मल्हार अध्याय 10 अनुमान और कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो”, सुभाषचंद्र बोस ने किन-किन दृष्टियों से मुक्ति की बात की होगी?
उत्तर

भाषण में ‘सब दृष्टियों’ की सूची नेताजी ने स्वयं दे दी है — उसी पंक्ति के बाद वे एक-एक करके बंधन गिनाते हैं। कम-से-कम छह तरह की मुक्ति उसमें से निकलती है —

  • सामाजिक मुक्ति — ‘समाज के दबाव से वह मरे नहीं’, यानी रीति-रिवाज और लोकलाज के दबाव में व्यक्ति का दम न घुटे।
  • जाति के बंधन से मुक्ति — ‘उस समाज में जातिभेद का स्थान नहीं हो’।
  • स्त्री-पुरुष के भेद से मुक्ति — ‘नारी मुक्त होकर… समान अधिकार का उपभोग करे’।
  • आर्थिक मुक्ति — ‘उस समाज में अर्थ की विषमता न हो’, यानी गरीबी और असमानता का बंधन न रहे।
  • अवसर की मुक्ति — ‘प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर पाए’; अशिक्षा भी एक बंधन है।
  • राजनीतिक मुक्ति — ‘वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा’।
अनुमान का आधार: यहाँ कल्पना करने की ज़रूरत बहुत कम है, क्योंकि लेखक ने अपनी सूची स्वयं खोल दी है। ऐसे प्रश्न में सबसे अच्छा उत्तर वही होता है जो पाठ के भीतर से बिंदु उठाए और फिर एक-दो बात अपनी ओर से जोड़े — जैसे भय से मुक्ति और अंधविश्वास से मुक्ति, जो नेताजी की सूची में सीधे नहीं हैं पर उसी दिशा में हैं।
प्र2.
(ख) “उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे”, सुभाषचंद्र बोस को अपने भाषण में नारी के लिए समान अधिकारों की बात क्यों कहनी पड़ी?
उत्तर

क्योंकि 1929 के भारत में स्त्रियों को वे अधिकार प्राप्त नहीं थे। जिस बात के लिए विशेष रूप से कहना पड़े, वह अपने-आप उपलब्ध नहीं होती — नेताजी का यह वाक्य ही उस समय की स्थिति का प्रमाण है।

तीन कारण, तीनों पाठ से जुड़े:
1. स्वप्न अधूरा रह जाता। नेताजी ने ‘सर्वांगीण’ समाज का स्वप्न देखा था। यदि आधी आबादी को शिक्षा, संपत्ति और निर्णय के अधिकार न हों, तो समाज ‘सब अंगों में पूरा’ हो ही नहीं सकता।
2. यह उनकी सूची का हिस्सा है, अपवाद नहीं। जिस क्रम में वे जातिभेद और अर्थ की विषमता हटाते हैं, उसी क्रम में नारी की असमानता भी रखते हैं। तीनों उनके लिए एक ही तरह के बंधन हैं।
3. उन्हें केवल अधिकार नहीं, भागीदारी चाहिए थी। वाक्य यहाँ रुकता नहीं — ‘और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले’। यानी वे स्त्री को सुविधा पाने वाली नहीं, राष्ट्र-निर्माण में बराबर की भागीदार मानते थे।
कथनी और करनी: यह बात नेताजी ने केवल कही नहीं। आगे चलकर ‘आजाद हिंद फौज’ में उन्होंने स्त्रियों की एक अलग सैन्य टुकड़ी — रानी झाँसी रेजिमेंट — बनाई। पाठ के ‘स्त्री सशक्तीकरण’ अभ्यास में इसी टुकड़ी के बारे में पूछा गया है।
प्र3.
(ग) आपके विचार से हमारे समाज में और कौन-कौन से लोग हैं जिन्हें विशेष अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है?
उत्तर

ऐसे लोग, जो किसी कारण से दूसरों के बराबर शुरुआत नहीं कर पाते। उन्हें विशेष अधिकार इसलिए चाहिए ताकि वे बराबरी तक पहुँच सकें — विशेष अधिकार का उद्देश्य किसी को ऊपर उठाना नहीं, सबको एक ही रेखा पर लाना है।

किन्हेंक्योंकिस तरह की विशेष सुविधा
दिव्यांगजनसामान्य रास्ते, कक्षा और परीक्षा उनके लिए वैसे ही सुलभ नहीं होतेरैंप और सुलभ भवन, विशेष शिक्षा-सामग्री, परीक्षा में अतिरिक्त समय, आरक्षण
बच्चेवे अपने अधिकार स्वयं नहीं माँग सकतेनिःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, बाल-श्रम पर रोक, पोषण
वरिष्ठ नागरिकआयु के कारण आय और आवागमन दोनों सीमित हो जाते हैंपेंशन, यात्रा और चिकित्सा में छूट, अलग पंक्ति
वंचित एवं निर्धन परिवारशिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करने की क्षमता नहींछात्रवृत्ति, निःशुल्क पाठ्यपुस्तक और भोजन, आवास तथा राशन की योजनाएँ
जनजातीय समुदाय के लोगदूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालय, चिकित्सा और बाज़ार तक पहुँच कठिनआवासीय विद्यालय, वनोपज पर अधिकार, विशेष विकास योजनाएँ
नेताजी की बात से जोड़िए: उनका तर्क था कि हर व्यक्ति को ‘शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर’ मिले। पर जब दो लोगों की शुरुआत ही असमान हो, तो दोनों को एक-सी सुविधा देने से समानता नहीं आती। इसीलिए विशेष अधिकार समानता के विरुद्ध नहीं, समानता का साधन हैं।
प्र4.
(घ) सुभाषचंद्र बोस देश के समस्त युवा वर्ग को संबोधित करते हुए कहते हैं— “हे मेरे तरुण भाइयो!” उनका संबोधन केवल ‘भाइयो’ शब्द तक ही क्यों सीमित रहा होगा?
उत्तर

सबसे संभावित कारण यह है कि 29 दिसंबर, 1929 के उस मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में उनके सामने बैठे श्रोता लगभग सभी युवक थे। उस समय ऐसे सार्वजनिक सम्मेलनों में लड़कियों और स्त्रियों की उपस्थिति बहुत कम होती थी, इसलिए संबोधन भी उसी सभा के अनुसार बन गया।

यह उनकी सोच की सीमा नहीं थी — इसका प्रमाण उसी भाषण में है। जिस भाषण के अंत में वे ‘भाइयो’ कहते हैं, उसी के आरंभ में वे माँग करते हैं कि ‘उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले।’ यानी उनका स्वप्न स्त्री-पुरुष दोनों का था, केवल उस दिन की सभा एक तरफ़ा थी। आगे चलकर उन्होंने आजाद हिंद फौज में स्त्रियों की टुकड़ी बनाकर यह बात काम से भी सिद्ध कर दी।
आज हम क्या कहेंगे: आज उसी भाषण का आरंभ ‘हे मेरे तरुण साथियो!’ या ‘भाइयो और बहनो!’ से होता। भाषा समय के साथ बदलती है — और यह बदलाव इस बात का संकेत है कि सभा में अब कौन-कौन बैठा है।
प्र5.
(ङ) “यह स्वप्न मैं तुम्हें उपहारस्वरूप देता हूँ— स्वीकार करो।” सुभाषचंद्र बोस के इस आह्वान पर श्रोताओं (युवा वर्ग) की क्या प्रतिक्रिया रही होगी?
उत्तर

श्रोता पहले कुछ क्षण स्तब्ध रहे होंगे, फिर सभा तालियों और नारों से गूँज उठी होगी। और सबसे गहरी प्रतिक्रिया शोर नहीं, वह चुप्पी रही होगी जिसमें हर तरुण ने अपने-आप से पूछा होगा — ‘क्या मैं इसे स्वीकार कर सकता हूँ?’

ऐसा अनुमान क्यों: यह वाक्य नेताजी के भाषण का सबसे चतुर मोड़ है। नेता आमतौर पर युवाओं से कुछ माँगते हैं — समय, त्याग, बलिदान। नेताजी इसके उलट कुछ देते हैं, और देने से पहले अपने को खाली भी बता देते हैं — ‘तुम्हें देने लायक मेरे पास कुछ भी नहीं है, है सिर्फ यही स्वप्न’। जब कोई अपनी एकमात्र संपत्ति आपको सौंप दे, तो उसे लौटाना कठिन हो जाता है। साथ ही ‘स्वीकार करो’ एक आज्ञा है — इससे बात भावना पर नहीं रुकती, श्रोता के सामने एक निर्णय आ खड़ा होता है।
नमूना उत्तर: “सभा में कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर ‘वंदे मातरम्’ के नारों से पूरा पंडाल गूँज उठा। कई तरुणों ने वहीं खड़े होकर हाथ उठाया, कुछ की आँखें भर आईं। जो युवक उस दिन घर लौटे, उनके पास एक भाषण की याद नहीं थी — एक ज़िम्मेदारी थी, जिसे वे स्वीकार कर चुके थे।”
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