मल्हार अध्याय 10 विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र” इस वाक्यांश में रेखांकित शब्द ‘स्वाधीन’ का विपरीत अर्थ देने वाला शब्द है ‘पराधीन’। इसी प्रकार के कुछ विपरीतार्थक शब्द आगे दिए गए हैं, लेकिन वे आमने-सामने नहीं हैं। रेखाएँ खींचकर विपरीतार्थक शब्दों के सही जोड़े बनाइए— स्तंभ 1 — 1. स्वीकार 2. सार्थक 3. विषमता 4. क्षुद्र 5. संपन्न 6. अकर्मण्य 7. मरण स्तंभ 2 — कर्मण्य/कर्मठ, विपन्न, अस्वीकार, जीवन, निरर्थक, समानता, विशाल/वृहत/विराट/महान
उत्तर
क्रमस्तंभ 1विपरीतार्थक (स्तंभ 2)पहचान का सूत्र
1.स्वीकारअस्वीकार‘अ’ उपसर्ग जोड़ने से अर्थ उलट गया
2.सार्थकनिरर्थकसार्थक = अर्थ सहित; निरर्थक = अर्थ रहित (‘निर्’ उपसर्ग)
3.विषमतासमानताविषम = असमान, सम = बराबर
4.क्षुद्रविशाल / वृहत / विराट / महानक्षुद्र = छोटा, तुच्छ — इसलिए विपरीत में सब ‘बड़े’ अर्थ वाले शब्द
5.संपन्नविपन्नसंपन्न = साधन-संपन्न, धनी; विपन्न = विपत्ति में पड़ा, निर्धन
6.अकर्मण्यकर्मण्य / कर्मठयहाँ ‘अ’ हटाने से अर्थ उलट जाता है
7.मरणजीवनसीधा विलोम — कोई उपसर्ग नहीं, अलग शब्द
ध्यान दीजिए — सातों शब्द इसी पाठ से आए हैं: ‘स्वीकार करो’, ‘आदर्श को सार्थक बनाकर’, ‘अर्थ की विषमता’, ‘मेरे क्षुद्र जीवन’, ‘संपन्न समाज’, ‘आलसी तथा अकर्मण्य’, ‘वह मरण है स्वर्ग समान’। इसीलिए विपरीतार्थक शब्द रटने की चीज़ नहीं — जिस पाठ में शब्द मिला हो, वहीं उसका अर्थ भी पकड़ में आता है।
सूत्र: हिंदी में विपरीत अर्थ तीन तरह से बनता है — (1) उपसर्ग जोड़कर: स्वीकार → स्वीकार, (2) उपसर्ग बदलकर: संपन्न → विपन्न, सार्थक → निरर्थक, (3) बिलकुल अलग शब्द से: मरण → जीवन।
प्र2.
(ख) अब स्तंभ 1 और स्तंभ 2 के सभी शब्दों से दिए गए उदाहरण के अनुसार वाक्य बनाकर लिखिए, जैसे— “समाज की उन्नति अकर्मण्य नहीं अपितु कर्मण्य व्यक्तियों पर निर्भर है।”
उत्तर

उदाहरण वाले वाक्य का ढाँचा ध्यान से देखिए — “… नहीं अपितु …”। एक ही वाक्य में दोनों विपरीत शब्द आते हैं, और ‘नहीं अपितु’ उन्हें आमने-सामने खड़ा कर देता है। इसी ढाँचे पर सातों जोड़ों के वाक्य —

  1. स्वीकार / अस्वीकार — सच्ची सलाह को अस्वीकार नहीं, सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।
  2. सार्थक / निरर्थक — बिना लक्ष्य के किया गया परिश्रम निरर्थक होता है, जबकि लक्ष्य के साथ किया गया वही परिश्रम सार्थक हो जाता है।
  3. विषमता / समानता — नेताजी ऐसे समाज के पक्ष में थे जिसमें अर्थ की विषमता नहीं, समानता हो।
  4. क्षुद्र / विशाल — नेताजी ने अपने जीवन को क्षुद्र कहा, पर उनका स्वप्न विशाल था।
  5. संपन्न / विपन्न — जिस देश में गृह-उद्योग फलते-फूलते हैं, वहाँ विपन्न परिवार भी धीरे-धीरे संपन्न बनने लगते हैं।
  6. अकर्मण्य / कर्मठ — अवसर अकर्मण्य की प्रतीक्षा नहीं करता, वह कर्मठ के हाथ लगता है।
  7. मरण / जीवन — जो जीवन किसी बड़े ध्येय के लिए बीता हो, उसका मरण भी ‘स्वर्ग समान’ हो जाता है।
वाक्य बनाते समय: केवल ‘नहीं अपितु’ ही ज़रूरी नहीं — ‘जबकि’, ‘पर’, ‘बल्कि’ से भी दोनों शब्द एक वाक्य में लाए जा सकते हैं। शर्त बस यह है कि वाक्य पढ़ते ही दोनों शब्दों का अंतर साफ़ दिखे।
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