क्योंकि पूड़ी की दोनों परतें एक ही क्षण में नहीं सिकतीं। जो परत पहले सख्त हो जाती है वह फिर खिंच नहीं पाती; जो परत अब भी मुलायम है उसी को भाप बाहर की ओर धकेलती है, अतः वही अधिक क्षेत्रफल में फैलकर पतली हो जाती है।
पूड़ी के भीतर क्या होता है, इसे क्रम से देखिए —
- बेली हुई पूड़ी के आटे में जल बँधा हुआ रहता है।
- गरम तेल का तापमान लगभग 180 °C होता है, जो जल के क्वथनांक से बहुत अधिक है। एक-दो सेकंड में ही पूड़ी की बाहरी सतह का जल उड़ जाता है और वहाँ एक पतली, बंद परत (क्रस्ट) बन जाती है।
- इस परत के नीचे का जल तेजी से भाप में बदलता है। उतना ही जल भाप बनने पर एक हजार गुना से भी अधिक स्थान घेरता है, अतः भीतर का दाब तेजी से बढ़ जाता है।
- भीतर का आटा अब भी मुलायम और लचीला है, इसलिए फटने के स्थान पर वह दो परतों में बँटकर गुब्बारे की भाँति फूल जाता है।
- जो परत पहले तेल के संपर्क में आई — और जिसे हम झारे से दबाकर रखते भी हैं — वह सिक चुकी होती है, अतः बहुत कम खिंचती है। दूसरी परत मुलायम रहती है, दाब के आगे झुक जाती है और खिंच जाती है। उतना ही आटा अधिक क्षेत्रफल में फैलेगा तो पतला ही होगा।