मल्हार अध्याय 9 अनुमान और कल्पना

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) मान लीजिए कि आप एक दिन के लिए पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित कर सकते हैं। अब आप मानव की कौन-कौन सी आदतों को बदलना चाहेंगे? क्यों?
उत्तर

यह कल्पना का प्रश्न है, पर इसका उत्तर कविता से जुड़ा रहना चाहिए। सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप वही आदतें चुनें जिन्हें कविता स्वयं गिनाती है — ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास — और हर आदत के बदले में एक ठोस बदलाव बताएँ।

नमूना उत्तर: “एक दिन के लिए ब्रह्मांड मेरे हाथ में हो तो मैं तीन आदतें बदलूँगा।
पहली — दीवार उठाने की आदत। मैं चाहूँगा कि उस दिन कोई किसी से यह न पूछे कि वह किस जाति, धर्म या देश का है। कारण यह है कि कविता के अनुसार आदमी की सारी दीवारें ‘संख्यातीत’ हैं, और वे सब उसी एक सवाल से शुरू होती हैं।
दूसरी — स्वामी बनने की आदत। उस दिन कोई किसी को हुक्म न दे, केवल निवेदन करे। मुझे लगता है ‘अपने को दूजे का स्वामी बताता है’ ही सारी लड़ाइयों की जड़ है।
तीसरी — अपने को केंद्र मानने की आदत। मैं हर व्यक्ति को एक बार रात के आकाश में अनगिन नक्षत्र दिखाना चाहूँगा, ताकि उसे अपना असली अनुपात याद आ जाए। जिसे अपना आकार याद रहता है, वह घमंड नहीं कर पाता।”
प्र2.
(ख) यदि आप अंतरिक्ष यात्री बन जाएँ और ब्रह्मांड के किसी दूसरे भाग में जाएँ तो आप किस स्थान (कमरा, घर, नगर आदि) को सबसे अधिक याद करेंगे और क्यों?
उत्तर

उत्तर में एक ही जगह चुनिए और उसे ब्योरे से लिखिए — कौन-सी आवाज़, कौन-सी गंध, कौन-सा कोना। कारण बताते समय यह भी जोड़िए कि वह जगह आपके लिए ईंट-गारे से बढ़कर क्यों है।

नमूना उत्तर: “मैं अपने घर की छत को सबसे अधिक याद करूँगी। कविता कहती है कि कमरा घर में है और घर मुहल्ले में — पर मेरे लिए छत वह जगह है जहाँ ये सारी सीढ़ियाँ एक साथ दिखती हैं। वहाँ से मुझे अपना मुहल्ला भी दिखता है, दूर का नगर भी, और सिर उठाऊँ तो वही नक्षत्र जिनकी बात कविता करती है। शाम की अज़ान, मंदिर की घंटी और नीचे गली में खेलते बच्चों की आवाज़ — तीनों एक साथ वहीं सुनाई देती हैं। अंतरिक्ष में सब कुछ होगा, पर वह मिली-जुली आवाज़ नहीं होगी। मुझे लगता है हम जगह को नहीं, उस जगह पर बने रिश्तों को याद करते हैं।”
प्र3.
(ग) मान लीजिए कि एक बच्चा या बच्ची कविता में उल्लिखित सभी सीमाओं को पार कर सकता या सकती है— वह कहाँ तक जाएगा या जाएगी और क्या देखेगा या देखेगी? एक कल्पनात्मक यात्रा-वृत्तांत लिखिए।
उत्तर

कैसे लिखें: कविता का क्रम ही आपकी यात्रा का नक्शा है — कमरा → घर → मुहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी → नक्षत्र → नभ गंगा → ब्रह्मांड। हर पड़ाव पर एक चीज़ बताइए जो छोटी होती जाती है और एक चीज़ जो बड़ी होती जाती है। अंत में वापस लौटिए — जैसे कविता लौटती है।

नमूना उत्तर (संक्षेप में):
“दरवाज़ा खोलते ही मैं छत के ऊपर था। नीचे मेरा घर एक डिब्बे जैसा लग रहा था, जिसकी खिड़की से अब भी बत्ती जल रही थी।
थोड़ा और ऊपर — मुहल्ला हथेली भर का हो गया। जिस गली में मैं और मेरा दोस्त झगड़ पड़े थे, वह अब एक पतली लकीर थी। मुझे हँसी आई कि इतनी छोटी लकीर पर हम दो दिन नहीं बोले थे।
नगर एक चमकता जाल बन गया, प्रदेश उस जाल का एक कोना, और देश एक रंगीन टुकड़ा — पर आश्चर्य यह कि ऊपर से देश की कोई सीमा-रेखा दिखाई ही नहीं दी। नक्शे में जो मोटी लकीर थी, ज़मीन पर वह कहीं नहीं थी।
फिर पृथ्वी — नीली, अकेली, बादलों में लिपटी हुई। तब समझ आया कि ‘करोड़ों में एक ही’ का असली अर्थ क्या है। चारों ओर अनगिन नक्षत्र थे, पर हरा-नीला केवल यही एक।
नभ गंगा की परिधि तक पहुँचकर पृथ्वी एक चमकीले कण-सी रह गई, और तब मुझे डर लगा — किसी बड़े जीव का नहीं, अपने छोटेपन का।
लौटते हुए मैं सबसे पहले उसी गली में उतरा और अपने दोस्त से बोल पड़ा। इतनी दूर जाकर मैंने बस एक बात सीखी — जितनी ऊँचाई से देखो, दीवारें उतनी ही छोटी दिखती हैं।”
प्र4.
(घ) इस कविता को पढ़ने के बाद, आप स्वयं को ब्रह्मांड के अनुपात में कैसा अनुभव करते हैं? एक अनुच्छेद लिखिए— “मैं ब्रह्मांड में एक… हूँ।”
उत्तर

क्या होना चाहिए: पहली पंक्ति में एक उपमा चुनिए (कण, बूँद, बीज, अक्षर, तारा…), फिर दो-तीन वाक्यों में बताइए कि उस उपमा से आपको छोटापन महसूस हुआ या ज़िम्मेदारी।

नमूना उत्तर: “मैं ब्रह्मांड में एक बीज हूँ। बीज सबसे छोटी चीज़ों में से एक है — मुट्ठी में सौ समा जाएँ। पर उसी बीज के भीतर एक पूरा पेड़ बंद रहता है, जिसकी छाया में आगे चलकर कई लोग बैठेंगे। कविता पढ़कर मुझे अपना छोटापन तो समझ आया, पर निराशा नहीं हुई। नक्षत्रों के आगे मैं कुछ भी नहीं हूँ, यह सच है; लेकिन अपने कमरे, अपने घर और अपनी कक्षा में मैं दीवार भी बना सकता हूँ और पुल भी। इतना बड़ा ब्रह्मांड मेरे हाथ में नहीं है — पर एक कमरा तो है, और कविता के अनुसार आदमी की सबसे बड़ी गलती उसी एक कमरे में होती है।”
प्र5.
(ङ) मान लीजिए कि किसी दूसरे संसार से आपके पास संदेश आया है कि उसे पृथ्वी के किसी व्यक्ति की आवश्यकता है। आप किसे भेजना चाहेंगे और क्यों?
उत्तर

इस प्रश्न में नाम से अधिक कसौटी महत्वपूर्ण है — आप किस गुण के आधार पर चुन रहे हैं। पहले गुण तय कीजिए, फिर व्यक्ति।

नमूना उत्तर: “मैं किसी राजा, सेनापति या सबसे धनी व्यक्ति को नहीं भेजूँगी। जो ‘अपने को दूजे का स्वामी’ मानता है, वह किसी नए संसार में भी सबसे पहले वही करेगा जो कविता कहती है — दीवार उठाएगा।
मैं किसी शिक्षिका को भेजूँगी। कारण यह है कि शिक्षक का काम ही जोड़ना है — वह पहले सुनता है, फिर बोलता है, और अपने से अलग सोचने वाले को भी जगह देता है। नए संसार में सबसे पहले भाषा और भरोसा बनाना होगा, हुकूमत नहीं। और यदि वह पृथ्वी का परिचय दे, तो मैं चाहूँगी कि वह यही कहे — हम ‘करोड़ों में एक ही’ पृथ्वी से आए हैं, और अभी हम आपस में मिलकर रहना सीख ही रहे हैं।”
प्र6.
(च) कविता में “ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ” जैसी प्रवृत्तियों की चर्चा की गई है। कल्पना कीजिए कि एक दिन के लिए ये भाव सभी व्यक्तियों में समाप्त हो जाएँ तो उससे समाज में क्या-क्या परिवर्तन होगा?
उत्तर

बदलाव को छोटे से बड़े की ओर लिखिए — ठीक उसी क्रम में जिसमें कविता चलती है। इससे उत्तर में कविता की बनावट भी झलक जाएगी।

  • कमरे में: दो लोग जो नाराज़ होकर बैठे थे, बोलने लगेंगे। ‘दो दुनिया’ फिर से एक कमरा बन जाएगी।
  • घर और मुहल्ले में: पड़ोसी का दरवाज़ा खटखटाने में झिझक नहीं होगी। छोटी-सी बात पर होने वाले झगड़े खत्म हो जाएँगे।
  • विद्यालय में: कोई अंक छिपाकर नहीं रखेगा; जो जिसमें कमज़ोर है, उसे बाकी सिखा देंगे। नकल की ज़रूरत ही नहीं बचेगी।
  • नगर और देश में: जमाखोरी बंद, भ्रष्टाचार बंद — क्योंकि दोनों की जड़ स्वार्थ है। अदालतों में मुकदमे घट जाएँगे।
  • दुनिया में: सीमाओं पर तनाव घटेगा, हथियारों पर खर्च होने वाला धन दवा, पानी और पढ़ाई पर लगेगा।
पर एक दिन काफ़ी नहीं: दूसरे दिन ये भाव लौट सकते हैं, क्योंकि ईर्ष्या और अहं आदत हैं, कानून नहीं। इसलिए असली बदलाव तभी होगा जब यह एक दिन आदत बन जाए — और आदत रोज़ के छोटे-छोटे कामों से बनती है: किसी को अनदेखा न करना, माफ़ी माँग लेना, बाँटकर खाना।
प्र7.
(छ) यदि आपको इस कविता का एक पोस्टर बनाना हो जिसमें इसके मूल भाव— ‘विराटता और लघुता’ तथा ‘मनुष्य का भ्रम’— दर्शाया जाए तो आप क्या चित्र, प्रतीक और शब्द उपयोग करेंगे? संक्षेप में बताइए।
उत्तर

पोस्टर में तीनों चीज़ें एक साथ दिखनी चाहिए — विराटता, लघुता और भ्रम। सबसे सरल उपाय यह है कि पोस्टर को दो भागों में बाँट दिया जाए।

  • चित्र (ऊपर का बड़ा भाग): गहरा नीला-काला आकाश, अनगिन तारे, बीच में एक छोटी-सी नीली पृथ्वी। पृथ्वी इतनी छोटी कि उस पर उँगली रखनी पड़े।
  • चित्र (नीचे का छोटा भाग): एक कमरा, जिसके बीचोंबीच एक दीवार खड़ी है और दोनों ओर एक-एक व्यक्ति पीठ किए बैठा है। दोनों के सिर के ऊपर एक-एक छोटा गोला, जिसमें वही बड़ा आकाश दिख रहा है — पर वे उसे देख नहीं रहे।
  • प्रतीक: दीवार (कृत्रिम सीमा), तराज़ू (अनुपात), आवर्धक लेंस जिसके नीचे आदमी खुद को बड़ा देख रहा है (भ्रम), और एक खुला दरवाज़ा (उम्मीद)।
  • शब्द: ऊपर बड़े अक्षरों में “करोड़ों में एक ही”, नीचे छोटे अक्षरों में “एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है”। बीच में एक ही पंक्ति — “यह है अनुपात”
यह डिज़ाइन क्यों: ऊपर का भाग जान-बूझकर बड़ा और नीचे का जान-बूझकर छोटा रखा गया है, ताकि पोस्टर का आकार ही अनुपात बता दे — देखने वाले को पढ़ने से पहले महसूस हो जाए।
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