★ राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी और ★ राष्ट्र स्वाधीन बनेगा — दोनों उत्तर पाठ से निकलते हैं।
नेताजी की तीन पंक्तियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। उन्हें क्रम में रखिए और उत्तर स्वयं दिख जाएगा —
1. “उस समाज में प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर पाए।”
2. “जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा,”
3. “वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।”
कड़ी कैसे बनती है: जब पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका कुछ लोगों तक सीमित रहता है, तो देश की अधिकांश प्रतिभा बिना काम के रह जाती है। मौका सबको मिलेगा तो हर व्यक्ति अपने योग्य काम में लगेगा — यही श्रम-शक्ति का बढ़ना है। और जो राष्ट्र अपनी सारी शक्ति काम में लगा लेता है, उसे बाहर के सहारे की ज़रूरत नहीं रहती — यही स्वाधीन बनना है।
बाकी दो क्यों नहीं: ‘तरुणों का साहस बढ़ेगा’ अच्छी बात है, पर पाठ इसे शिक्षा के समान अवसर का सीधा परिणाम नहीं बताता। ‘राष्ट्र स्वप्नदर्शी होगा’ तो पाठ के विरुद्ध ही चला जाता है — नेताजी स्वप्न को कर्म से जोड़ते हैं, कल्पना में खो जाने से नहीं।