देखा था। उस राष्ट्र की पहचान वे स्वयं गिनाते हैं —
- व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो और समाज के दबाव से उसका दम न घुटे।
- जातिभेद का कोई स्थान न हो।
- नारी मुक्त होकर पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले।
- अर्थ की विषमता न हो — धन की खाई न रहे।
- हर व्यक्ति को शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर मिले।
- श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा हो; आलसी और अकर्मण्य के लिए कोई जगह न रहे।
- वह राष्ट्र स्वदेशी समाज के यंत्र की तरह काम करे — यानी अपने ही समाज की ज़रूरतें पूरी करे — और ‘विजातीय प्रभाव’ से मुक्त रहे।