सही उत्तर — ★ ब्रह्मांड की तुलना में अत्यंत सूक्ष्म।
कविता आदमी को नापने के लिए एक सीढ़ी बनाती है — आदमी कमरे से छोटा, कमरा घर में, घर मुहल्ले में, मुहल्ला नगर में, नगर प्रदेश में, प्रदेश देश में, देश पृथ्वी पर, पृथ्वी अनगिन नक्षत्रों में ‘करोड़ों में एक ही’, और वह सब भी ‘लाखों ब्रह्मांडों’ में से एक ब्रह्मांड के भीतर। हर सीढ़ी पर आदमी का आकार घटता जाता है। इसी को कवि ‘यह है अनुपात / आदमी का विराट से’ कहकर सीधे बता देते हैं।