प्र1.
जैसे पृथ्वी अनगिनत नक्षत्रों में एक छोटा-सा ग्रह है, वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह विशेष आवश्यकता वाला हो या न हो, समाज का एक महत्वपूर्ण भाग है। एक समूह चर्चा आयोजित करें जिसमें सभी मानवों के लिए समान अवसरों की आवश्यकता पर बल दिया जाए। (भले ही उनका जेंडर, आय, मत, विश्वास, शारीरिक रूप, रंग या आकार-प्रकार आदि कैसा भी हो)
उत्तर
चर्चा कैसे चलाएँ —
- कक्षा को छोटे समूहों में बाँटिए। हर समूह एक क्षेत्र ले — विद्यालय, खेल, यात्रा, नौकरी, सार्वजनिक स्थान।
- हर समूह दो सूचियाँ बनाए: कहाँ अवसर बराबर नहीं मिलते और उसे बराबर करने के लिए क्या बदलना होगा।
- अंत में सब मिलकर विद्यालय के लिए पाँच नियम तय करें और उन्हें कक्षा में लगाएँ।
चर्चा में उठने योग्य बिंदु —
- पहुँच (एक्सेस): क्या हमारे विद्यालय में रैंप है? पुस्तकालय और शौचालय तक हर विद्यार्थी स्वयं पहुँच सकता है?
- भागीदारी: खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में क्या हर कोई शामिल हो पाता है, या कुछ लोग हमेशा दर्शक ही रहते हैं?
- भाषा: हम एक-दूसरे को किन नामों से पुकारते हैं? कोई नाम किसी की कमी को उछालता तो नहीं?
- अवसर बनाम सहानुभूति: समानता का अर्थ दया नहीं, बराबरी का मौका है। किसी के लिए ऊँची कक्षा तक जाने का रास्ता बनाना दया नहीं, उसका अधिकार है।
- संविधान: भारत का संविधान अनुच्छेद 14–15 में सबको समानता और भेदभाव से सुरक्षा का अधिकार देता है।
कविता से जोड़: जो कविता कहती है — ‘सबको समेटे है’ — समावेशन उसी का सामाजिक रूप है। और ‘संख्यातीत शंख सी दीवारें’ ठीक उसका उलटा। इस चर्चा का असली उद्देश्य यही देखना है कि हमारे अपने विद्यालय में कौन-सी दीवार अब भी खड़ी है।