कविता पाँच कारण नाम लेकर गिनाती है — ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास। इन्हीं में ‘लीन’ रहकर आदमी ‘संख्यातीत शंख सी दीवारें’ उठाता चला जाता है।
इन पाँचों को अलग-अलग देखिए तो हर एक अपनी तरह की दीवार बनाता है —
- ईर्ष्या दूसरे के बढ़ने को अपनी हार मान लेती है, इसलिए वह दूसरे को दूर रखती है।
- अहं अपने को ऊँचा मानता है, इसलिए बराबरी की जगह नहीं छोड़ता।
- स्वार्थ हर चीज़ को ‘मेरा’ और ‘तेरा’ में बाँट देता है — और यही बँटवारा सीमा है।
- घृणा दूसरे को अपने से नीचा ठहराती है।
- अविश्वास सबसे ख़तरनाक है, क्योंकि वह बात करने का रास्ता ही बंद कर देता है — और जहाँ बात बंद, वहाँ दीवार पक्की।