मल्हार अध्याय 10 मेरी समझ से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं। (1) “उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।” इस कथन में रेखांकित शब्द ‘हम’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है? • सुभाषचंद्र बोस के लिए • देश के तरुण वर्ग के लिए • चित्तरंजन दास के लिए • भारतवासियों के लिए
उत्तर

★ देश के तरुण वर्ग के लिए — यही सबसे सही उत्तर है। ★ भारतवासियों के लिए भी लिया जा सकता है, क्योंकि तरुण उसी बड़े समुदाय का हिस्सा हैं।

“उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।”

पाठ से प्रमाण — यह भाषण नेताजी ने मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में दिया था, और भाषण के अंत में वे सुनने वालों को पुकारते हैं — “हे मेरे तरुण भाइयो!” जिनसे बात हो रही है, ‘हम’ में वे ही शामिल हैं।

दो विकल्प क्यों गलत हैं: ‘चित्तरंजन दास के लिए’ नहीं हो सकता, क्योंकि वाक्य में ‘उनके’ ही चित्तरंजन दास हैं — जिनका स्वप्न विरासत में मिला। और अकेले ‘सुभाषचंद्र बोस के लिए’ भी नहीं, क्योंकि ‘हम’ बहुवचन है; नेताजी अपने को अलग नहीं, इसी तरुण समूह के साथ गिन रहे हैं।
प्र2.
(2) स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न साकार होगा? • आर्थिक असमानता से • स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकारों से • श्रम और कर्म की मर्यादा से • जातिभेद से
उत्तर

★ श्रम और कर्म की मर्यादा से।

“जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा, वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।”

यही एकमात्र विकल्प है जिसे नेताजी ने स्वाधीन राष्ट्र की शर्त कहा है। बाकी तीन — आर्थिक असमानता, स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकार और जातिभेद — वे चीज़ें हैं जिन्हें वे उस समाज से हटाना चाहते हैं।

तर्क कैसे चलता है: नेताजी की पंक्ति में मर्यादा और स्वाधीनता के बीच सीधा जोड़ है। जिस देश में अपने हाथ का काम सम्मान पाता है, वह देश अपनी ज़रूरतें स्वयं पूरी करता है; और जो अपनी ज़रूरतें स्वयं पूरी करता है, उसे किसी बाहरी (‘विजातीय’) प्रभाव के आगे झुकना नहीं पड़ता। इसीलिए वे श्रम की प्रतिष्ठा को राजनीतिक आज़ादी जितना ही ज़रूरी मानते हैं।
प्र3.
(3) “उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।” ‘उत्तराधिकारी’ होने से क्या अभिप्राय है? • हमें उनके स्वप्नों को संजोकर रखना है • हमें भी उनकी तरह स्वप्न देखने का अधिकार है • उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है • उनके स्वप्नों पर चर्चा करने का दायित्व हमारा ही है
उत्तर

★ उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है — यह मुख्य उत्तर है। ★ हमें उनके स्वप्नों को संजोकर रखना है भी सही माना जा सकता है, क्योंकि पूरा करने से पहले सँभालना पड़ता है।

पुस्तक के शब्दकोश में उत्तराधिकारी का अर्थ है — ‘किसी के बाद उसकी संपत्ति पाने का हकदार, वारिस’। नेताजी स्वप्न को इसी तरह एक संपत्ति मानते हैं जो देशबंधु चित्तरंजन दास से उनकी पीढ़ी को मिली है।

‘कर्म’ वाला उत्तर सबसे अच्छा क्यों है: उत्तराधिकार में केवल हक़ नहीं मिलता, ज़िम्मेदारी भी मिलती है। और भाषण की अगली ही पंक्तियाँ यह ज़िम्मेदारी काम में बदल देती हैं — “इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं, भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं।” यहाँ गिनाई गई हर क्रिया कर्म की है, केवल चर्चा या भावना की नहीं। इसीलिए ‘चर्चा करने का दायित्व’ वाला विकल्प कमज़ोर पड़ जाता है, और ‘स्वप्न देखने का अधिकार’ वाला विकल्प तो बात ही उलट देता है — वारिस को अधिकार नहीं, काम मिला है।
प्र4.
(4) जब प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा और उन्नति का समान अवसर प्राप्त होगा तब— • राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी • तरुणों का साहस बढ़ेगा • राष्ट्र स्वाधीन बनेगा • राष्ट्र स्वप्नदर्शी होगा
उत्तर

★ राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी और ★ राष्ट्र स्वाधीन बनेगा — दोनों उत्तर पाठ से निकलते हैं।

नेताजी की तीन पंक्तियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। उन्हें क्रम में रखिए और उत्तर स्वयं दिख जाएगा —

1. “उस समाज में प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर पाए।”
2. “जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा,”
3. “वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।”
कड़ी कैसे बनती है: जब पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका कुछ लोगों तक सीमित रहता है, तो देश की अधिकांश प्रतिभा बिना काम के रह जाती है। मौका सबको मिलेगा तो हर व्यक्ति अपने योग्य काम में लगेगा — यही श्रम-शक्ति का बढ़ना है। और जो राष्ट्र अपनी सारी शक्ति काम में लगा लेता है, उसे बाहर के सहारे की ज़रूरत नहीं रहती — यही स्वाधीन बनना है।
बाकी दो क्यों नहीं: ‘तरुणों का साहस बढ़ेगा’ अच्छी बात है, पर पाठ इसे शिक्षा के समान अवसर का सीधा परिणाम नहीं बताता। ‘राष्ट्र स्वप्नदर्शी होगा’ तो पाठ के विरुद्ध ही चला जाता है — नेताजी स्वप्न को कर्म से जोड़ते हैं, कल्पना में खो जाने से नहीं।
प्र5.
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
उत्तर

यह कक्षा में करने की गतिविधि है। इसे ठीक से करने का तरीका यह है —

  1. हर साथी अपना चुना हुआ विकल्प बताए और साथ में पाठ की वह पंक्ति पढ़े जिसके कारण उसने वह विकल्प चुना।
  2. जहाँ दो लोगों के उत्तर अलग हैं, वहाँ तय कीजिए कि झगड़ा अर्थ का है या शब्दों का — कई बार दोनों एक ही बात अलग शब्दों में कह रहे होते हैं।
  3. अंत में देखिए कि किस उत्तर के पीछे पाठ का सीधा प्रमाण है और किसके पीछे केवल अपनी राय।
नमूना चर्चा: “मैंने प्रश्न 4 में ‘राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी’ चुना, क्योंकि उसके ठीक बाद वाली पंक्ति श्रम और कर्म की मर्यादा की बात करती है।” — “मैंने ‘राष्ट्र स्वाधीन बनेगा’ चुना, क्योंकि उसी वाक्य का अंत ‘विजातीय प्रभाव से मुक्त रहेगा’ पर होता है।” दोनों के पास प्रमाण है, इसलिए दोनों उत्तर चल सकते हैं — और यही इस प्रश्न का असली सबक है कि प्रमाण के साथ दी गई अलग राय भी सही हो सकती है
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