मल्हार अध्याय 9 आपकी बात

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कोई ऐसी स्थिति बताइए जहाँ ‘अनुपात’ बिगड़ गया हो— जैसे काम का बोझ अधिक और समय कम।
उत्तर

‘अनुपात बिगड़ना’ का अर्थ है — दो चीज़ों का आपसी संतुलन टूट जाना। पुस्तक ने एक उदाहरण दे दिया है; कुछ और —

  • पढ़ाई और नींद: परीक्षा के दिनों में पढ़ने के घंटे बढ़ जाते हैं और सोने के घटते जाते हैं। नतीजा — पढ़ा हुआ याद ही नहीं रहता, क्योंकि याद रखने का काम नींद में होता है।
  • खर्च और आमदनी: जब खर्च आमदनी से बड़ा हो जाए तो घर चलाना कठिन हो जाता है।
  • वर्षा और नालियाँ: बारिश उतनी ही होती है, पर नालियाँ पट जाएँ तो नगर डूब जाता है। यहाँ पानी नहीं, अनुपात बिगड़ा है।
  • पेड़ और मकान: मुहल्ले में मकान बढ़ते गए और पेड़ घटते गए — इसलिए गर्मी बढ़ गई।
  • मोबाइल और खेल: पर्दे पर बीतने वाला समय बढ़ता जाए और मैदान का घटता जाए तो शरीर और मन दोनों थकने लगते हैं।
कविता से जोड़िए: कविता जिस अनुपात की बात करती है, वह भी ऐसे ही बिगड़ा हुआ है — आदमी का आकार बहुत छोटा और उसका अहंकार बहुत बड़ा। हर बिगड़े अनुपात का इलाज एक ही है — जो बढ़ गया है उसे घटाना, या जो घट गया है उसे बढ़ाना।
प्र2.
(ख) आप अपने परिवार, विद्यालय या मोहल्ले में ‘विराटता’ (विशाल दृष्टिकोण) कैसे ला सकते हैं? कुछ उपाय सोचकर लिखिए। (संकेत— किसी को अनदेखा न करना, सबकी सहायता करना आदि)
उत्तर

विराटता का अर्थ बड़ा काम करना नहीं, बड़ी दृष्टि रखना है — यानी अपने से आगे देख पाना। कुछ ठोस उपाय —

  • परिवार में: घर के काम में हाथ बँटाना और यह न मानना कि रसोई या सफ़ाई किसी एक की ज़िम्मेदारी है। बड़ों की बात सुनने के लिए रोज़ थोड़ा समय रखना।
  • विद्यालय में: मध्याह्न भोजन या खेल के समय किसी को अकेला न छोड़ना। जिस विषय में आप अच्छे हैं, वह किसी साथी को सिखा देना। नई आने वाली छात्रा को कक्षा दिखा देना।
  • टीम बनाते समय: पहले उसे चुनना जिसे आमतौर पर सबसे बाद में चुना जाता है।
  • मुहल्ले में: सफ़ाई अभियान में शामिल होना, बुज़ुर्गों का सामान उठा देना, पानी की बर्बादी रोकना, त्योहार पर सिर्फ़ अपने समूह को नहीं, पूरे मुहल्ले को बुलाना।
  • भाषा में: किसी की बोली, कपड़ों या नाम पर मज़ाक न बनाना — मज़ाक ही सबसे पहली दीवार होता है।
कसौटी: हर उपाय पर एक सवाल लगाइए — “इससे कोई भीतर आया या कोई बाहर हुआ?” जो काम एक व्यक्ति को भी और भीतर ले आए, वही विराटता है। कविता का ‘सबको समेटे है’ इसी का सूत्र है।
प्र3.
(ग) ‘करोड़ों में एक ही पृथ्वी’— इस पंक्ति को पढ़कर आपके मन में क्या भाव आता है? आप इस अनोखी पृथ्वी को सुरक्षित रखने के लिए क्या-क्या करेंगे?
उत्तर

भाव — पहले आश्चर्य, फिर ज़िम्मेदारी। करोड़ों पिंडों में केवल यही एक ऐसी है जहाँ हवा, पानी और जीवन है। जो चीज़ ‘करोड़ों में एक ही’ हो, उसका कोई दूसरा विकल्प नहीं होता — बिगड़ जाए तो जाने के लिए कोई और घर नहीं।

मैं क्या करूँगा/करूँगी —

  • पानी बचाना — नल बंद रखना, टपकते नल की मरम्मत करवाना, वर्षा-जल संचयन के बारे में घर में बात करना।
  • बिजली बचाना — कमरे से निकलते समय पंखा-बत्ती बंद करना।
  • प्लास्टिक कम करना — कपड़े का थैला साथ रखना, एक बार इस्तेमाल होने वाली बोतलें न लेना।
  • पेड़ लगाना और लगे हुए पेड़ों की देखभाल करना — लगाने से अधिक कठिन बचाना है।
  • कूड़े को गीले-सूखे में अलग करना और कागज़ दोनों ओर से लिखना।
  • पास की दूरी पैदल या साइकिल से तय करना।
  • अपने मुहल्ले में इनकी चर्चा करना — अकेले किया गया काम एक घर बचाता है, मिलकर किया गया काम मुहल्ला।
याद रखिए: ये सब छोटे काम हैं, और कविता का सबक भी यही है — बड़े ब्रह्मांड में हमारा हाथ बहुत छोटा है, पर वह छोटा हाथ भी अपनी जगह पूरा काम कर सकता है
प्र4.
(घ) कविता हमें ‘अपने को दूजे का स्वामी बताने’ के प्रति सचेत करती है। आप अपने किन-किन गुणों को प्रबल करेंगे ताकि आपमें ऐसा भाव न आए?
उत्तर

‘स्वामी’ बनने का भाव अचानक नहीं आता; वह छोटी-छोटी आदतों से बनता है। इसलिए उसकी काट भी आदतों में ही है।

गुणवह रोज़ कैसे दिखेगाकिस भाव को रोकेगा
विनम्रताअपनी उपलब्धि का ढिंढोरा न पीटना; गलती मान लेनाअहं
सुनने की आदतबीच में न टोकना; दूसरे की बात पूरी सुनकर उत्तर देनावर्चस्व
समानता का भावघर में काम करने वालों से भी उसी शिष्टता से बोलनाऊँच-नीच
सहानुभूतियह सोचना कि दूसरे की जगह होता तो मुझे कैसा लगताघृणा
बाँटनापुस्तक, नोट्स, खाना और अवसर बाँटनास्वार्थ
दूसरे की सफलता पर खुशीजीतने वाले को सचमुच बधाई देनाईर्ष्या
सबसे कारगर उपाय: अपना अनुपात याद रखना। जिसे यह याद रहता है कि वह अनगिन नक्षत्रों के बीच एक छोटे ग्रह का एक छोटा-सा जीव है, उसके भीतर किसी का स्वामी बनने की इच्छा टिकती ही नहीं। इसीलिए यह कविता उपदेश नहीं देती — वह सिर्फ़ नाप दिखा देती है
प्र5.
(ङ) अपने जीवन में ऐसी तीन ‘दीवारों’ के विषय में सोचिए जो आपने स्वयं खड़ी की हैं (जैसे— डर, संकोच आदि)। फिर एक योजना बनाइए कि आप उन्हें कैसे तोड़ेंगे? क्या समाज में भी ऐसी दीवारें होती हैं? उन्हें गिराने में हम कैसे सहायता कर सकते हैं?
उत्तर

पहले अपनी दीवारें पहचानिए, फिर हर एक के लिए एक छोटा-सा पहला कदम तय कीजिए। योजना तभी काम करती है जब पहला कदम इतना छोटा हो कि कल ही उठाया जा सके।

मेरी दीवारवह क्या रोकती हैपहला कदम
कक्षा में प्रश्न पूछने का संकोचशंका मन में ही रह जाती हैहर दिन कम से कम एक प्रश्न पूछूँगा — चाहे छोटा ही हो
गणित से डरअभ्यास से बचता हूँ, इसलिए डर और बढ़ता हैरोज़ केवल दो सवाल — पर बिना नागा
‘वह मेरे जैसा नहीं है’ वाली झिझकनए साथियों से दूरी बनी रहती हैइस सप्ताह उस साथी के पास बैठूँगा जिससे अब तक बात नहीं हुई

समाज की दीवारें और हमारी भूमिका — हाँ, समाज में भी ऐसी दीवारें हैं — जाति, धर्म, जेंडर, अमीरी-गरीबी, भाषा और क्षेत्र की। हम इन्हें ऐसे कमज़ोर कर सकते हैं —

  • अपने आसपास किसी को नाम, जाति, रंग, बोली या शरीर के कारण चिढ़ाया जाए तो चुप न रहना।
  • विद्यालय के समूहों में सबको शामिल करना — विशेष आवश्यकता वाले साथियों को भी।
  • घर पर टोकना, जब कोई किसी समूह के बारे में सब-को-एक-जैसा मान लेने वाली बात कहे।
  • ऐसे आयोजनों में भाग लेना जहाँ अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग साथ काम करते हैं — खेल, श्रमदान, नाटक।
क्यों यही तरीका: कविता की क्रिया ‘उठाता है’ है — दीवारें अपने-आप नहीं बनतीं, आदमी उन्हें बनाता है। जिसे बनाया गया है, उसे गिराया भी उसी तरह जा सकता है — एक-एक ईंट, एक-एक दिन
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