प्र1.
“सबको समेटे है / परिधि नभ गंगा की” — आपने ‘आकाशगंगा’ शब्द सुना और पढ़ा होगा। लेकिन कविता में ‘नभ गंगा’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। आप भी अपने समूह में मिलकर इसी प्रकार दो शब्दों को मिलाकर नए शब्द बनाइए।
उत्तर
नभ + गंगा = नभगंगा — आकाश में बहती हुई गंगा, अर्थात आकाशगंगा। कवि ने ‘आकाश’ की जगह उसका छोटा और अधिक काव्यात्मक पर्याय ‘नभ’ रखा, जिससे शब्द हल्का और लयदार हो गया।
| पहला शब्द | दूसरा शब्द | नया शब्द | अर्थ |
|---|---|---|---|
| नभ | चर | नभचर | आकाश में विचरने वाला — पक्षी |
| जल | धारा | जलधारा | पानी की बहती धार |
| गिरि | राज | गिरिराज | पर्वतों का राजा |
| पवन | पुत्र | पवनपुत्र | पवन का पुत्र — हनुमान |
| चंद्र | मुख | चंद्रमुख | चंद्रमा-सा मुख |
| रात | रानी | रातरानी | रात में महकने वाला फूल |
| दिन | कर | दिनकर | दिन करने वाला — सूर्य |
| मेघ | दूत | मेघदूत | बादल जो संदेश ले जाए |
ऐसे शब्द क्यों बनाए जाते हैं: दो शब्द जुड़कर एक चित्र बना देते हैं। ‘आकाशगंगा’ कहने पर हम एक जानकारी देते हैं; ‘नभ गंगा’ कहने पर आँखों के सामने आकाश में बहती नदी आ जाती है। कविता जानकारी नहीं, चित्र देती है — इसीलिए वह ऐसे शब्द गढ़ती है।