मल्हार अध्याय 10 आपकी बात

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) आपने सुभाषचंद्र बोस के स्वप्न के बारे में जाना। आप अपने विद्यालय, राज्य और देश के बारे में कैसे स्वप्न देखते हैं? लिखिए।
उत्तर

यह आपका अपना उत्तर होगा। अच्छा उत्तर लिखने के लिए नेताजी की ही विधि अपनाइए — पहले बताइए कि आज क्या कमी दिखती है, फिर बताइए कि आदर्श स्थिति कैसी होगी, और अंत में एक बात ऐसी जोड़िए जो आप स्वयं कर सकते हैं। तीनों स्तरों — विद्यालय, राज्य, देश — के लिए दो-तीन वाक्य पर्याप्त हैं।

नमूना उत्तर:
विद्यालय — मैं ऐसे विद्यालय का स्वप्न देखता हूँ जहाँ किसी विद्यार्थी को उसकी जाति, भाषा या घर की स्थिति के कारण अलग न समझा जाए; जहाँ पुस्तकालय और खेल का मैदान सबके लिए खुला हो; और जहाँ जो पीछे रह गया हो, उसे बाकी बच्चे साथ लेकर चलें। मैं अपनी ओर से यह कर सकता हूँ कि गणित में कमज़ोर अपने साथी के साथ रोज़ आधा घंटा बैठूँ।
राज्य — मैं चाहता हूँ कि मेरे राज्य के हर गाँव तक अच्छा विद्यालय, चिकित्सालय और सड़क पहुँचे, और यहाँ के कारीगरों को अपना सामान बेचने के लिए बड़ा बाज़ार मिले, ताकि काम की तलाश में लोगों को घर न छोड़ना पड़े।
देश — मैं ऐसे भारत का स्वप्न देखता हूँ जो अपनी ज़रूरत की चीज़ें स्वयं बनाए, जहाँ स्त्री और पुरुष को हर क्षेत्र में समान अवसर हो, और जिसे दुनिया — नेताजी के शब्दों में — ‘आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य’ माने।
ध्यान रखिए: स्वप्न लिखते समय केवल इच्छा मत लिखिए (‘सब सुखी हों’), एक ठोस चित्र बनाइए — कौन क्या कर रहा होगा, क्या बदला हुआ दिखेगा। नेताजी ने भी यही किया था; उन्होंने ‘अच्छा समाज’ कहकर छोड़ नहीं दिया, एक-एक शर्त गिनाई।
प्र2.
(ख) हमें बड़े संघर्षों के बाद स्वतंत्रता मिली है। अपनी इस स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए हम अपने स्तर पर क्या-क्या कर सकते हैं? लिखिए।
उत्तर

स्वतंत्रता एक बार पाकर हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं हो जाती — उसे हर पीढ़ी को अपने आचरण से बनाए रखना पड़ता है। विद्यार्थी अपने स्तर पर ये काम कर सकता है —

  • अपने कर्तव्य निभाना। हम अधिकार तो याद रखते हैं, कर्तव्य भूल जाते हैं। समय पर पढ़ाई, सार्वजनिक संपत्ति की देखभाल और नियमों का पालन — यही सबसे छोटा और सबसे ज़रूरी काम है।
  • सोच-समझकर मानना। कोई बात सुनकर या पढ़कर तुरंत मान लेना और आगे बढ़ा देना भी एक तरह की परतंत्रता है। सच जाँचना स्वतंत्र नागरिक का काम है।
  • भेदभाव न करना और न सहना। नेताजी ने जातिभेद और स्त्री-पुरुष के असमान अधिकार को स्वाधीनता के रास्ते का रोड़ा बताया था। इन्हें अपने आसपास न बढ़ने देना हमारे हाथ में है।
  • श्रम का सम्मान करना और अपना काम स्वयं करना — यही आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी है।
  • स्वदेशी को अपनाना — अपने क्षेत्र के कारीगरों और गृह-उद्योगों का सामान लेना, जैसा नेताजी अपने पत्र में सुझाते हैं।
  • स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को जानना और आगे बताना, ताकि यह याद रहे कि यह आज़ादी किस कीमत पर मिली।
पाठ से जोड़िए: नेताजी की कसौटी थी — ‘वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा’, और उसकी शर्त थी श्रम तथा कर्म की मर्यादा। यानी उनके अनुसार स्वतंत्रता की रक्षा हथियार से नहीं, काम और आत्मनिर्भरता से होती है।
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