मल्हार अध्याय 9 आदमी का अनुपात के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-05
इस अध्याय के बारे में
कविता एक ही साँचे — ‘क है ख में’ — को दोहराते हुए कमरा → घर → मुहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी → नक्षत्र → नभ गंगा → ब्रह्मांड तक फैलती है। हर चरण अपने से पहले वाले को अपने भीतर समेट लेता है। विशालता यहाँ बताई नहीं जाती, गिनवाई जाती है। पंक्तियाँ छोटी हैं और लगभग हर पंक्ति ‘में’ पर खत्म होती है, इसलिए पढ़ते-पढ़ते पाठक स्वयं एक-एक सीढ़ी ऊपर चढ़ता जाता है। चरम पर पहुँचकर कवि निष्कर्ष रखते हैं — ‘यह है अनुपात / आदमी का विराट से’। यही कविता का शीर्षक भी है और उसका केंद्रीय विचार भी। दूसरा भाग उलटी दिशा में चलता है — इतना छोटा आदमी ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में डूबकर ‘संख्यातीत शंख सी दीवारें’ उठाता है और स्वयं को दूसरे का स्वामी बताता है। अंत कविता को वहीं लौटा लाता है जहाँ से वह चली थी — ‘एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है’। सबसे बड़े विस्तार के बाद सबसे छोटा बँटवारा; यही तीख
अभ्यास
- मेरी समझ से
- पंक्तियों पर चर्चा
- मिलकर करें मिलान
- अनुपात
- सोच-विचार के लिए
- अनुमान और कल्पना
- शब्द से जुड़े शब्द
- सृजन
- कविता की रचना
- कविता का सौंदर्य
- आपके शब्द
- आपके प्रश्न
- विशेषण और विशेष्य
- आपकी बात
- संख्यातीत शंख
- समावेशन और समानता
- आज की पहेली
- झरोखे से
- साझी समझ
- खोजबीन के लिए