मल्हार अध्याय 10 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अब आप इस पाठ को पुन: पढ़िए और निम्नलिखित के विषय में पता लगाकर लिखिए— (क) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार के राष्ट्र निर्माण का स्वप्न देखा था?
उत्तर

नेताजी ने एक नए सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर टिके एक स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न देखा था। उस राष्ट्र की पहचान वे स्वयं गिनाते हैं —

  • व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो और समाज के दबाव से उसका दम न घुटे।
  • जातिभेद का कोई स्थान न हो।
  • नारी मुक्त होकर पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले।
  • अर्थ की विषमता न हो — धन की खाई न रहे।
  • हर व्यक्ति को शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर मिले।
  • श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा हो; आलसी और अकर्मण्य के लिए कोई जगह न रहे।
  • वह राष्ट्र स्वदेशी समाज के यंत्र की तरह काम करे — यानी अपने ही समाज की ज़रूरतें पूरी करे — और ‘विजातीय प्रभाव’ से मुक्त रहे।
ध्यान देने की बात: इस सूची में केवल एक ही माँग राजनीतिक है — विदेशी प्रभाव से मुक्ति। बाकी सब सामाजिक और आर्थिक हैं। इसीलिए नेताजी ‘स्वाधीन’ के साथ ‘सर्वांगीण’ और ‘संपन्न’ शब्द भी जोड़ते हैं। और अंत में वे इससे भी आगे जाते हैं — ऐसा राष्ट्र केवल भारतवासियों का अभाव मिटाकर रुक नहीं जाएगा, बल्कि ‘विश्व-मानव के समक्ष आदर्श-समाज और आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य होगा’।
प्र2.
(ख) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस लक्ष्य की प्राप्ति को अपने जीवन की सार्थकता के रूप में देखा?
उत्तर

उन्होंने अपने स्वप्न को साकार करने — यानी उस आदर्श स्वाधीन, संपन्न और समानता वाले समाज तथा राष्ट्र की स्थापना — को ही अपने जीवन की सार्थकता माना।

“है सिर्फ यही स्वप्न जो हमें असीम शक्ति और अपार आनंद देता है, जो मेरे क्षुद्र जीवन को भी सार्थक बनाता है।”

इसी बात को वे पहले भी कह चुके हैं — “यह स्वप्न मेरे समक्ष नित्य एवं अखंड सत्य है। इस सत्य की प्रतिष्ठा के लिए सबकुछ किया जा सकता है, हर प्रकार का त्याग किया जा सकता है, हर संकट को सहा जा सकता है…”

वाक्य का भार कहाँ है: वे अपने जीवन को ‘क्षुद्र’ (छोटा, तुच्छ) कहते हैं। यह विनम्रता भर नहीं, तर्क है — वे कहना चाहते हैं कि अकेला जीवन अपने-आप में छोटा ही होता है; उसे बड़ा कोई लक्ष्य ही बनाता है। और वे इसे अंतिम सीमा तक ले जाते हैं — इस स्वप्न को सार्थक बनाते हुए यदि प्राण भी देना पड़े तो ‘वह मरण है स्वर्ग समान’।
प्र3.
(ग) “आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा” सुभाषचंद्र बोस ने ऐसा क्यों कहा होगा?
उत्तर

क्योंकि नेताजी का पूरा स्वप्न कर्म पर टिका है। जो समाज वे बनाना चाहते हैं, वह भाषणों से नहीं, लोगों के परिश्रम से बनेगा — इसलिए उसमें काम से जी चुराने वाले के लिए जगह नहीं छोड़ी जा सकती।

पूरी पंक्ति देखिए — “जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा, वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।” यहाँ एक ही वाक्य में दो बातें एक साथ कही गई हैं।

दो कारण, दोनों पाठ से:
1. मर्यादा का दूसरा पहलू। यदि मेहनत करने वाले को सम्मान देना है, तो मेहनत न करने वाले को वही सम्मान नहीं दिया जा सकता — वरना ‘मर्यादा’ शब्द का कोई अर्थ ही नहीं बचता।
2. स्वाधीनता की कीमत। जो समाज अपना काम स्वयं करता है, वही आत्मनिर्भर बनता है, और आत्मनिर्भर समाज ही बाहरी प्रभाव से मुक्त रह पाता है। आलस्य सीधे परतंत्रता तक ले जाता है।
यह बात यहीं नहीं रुकती: ‘झरोखे से’ में दिया गया नेताजी का पत्र इसी सोच का व्यावहारिक रूप है — वहाँ वे मिट्टी के खिलौने और सीप के बटन जैसे छोटे-छोटे गृह-उद्योगों की योजना बनाते हैं, ताकि गरीब परिवार फुरसत के समय में भी कमा सकें। स्वप्न बड़ा है, पर उसका पहला कदम बहुत ठोस है।
प्र4.
(घ) नेताजी सुभाषचंद्र बोस के लक्ष्यों या ध्येय को पूरा करने के लिए आज की युवा पीढ़ी क्या-क्या कर सकती है?
उत्तर

नेताजी ने जो-जो शर्तें गिनाई थीं, आज का युवा उन्हीं को अपने स्तर पर पूरा कर सकता है। हर काम को उसकी शर्त से जोड़कर देखिए —

नेताजी की शर्तआज युवा क्या कर सकता है
जातिभेद का स्थान न होअपनी कक्षा, टोली और मित्र-मंडली में किसी के साथ जाति या पृष्ठभूमि के कारण अलग व्यवहार न करना — बदलाव यहीं से शुरू होता है।
नारी को समान अधिकारघर और विद्यालय के काम में बराबर हिस्सा लेना; लड़कियों की पढ़ाई और खेल में उतनी ही भागीदारी को सामान्य बात मानना।
सबको शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसरजो पढ़ाई में पीछे रह गया हो, उसकी मदद करना; बड़े होकर अपने कौशल से अपने क्षेत्र के लोगों को सिखाना।
श्रम और कर्म की मर्यादाअपना काम स्वयं करना और हाथ के काम को छोटा न समझना — यह सबसे सीधी बात है और सबसे कम की जाती है।
स्वदेशी समाज का यंत्रस्थानीय कारीगरों और गृह-उद्योगों की बनी चीज़ें अपनाना; अपने क्षेत्र की समस्या पर अपने कौशल से काम करना।
व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त होअपने अधिकार जानना और दूसरों के अधिकारों का उतना ही ध्यान रखना; अन्याय देखकर चुप न रहना।
सबसे ज़रूरी बात: नेताजी ने स्वप्न को दिनचर्या से जोड़ा था — ‘इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं… काम-काज करते हैं।’ इसलिए उनके ध्येय को पूरा करना कोई एक बड़ा काम नहीं, बल्कि रोज़ के छोटे कामों में एक दिशा रखना है।
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