मल्हार अध्याय 9 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कविता के अनुसार मानव किन कारणों से स्वयं को सीमाओं में बाँधता चला जाता है?
उत्तर

कविता पाँच कारण नाम लेकर गिनाती है — ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास। इन्हीं में ‘लीन’ रहकर आदमी ‘संख्यातीत शंख सी दीवारें’ उठाता चला जाता है।

इन पाँचों को अलग-अलग देखिए तो हर एक अपनी तरह की दीवार बनाता है —

  • ईर्ष्या दूसरे के बढ़ने को अपनी हार मान लेती है, इसलिए वह दूसरे को दूर रखती है।
  • अहं अपने को ऊँचा मानता है, इसलिए बराबरी की जगह नहीं छोड़ता।
  • स्वार्थ हर चीज़ को ‘मेरा’ और ‘तेरा’ में बाँट देता है — और यही बँटवारा सीमा है।
  • घृणा दूसरे को अपने से नीचा ठहराती है।
  • अविश्वास सबसे ख़तरनाक है, क्योंकि वह बात करने का रास्ता ही बंद कर देता है — और जहाँ बात बंद, वहाँ दीवार पक्की।
असल कारण: इन पाँचों के नीचे एक ही जड़ है — अपने अनुपात को भूल जाना। जो आदमी यह याद रखता है कि वह अनगिन नक्षत्रों के बीच एक छोटे ग्रह का छोटा-सा जीव है, उसके भीतर स्वामी बनने की इच्छा टिक ही नहीं सकती।
प्र2.
(ख) यदि आपको इस कविता की एक पंक्ति को दीवार पर लिखना हो, जो आपको प्रतिदिन प्रेरित करे तो आप कौन-सी पंक्ति चुनेंगे और क्यों?
उत्तर

यह आपकी अपनी पसंद का प्रश्न है, इसलिए उत्तर में पंक्ति + कारण दोनों होने चाहिए। कारण बताते समय यह ज़रूर लिखिए कि वह पंक्ति आपके रोज़ के किस काम या किस आदत को बदलेगी।

नमूना उत्तर: “मैं लिखूँगी — ‘करोड़ों में एक ही’। यह पंक्ति दो बातें एक साथ कहती है, इसीलिए मैंने इसे चुना। एक ओर यह याद दिलाती है कि करोड़ों में मैं भी बस एक हूँ, इसलिए घमंड करने का कोई कारण नहीं। दूसरी ओर यह कहती है कि करोड़ों में एक ही ऐसी पृथ्वी है — यानी जो अकेली है, वह अनमोल है। रोज़ सुबह इसे पढ़कर मुझे दो काम याद आएँगे — किसी से बड़प्पन न जताना, और अपने आसपास की चीज़ों को — पेड़, पानी, अपने साथी — मामूली न समझना।”
दूसरे अच्छे विकल्प: ‘सबको समेटे है’ — साथ लेकर चलने की याद; ‘यह है अनुपात / आदमी का विराट से’ — अपनी जगह पहचानने की याद।
प्र3.
(ग) कवि ने मानव की सीमाओं और कमियों की ओर ध्यान दिलाया है, लेकिन कहीं भी क्रोध नहीं दिखाया। आपको इस कविता का भाव कैसा लगा— व्यंग्य, करुणा, चिंता या कुछ और? क्यों?
उत्तर

मेरे विचार में कविता का मूल भाव चिंता है, और उसे कहने का ढंग मृदु व्यंग्य। करुणा भी नीचे-नीचे बहती है, पर वह ऊपर दिखाई नहीं देती।

प्रमाण पंक्तियों से —

  • व्यंग्य: ‘अपने को दूजे का स्वामी बताता है’ और ‘देशों की कौन कहे’। यहाँ कवि आरोप नहीं लगाते, बस आदमी का काम दोहरा देते हैं — और वह अपने-आप हास्यास्पद लगने लगता है।
  • चिंता: ‘इस पर भी आदमी…’ में जो ‘इस पर भी’ है, वही चिंता की आवाज़ है — इतना सब जान लेने के बाद भी आदमी नहीं बदलता।
  • करुणा: कवि आदमी को दोषी कहकर छोड़ नहीं देते; वे उसे विराट के सामने रखकर उसकी छोटी-सी हस्ती दिखाते हैं। यह डाँट नहीं, तरस है।
क्रोध क्यों नहीं है: क्रोध में कवि को स्वयं ऊँचे मंच पर खड़ा होना पड़ता, यानी ‘अपने को दूजे का स्वामी’ बताना पड़ता — ठीक वही दोष जिसकी कविता आलोचना कर रही है। इसलिए कवि केवल अनुपात दिखाते हैं, फ़ैसला नहीं सुनाते। तथ्य को सामने रख देना यहाँ गुस्से से कहीं ज़्यादा असर करता है।
प्र4.
(घ) आपके अनुसार ‘दीवारें उठाना’ केवल ईंट-पत्थर से जुड़ा काम है या कुछ और भी हो सकता है? अपने विचारानुसार समझाइए।
उत्तर

कविता में ‘दीवारें उठाना’ ईंट-पत्थर का काम बिलकुल नहीं है — यह एक मुहावरा है, जिसका अर्थ है लोगों के बीच भेद और दूरी खड़ी करना

सबसे पक्का सबूत गिनती में ही है। ईंट की दीवारें ‘संख्यातीत शंख’ जितनी नहीं हो सकतीं — इतनी दीवारें बनाने के लिए न जगह है, न सामग्री। जो चीज़ इतनी असंख्य हो सकती है, वह अनदेखी ही होगी।

ये अनदेखी दीवारें कैसी होती हैं —

  • जाति, धर्म, भाषा और प्रांत के नाम पर बनाए गए भेद।
  • अमीर-गरीब का भेद, लड़का-लड़की का भेद।
  • ‘हम’ और ‘वे’ की सोच — देशों की सीमाएँ इसी सोच का बड़ा रूप हैं।
  • सबसे छोटी दीवार: किसी से बोलना बंद कर देना। कविता का अंत इसी दीवार पर होता है — ‘एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है’।
ध्यान दीजिए: क्रिया ‘उठाना’ है, ‘बनना’ नहीं। यानी ये दीवारें अपने-आप नहीं खड़ी होतीं — कोई उन्हें उठाता है। और जिसे उठाया जा सकता है, उसे गिराया भी जा सकता है। कविता की उम्मीद इसी एक क्रिया में छिपी है।
प्र5.
(ङ) मानवता के विकास में सहयोग, समर्पण और सहिष्णुता जैसी सकारात्मक प्रवृत्तियाँ ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ और घृणा जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों से कहीं अधिक प्रभावी हैं। उदाहरण देकर बताइए कि सहिष्णुता या सहयोग के कारण समाज में कैसे परिवर्तन आए हैं?
उत्तर

यह बात इतिहास और रोज़मर्रा — दोनों से सिद्ध होती है। कुछ उदाहरण —

  • स्वतंत्रता संग्राम: गांधी जी का अहिंसक आंदोलन सहयोग और सहनशीलता पर टिका था। अलग-अलग भाषा, धर्म और प्रांत के लोग एक साथ खड़े हुए, तभी इतनी बड़ी सत्ता के सामने टिक पाए।
  • संविधान और समानता: भारत ने अपने संविधान में सबको समान अधिकार दिए — यह किसी एक समूह की जीत नहीं, अलग-अलग विचारों के लोगों के आपसी समझौते का फल है।
  • बीमारी के विरुद्ध: चेचक (स्मॉलपॉक्स) दुनिया से मिटी, क्योंकि अलग-अलग देशों ने टीके, आँकड़े और डॉक्टर आपस में बाँटे। अकेला कोई देश यह नहीं कर सकता था।
  • विज्ञान और अंतरिक्ष: अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन कई देशों ने मिलकर बनाया और चलाया। जो देश ज़मीन पर एक-दूसरे से असहमत रहते हैं, वे भी वहाँ साथ काम करते हैं।
  • आपका अपना मुहल्ला: बाढ़, भूकंप या किसी दुर्घटना के समय लोग जात-पाँत भूलकर एक साथ खाना और आश्रय जुटाते हैं। संकट में जो पहली चीज़ गिरती है, वह दीवार ही होती है।
ऐसा क्यों होता है: ईर्ष्या और स्वार्थ बाँटकर घटाते हैं — जो मेरा है, वह तेरा नहीं। सहयोग जोड़कर बढ़ाता है — ज्ञान, श्रम और संसाधन बाँटने पर घटते नहीं, कई गुना हो जाते हैं। इसीलिए दीवार उठाने वाला अकेला रह जाता है और साथ चलने वाला आगे बढ़ जाता है।
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