यह कल्पना का प्रश्न है, पर इसका उत्तर कविता से जुड़ा रहना चाहिए। सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप वही आदतें चुनें जिन्हें कविता स्वयं गिनाती है — ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास — और हर आदत के बदले में एक ठोस बदलाव बताएँ।
पहली — दीवार उठाने की आदत। मैं चाहूँगा कि उस दिन कोई किसी से यह न पूछे कि वह किस जाति, धर्म या देश का है। कारण यह है कि कविता के अनुसार आदमी की सारी दीवारें ‘संख्यातीत’ हैं, और वे सब उसी एक सवाल से शुरू होती हैं।
दूसरी — स्वामी बनने की आदत। उस दिन कोई किसी को हुक्म न दे, केवल निवेदन करे। मुझे लगता है ‘अपने को दूजे का स्वामी बताता है’ ही सारी लड़ाइयों की जड़ है।
तीसरी — अपने को केंद्र मानने की आदत। मैं हर व्यक्ति को एक बार रात के आकाश में अनगिन नक्षत्र दिखाना चाहूँगा, ताकि उसे अपना असली अनुपात याद आ जाए। जिसे अपना आकार याद रहता है, वह घमंड नहीं कर पाता।”