प्र1.
इस कविता में ‘मानव’ और ‘ब्रह्मांड’ के उदाहरण द्वारा व्यक्ति के अल्पत्व और सृष्टि की विशालता के अनुपात को दिखाया गया है। अपने साथियों के साथ मिलकर विचार कीजिए कि मानव को ब्रह्मांड जैसा विस्तार पाने के लिए इनमें से किन-किन गुणों या मूल्यों की आवश्यकता होगी? आपने ये गुण क्यों चुने, यह भी साझा कीजिए।
उत्तर
पृष्ठ 130 पर ‘मानव’ के चारों ओर जो शब्द दिए गए हैं, वे दो साफ़ हिस्सों में बँट जाते हैं। पहले उन्हें छाँटिए, फिर चुनिए।
| जो विस्तार देते हैं (चुनिए) | जो सिकोड़ते हैं (छोड़िए) |
|---|---|
| सहअस्तित्व, सौहार्द, विविधता, समावेशिता, सहनशीलता, संतुलन, स्वतंत्रता, शांति, विस्तार, विशालता | वर्चस्व, सत्ता, अहंकार, ईर्ष्या, स्वार्थ, विरोध, मतभेद, अविश्वास, सीमाबद्धता, लघुता |
चुनाव और कारण —
- सहअस्तित्व और समावेशिता — ब्रह्मांड की सबसे बड़ी विशेषता उसका आकार नहीं, उसका समेटना है: ‘सबको समेटे है / परिधि नभ गंगा की’। जो सबको जगह देता है, वही बड़ा होता है।
- सौहार्द और सहनशीलता — ये ठीक उन्हीं भावों की काट हैं जिन्हें कविता गिनाती है (ईर्ष्या, घृणा, अविश्वास)। जिस भाव से दीवार बनती है, उसका उलटा भाव ही दीवार गिराता है।
- विविधता — ‘हर ब्रह्मांड में / कितनी ही पृथ्वियाँ / कितनी ही भूमियाँ / कितनी ही सृष्टियाँ’ — सृष्टि एक जैसी नहीं, अनेक तरह की है। जो अलगपन को स्वीकार करता है, वह सृष्टि जैसा हो जाता है।
- संतुलन — ‘अनुपात’ शब्द का ही दूसरा नाम संतुलन है। अपनी जगह ठीक-ठीक जान लेना ही संतुलन है।
मूल तर्क: कविता में आदमी का छोटापन उसका शरीर नहीं, उसका व्यवहार है — दीवार उठाना और स्वामी बनना। इसलिए बड़ा होने का रास्ता भी शरीर या शक्ति नहीं, व्यवहार ही है। जो जितने लोगों को अपने भीतर जगह देता है, वह उतना ही बड़ा है। यही ब्रह्मांड का तरीका है।