कुतूहल अध्याय 1 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आटा क्यों फूलता है?
उत्तर

क्योंकि आटे के भीतर एक गैस बनती है और वह बाहर नहीं निकल पाती। यह गैस हजारों सूक्ष्म बुलबुलों में एकत्र हो जाती है, प्रत्येक बुलबुला आटे को बाहर की ओर धकेलता है और पूरा लोंदा फूल जाता है।

गैस कहाँ से आती है, यह इस पर निर्भर करता है कि आटा किस प्रकार तैयार हुआ —

  • खमीर उठाया हुआ आटा (ब्रेड, भटूरा, इडली और डोसा का घोल): यीस्ट तथा कुछ जीवाणु जैसे सूक्ष्मजीव आटे की शर्करा और मंड पर पलते हैं और श्वसन के साथ कार्बन डाइऑक्साइड गैस छोड़ते हैं। इसीलिए ऐसे आटे को घंटों गरम स्थान पर रखा जाता है।
  • खाने के सोडा से फुलाया गया आटा: इसमें कोई सजीव सम्मिलित नहीं है। सोडा दही या नींबू के रस जैसे किसी अम्ल के संपर्क में आते ही कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ देता है। इसीलिए सोडा और दही वाला भटूरे का घोल तुरंत बुलबुले छोड़ने लगता है।
ऐसा क्यों होता है: गैस बनना आधी कहानी है — आटे में उसे रोक पाने की क्षमता भी होनी चाहिए। गेहूँ के आटे को जल के साथ गूँधने पर उसका ग्लूटेन एक लचीला, स्प्रिंग जैसा जाल बना लेता है। गैस इस जाल से निकल नहीं पाती, अतः प्रत्येक बुलबुला बाहर भागने के स्थान पर आटे को खींचता है। बिना गूँधे आटे में गैस बुलबुले छोड़कर निकल जाएगी और लोंदा चपटा ही रहेगा। बाद में सेंकने या तलने पर खिंची हुई दीवारें बुलबुलों के चारों ओर सख्त हो जाती हैं — इसीलिए ब्रेड स्पंज जैसी होती है।
यह कीजिए: खमीर उठे आटे के दो एक-समान लोंदे लीजिए। एक को रसोई के गरम कोने में और दूसरे को रेफ्रिजरेटर में रखिए। 2 घंटे बाद दोनों की ऊँचाई मापिए। आपने केवल तापमान बदला है, अतः फूलने में जो भी अंतर मिले उसका कारण तापमान ही होगा — सूक्ष्मजीव गरमी में तेजी से कार्य करते हैं।
प्र2.
क्या भूमंडलीय तापमान में वृद्धि हो रही है?
उत्तर

हाँ। थल पर लगे हजारों तापमापी, समुद्र में जहाजों और प्लवों से लिए गए मापन तथा अब उपग्रहों के आँकड़े — सभी एक ही बात कहते हैं: लगभग 1850 के बाद से पृथ्वी की सतह का औसत तापमान लगभग 1.1 °C से 1.3 °C तक बढ़ चुका है।

ऐसा क्यों होता है: कोयला, पेट्रोल, डीजल और प्राकृतिक गैस जलाने से वायु में कार्बन डाइऑक्साइड मिलती जाती है। सूर्य का प्रकाश इस गैस से सरलता से निकल आता है, परंतु गरम पृथ्वी जो ऊष्मा वापस बाहर भेजती है उसका कुछ भाग यह गैस सोखकर पुनः नीचे लौटा देती है — मानो एक कंबल हो। वायु में कंबल जितना अधिक होगा, ऊष्मा उतनी ही कम बाहर जाएगी और औसत तापमान उतने ही ऊँचे मान पर आकर ठहरेगा।

एक डिग्री तो बहुत कम लगती है, फिर इससे क्या अंतर पड़ता है? क्योंकि यह पूरे ग्रह का और पूरे वर्ष का औसत है। औसत खिसकने पर चरम स्थितियाँ भी उसी के साथ खिसक जाती हैं — लू लंबी और अधिक बार पड़ती है, मानसून अनियमित हो जाता है, और जो हिमनद अब तक संतुलन में थे वे जितनी बर्फ बनाते हैं उससे अधिक खोने लगते हैं।

यह केवल एक गरम गरमी नहीं है, यह हम कैसे जानते हैं? एक गरम दिन मौसम है; सौ वर्ष से अधिक समय तक बना रहने वाला औसत में उठाव जलवायु है। और तापमापियों से स्वतंत्र प्रमाण भी यही कहते हैं — हिमालय के हिमनद पीछे हट रहे हैं, समुद्री जल गरम होकर फैलने से समुद्र-तल ऊपर उठ रहा है, और महासागर स्वयं मापनीय रूप से अधिक गरम हैं।

ध्यान दीजिए: इस पुस्तक का अंतिम अध्याय इसी प्रश्न पर विस्तार से लौटता है। ध्यान रखिए कि यह उत्तर किसी एक अवलोकन पर नहीं, समय के साथ मापी गई प्रवृत्ति पर टिका है — वैज्ञानिक कथन और मत में यही अंतर है।
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