मल्हार अध्याय 9 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “अनगिन नक्षत्रों में / पृथ्वी एक छोटी / करोड़ों में एक ही।”
उत्तर

भावार्थ — असंख्य तारों-नक्षत्रों के बीच हमारी पृथ्वी एक छोटा-सा गोला भर है; करोड़ों पिंडों में से बस एक।

पर इन तीन पंक्तियों में दो अर्थ एक साथ चल रहे हैं, और यही इनका सौंदर्य है। ‘करोड़ों में एक ही’ का पहला अर्थ है — करोड़ों में से महज़ एक, यानी नगण्य। दूसरा अर्थ है — करोड़ों में केवल एक ऐसी, यानी अनोखी, अकेली, जिस पर जीवन है। कवि दोनों अर्थ जान-बूझकर एक साथ रखते हैं।

यह क्यों काम करता है: इससे पाठक को एक ही साँस में दो बातें मिलती हैं — विनम्रता (हम बहुत छोटे हैं) और ज़िम्मेदारी (जो चीज़ करोड़ों में एक ही है, उसे सँभालना ही होगा)। यदि कवि केवल ‘छोटी’ कहते तो निराशा आती; ‘एक ही’ जोड़कर वे उसी छोटेपन को मूल्यवान बना देते हैं।
शब्द पर ध्यान: ‘अनगिन’ = अनगिनत। यह अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण है — कवि गिनती नहीं देते, गिनती की असंभवता देते हैं। बड़ी संख्या बताने से अधिक असर संख्या के छूट जाने का पड़ता है।
प्र2.
(ख) “संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है / अपने को दूजे का स्वामी बताता है।”
उत्तर

भावार्थ — इतना छोटा आदमी गिनती से परे, शंख जितनी अनगिनत दीवारें खड़ी करता रहता है और खुद को दूसरे का मालिक घोषित करता है।

यहाँ दो युक्तियाँ एक साथ चलती हैं —

  • मुहावरा: ‘दीवारें उठाना’ का अर्थ ईंट-गारे की दीवार बनाना नहीं, भेद खड़े करना है — जाति, धर्म, भाषा, अमीरी-गरीबी, देश की सीमाओं की दीवारें।
  • अतिशयोक्ति: ‘संख्यातीत शंख सी’ — शंख भारतीय संख्या-प्रणाली की एक विशाल संख्या है (1017, यानी 100 पद्म)। कवि दीवारों को उसी माप से नापते हैं।
असली चोट कहाँ है: ठीक पहले कविता ने आदमी को नक्षत्रों के आगे धूल-कण बताया था। अब वही धूल-कण शंख जितनी दीवारें बनाता है और स्वामी बनने चलता है। छोटे कर्ता के साथ इतना बड़ा माप जोड़ते ही अनुपात बिगड़ जाता है — और बिगड़ा हुआ अनुपात ही हास्यास्पद लगता है। कवि को कुछ कहना नहीं पड़ता; व्यंग्य आँकड़े से पैदा होता है
प्र3.
(ग) “देशों की कौन कहे / एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है।”
उत्तर

भावार्थ — देशों के बीच की दीवारों की तो बात ही छोड़िए; आदमी एक ही छोटे-से कमरे के भीतर दो अलग-अलग दुनिया बना लेता है।

‘देशों की कौन कहे’ मुहावरेदार प्रश्न-शैली है — इसका अर्थ है ‘उनकी तो चर्चा ही क्या’। कवि पूछ नहीं रहे, वे प्रश्न की शक्ल में व्यंग्य कर रहे हैं।

यह अंत ही क्यों: कविता की शुरुआत ‘दो व्यक्ति कमरे में’ से हुई थी। बीच में वह ब्रह्मांड तक गई। अब वह ठीक उसी कमरे में लौट आती है — पर लौटती है एक नई खबर लेकर: उन दो व्यक्तियों के बीच भी अब एक दीवार खड़ी हो चुकी है। सबसे बड़े विस्तार के बाद सबसे छोटा बँटवारा — यही विरोधाभास कविता की सबसे तेज़ चोट है।
‘दो दुनिया’ का अर्थ: दुनिया यहाँ ज़मीन नहीं, सोच है। एक ही कमरे में रहते हुए भी जब दो लोग एक-दूसरे से बात करना बंद कर देते हैं, तो कमरा एक रहकर भी दो हो जाता है।
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