प्र1.
(क) कविता में अलग-अलग प्रकार से ब्रह्मांड की विशालता को व्यक्त किया गया है। उनकी पहचान कीजिए।
उत्तर
कवि विशालता कहीं भी ‘बहुत बड़ा’ कहकर नहीं बताते। वे उसे चार अलग-अलग तरीकों से हमारे सामने खड़ा करते हैं —
- 1. सीढ़ीदार शृंखला से — ‘कमरा है घर में / घर है मुहल्ले में / मुहल्ला नगर में / नगर है प्रदेश में / प्रदेश कई देश में / देश कई पृथ्वी पर’। हर पंक्ति पिछली को अपने भीतर निगल लेती है। विशालता बताई नहीं जाती, एक-एक कदम चलकर नापी जाती है।
- 2. गिनती से परे की संख्याओं से — ‘अनगिन नक्षत्रों’, ‘करोड़ों में एक ही’, ‘लाखों ब्रह्मांडों में’, ‘संख्यातीत शंख’। ये संख्याएँ इतनी बड़ी हैं कि कल्पना उन्हें पकड़ नहीं पाती — और यही उनका काम है।
- 3. समेटने के बिंब से — ‘सबको समेटे है / परिधि नभ गंगा की’। यहाँ विशालता आकार से नहीं, समाने की क्षमता से बताई गई है।
- 4. बहुवचन के दोहराव से — ‘हर ब्रह्मांड में / कितनी ही पृथ्वियाँ / कितनी ही भूमियाँ / कितनी ही सृष्टियाँ’। ‘कितनी ही’ लगातार तीन बार आता है और हर बार शब्द बहुवचन में है। एक पृथ्वी नहीं — पृथ्वियाँ; एक सृष्टि नहीं — सृष्टियाँ।
सबसे बड़ी छलाँग: ‘लाखों ब्रह्मांडों में / अपना एक ब्रह्मांड’। ब्रह्मांड का अर्थ ही है ‘सब कुछ’। उसका बहुवचन बना देना — और अपने ब्रह्मांड को उनमें से मात्र एक कह देना — भाषा की सीमा से भी आगे जाकर विशालता कहना है। यहीं पाठक को अपना अनुपात सचमुच महसूस होता है।