मल्हार अध्याय 9 कविता का सौंदर्य

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कविता में अलग-अलग प्रकार से ब्रह्मांड की विशालता को व्यक्त किया गया है। उनकी पहचान कीजिए।
उत्तर

कवि विशालता कहीं भी ‘बहुत बड़ा’ कहकर नहीं बताते। वे उसे चार अलग-अलग तरीकों से हमारे सामने खड़ा करते हैं —

  • 1. सीढ़ीदार शृंखला से — ‘कमरा है घर में / घर है मुहल्ले में / मुहल्ला नगर में / नगर है प्रदेश में / प्रदेश कई देश में / देश कई पृथ्वी पर’। हर पंक्ति पिछली को अपने भीतर निगल लेती है। विशालता बताई नहीं जाती, एक-एक कदम चलकर नापी जाती है
  • 2. गिनती से परे की संख्याओं से — ‘अनगिन नक्षत्रों’, ‘करोड़ों में एक ही’, ‘लाखों ब्रह्मांडों में’, ‘संख्यातीत शंख’। ये संख्याएँ इतनी बड़ी हैं कि कल्पना उन्हें पकड़ नहीं पाती — और यही उनका काम है।
  • 3. समेटने के बिंब से — ‘सबको समेटे है / परिधि नभ गंगा की’। यहाँ विशालता आकार से नहीं, समाने की क्षमता से बताई गई है।
  • 4. बहुवचन के दोहराव से — ‘हर ब्रह्मांड में / कितनी ही पृथ्वियाँ / कितनी ही भूमियाँ / कितनी ही सृष्टियाँ’। ‘कितनी ही’ लगातार तीन बार आता है और हर बार शब्द बहुवचन में है। एक पृथ्वी नहीं — पृथ्वियाँ; एक सृष्टि नहीं — सृष्टियाँ।
सबसे बड़ी छलाँग: ‘लाखों ब्रह्मांडों में / अपना एक ब्रह्मांड’। ब्रह्मांड का अर्थ ही है ‘सब कुछ’। उसका बहुवचन बना देना — और अपने ब्रह्मांड को उनमें से मात्र एक कह देना — भाषा की सीमा से भी आगे जाकर विशालता कहना है। यहीं पाठक को अपना अनुपात सचमुच महसूस होता है।
प्र2.
(ख) “संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है” / “अपने को दूजे का स्वामी बताता है” / “एक कमरे में दो दुनिया रचाता है” — कविता में ये सारी क्रियाएँ मनुष्य के लिए आई हैं। आप अपने अनुसार कविता में नई क्रियाओं का प्रयोग करके कविता की रचना कीजिए।
उत्तर

पहले देख लीजिए कि कवि ने कौन-सी क्रियाएँ चुनी हैं — उठाता है, बताता है, रचाता है। तीनों एक ही तुक में हैं (‘-आता है’), तीनों वर्तमान काल में हैं, और तीनों करने वाली क्रियाएँ हैं। इसीलिए आदमी लगातार कुछ न कुछ करता हुआ दिखता है, जबकि सृष्टि केवल ‘है’।

अब वही ढाँचा लेकर नई क्रियाएँ भरिए — क्रियाएँ बदलिए, ढाँचा वही रखिए।

नमूना रचना 1 (वही व्यंग्य, नई क्रियाएँ):
सरसों भर आदमी
आकाश भर दावे सजाता है
मुट्ठी भर मिट्टी को
अपना देश बताता है
सीमा खींच-खींचकर
नक्शे पर नाम लिखाता है
और उसी नक्शे में
अपना घर भुलाता है
नमूना रचना 2 (उलटी दिशा — दीवार गिराने की क्रियाएँ):
यह है अनुपात
आदमी का विराट से
इसे जानकर आदमी
अपनी दीवार गिराता है
दूजे की बात सुनता है
अपना कोना बँटाता है
देशों की कौन कहे
एक कमरे में
एक दुनिया बसाता है
रचते समय ध्यान दीजिए: पंक्तियाँ छोटी रखिए, तुक की चिंता मत कीजिए, पर क्रिया हमेशा पंक्ति के अंत में रखिए — जैसे मूल कविता में है। क्रिया अंत में आने से हर पंक्ति एक चोट की तरह गिरती है।
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