मल्हार अध्याय 10 स्त्री सशक्तीकरण

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) सुभाषचंद्र बोस ने स्त्रियों के लिए समान अधिकार की बात की है। अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि उन्हें कौन-कौन से विशेषाधिकार राज्य की ओर से दिए गए हैं?
उत्तर

संविधान राज्य को यह छूट देता है कि वह स्त्रियों और बच्चों के लिए विशेष व्यवस्था कर सके। इसी आधार पर अनेक विशेषाधिकार दिए गए हैं। जो आपने अपने आसपास देखे होंगे —

  • पंचायत और नगर निकायों में आरक्षण — स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हैं, इसीलिए गाँव-गाँव में महिला सरपंच और पार्षद दिखती हैं।
  • मातृत्व अवकाश और सुविधाएँ — नौकरी करने वाली स्त्री को संतान के जन्म पर वेतन सहित अवकाश।
  • शिक्षा में सहायता — बालिकाओं के लिए निःशुल्क शिक्षा, छात्रवृत्ति, साइकिल तथा छात्रावास जैसी योजनाएँ।
  • सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाएँ — कार्यस्थल पर उत्पीड़न के विरुद्ध क़ानून, महिला थाना और हेल्पलाइन, तथा रात में महिला कर्मचारी के लिए वाहन की व्यवस्था।
  • समान वेतन और संपत्ति में समान अधिकार — समान कार्य के लिए समान वेतन; पैतृक संपत्ति में बेटी को बेटे के बराबर हिस्सा।
  • रोज़ की छोटी सुविधाएँ — बसों तथा रेलगाड़ियों में आरक्षित सीटें, अलग डिब्बा, और सरकारी कार्यालयों में अलग पंक्ति।
ये ‘विशेष’ क्यों हैं: समान अधिकार क़ानून में लिख देने भर से जीवन में नहीं आ जाते। जिस समूह को सदियों तक अवसर नहीं मिला, उसे बराबरी तक लाने के लिए कुछ समय अतिरिक्त सहारा देना पड़ता है। नेताजी की भाषा में कहें तो ये व्यवस्थाएँ इसीलिए हैं ताकि स्त्री भी ‘समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले’ सके।
प्र2.
(ख) सुभाषचंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ का नेतृत्व किया था। उसमें एक टुकड़ी स्त्रियों की भी थी। उस टुकड़ी का नाम पता लगाकर लिखिए। उस टुकड़ी की भूमिका क्या थी? यह भी बताइए।
उत्तर

उस टुकड़ी का नाम था — रानी झाँसी रेजिमेंट (झाँसी की रानी रेजिमेंट)।

  • कब और कहाँ — सन् 1943 में सिंगापुर में इसकी घोषणा हुई। इसमें दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे भारतीय परिवारों की लड़कियाँ और स्त्रियाँ स्वेच्छा से भर्ती हुईं।
  • नाम क्यों — 1857 में अंग्रेज़ों से लड़ने वाली रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर, ताकि सैनिकों को यह याद रहे कि भारत की स्त्री पहले भी युद्ध-भूमि में उतर चुकी है।
  • नेतृत्व — इसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने सँभाली, जो पेशे से चिकित्सक थीं।
  • भूमिका — इसकी सैनिकों ने पुरुष सैनिकों की तरह ही सैन्य प्रशिक्षण लिया — कवायद, हथियार चलाना और शिविर का अनुशासन। इनका काम युद्ध में भाग लेने के लिए तैयार रहना, घायलों की चिकित्सा-सेवा करना और सैनिकों तथा प्रवासी भारतीयों में उत्साह जगाना था।
पाठ से जोड़िए: 1929 के इसी भाषण में नेताजी ने कहा था कि नारी ‘समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले’। रानी झाँसी रेजिमेंट उसी वाक्य का कार्य-रूप है — उन्होंने स्त्रियों को सहायक भूमिका नहीं, वर्दी और प्रशिक्षण के साथ सैनिक की भूमिका दी। उस समय दुनिया की बहुत कम सेनाओं में स्त्रियों की ऐसी लड़ाकू टुकड़ी थी।
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