कुतूहल अध्याय 1 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर

संतुलित आहार, सुरक्षित जल और स्वच्छ वायु, नियमित शारीरिक क्रिया, पर्याप्त नींद, व्यक्तिगत स्वच्छता तथा रोगों से बचाव। स्वास्थ्य का अर्थ केवल बीमार न होना नहीं है — इनमें से हर एक शरीर के किसी न किसी जैविक प्रक्रम को ठीक चलाए रखता है।

शरीर को क्या चाहिएक्यों चाहिएदैनिक जीवन का उदाहरण
संतुलित आहारकार्बोहाइड्रेट और वसा ऊर्जा देते हैं; प्रोटीन शरीर की वृद्धि और मरम्मत करते हैं; विटामिन और खनिज लवण शरीर के प्रक्रमों को चलाते हैं; रूक्षांश पाचन को सुचारु रखता हैदाल-चावल के साथ सब्जी, दही और मौसमी फल
सुरक्षित पेयजलशरीर में पदार्थों का परिवहन करता है, तापमान नियंत्रित रखता है, वर्ज्य पदार्थ बाहर निकालता है — और दूषित जल स्वयं रोग लाता हैउबला हुआ या छाना हुआ जल
शारीरिक क्रियापेशियों और अस्थियों को दृढ़ तथा हृदय और फेफड़ों को सक्षम बनाए रखती हैकबड्डी, साइकिल चलाना, तेज चाल से टहलना
नींद और विश्रामइसी समय शरीर अपनी मरम्मत करता है और मस्तिष्क दिन भर सीखी बातों को व्यवस्थित करता हैआपकी आयु में प्रतिदिन 8–9 घंटे
स्वच्छताहानिकारक सूक्ष्मजीवों को शरीर में प्रवेश करने से रोकती हैभोजन से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ धोना
टीकेकिसी रोगाणु के आने से पहले ही शरीर की प्रतिरक्षा को तैयार कर देते हैंआपके टीकाकरण कार्ड में लिखे टीके
ऐसा क्यों होता है: शरीर कोई भंडार नहीं है जिसे केवल भरना हो। वह निरंतर बनता, मरम्मत करता और स्वयं की रक्षा करता रहता है, और इन सब कार्यों के लिए कच्चा माल (भोजन), कार्य करने का माध्यम (जल) तथा मरम्मत का समय (विश्राम) — तीनों चाहिए। इनमें से एक भी छूट जाए तो शेष उसकी भरपाई नहीं कर पाते — इसीलिए उत्तम आहार लेकिन नींद नहीं, अथवा भरपूर नींद लेकिन उचित आहार नहीं — दोनों ही स्थितियों में स्वास्थ्य बिगड़ता है।
प्र2.
हम इन संक्रमणों से कैसे लडते हैं?
उत्तर

तीन स्तरों पर एक साथ — शरीर की अपनी प्रतिरक्षा, औषधियाँ और टीके, तथा सबसे प्रभावी उपाय यह कि रोगाणु हम तक पहुँचे ही नहीं।

1. शरीर सबसे पहले स्वयं लड़ता है।

  • त्वचा एक अटूट अवरोध है। कटा हुआ स्थान एक खुला द्वार है — इसीलिए घाव को धोकर ढका जाता है।
  • नाक और श्वास नली का श्लेष्म धूल और सूक्ष्मजीवों को फँसा लेता है; छींक और खाँसी उन्हें बाहर फेंक देती हैं।
  • आमाशय का अम्ल भोजन के साथ निगले गए अधिकांश सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देता है।
  • रक्त की श्वेत रुधिर कणिकाएँ भीतर पहुँच गए सूक्ष्मजीवों को खोजकर नष्ट करती हैं। ज्वर, सूजन और पीड़ा इसी संघर्ष के संकेत हैं।
  • इसके बाद शरीर उस विशेष रोगाणु को याद रख लेता है और अगली बार उससे कहीं तेजी से निपटता है।

2. शरीर हारने लगे तो औषधियाँ सहायता करती हैं। प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) जीवाणुओं को मारते हैं या उनका गुणन रोकते हैं। विषाणुओं पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, अतः सामान्य सर्दी-जुकाम प्रतिजैविक से ठीक नहीं होता। चिकित्सक द्वारा बताई गई पूरी मात्रा सदैव पूरी कीजिए — बीच में छोड़ देने पर सबसे प्रतिरोधी जीवाणु बच जाते हैं और वही आगे चलकर उस औषधि को निष्प्रभावी कर देते हैं।

3. टीके प्रतिरक्षा को पहले से तैयार कर देते हैं। टीका शरीर को रोगाणु की एक हानिरहित झलक दिखाता है। शरीर बिना बीमार पड़े उस रोगाणु की स्मृति बना लेता है, अतः असली रोगाणु आने पर वह हानि पहुँचाने से पहले ही नष्ट कर दिया जाता है। इसी विधि से संसार से चेचक समाप्त हुई और भारत से पोलियो रुका।

4. सर्वोत्तम उपाय — संक्रमण हो ही नहीं। साबुन से हाथ धोइए, सुरक्षित जल पीजिए, भोजन ढककर रखिए, शौचालय का उपयोग कीजिए, तथा बर्तनों, कूलरों और टायरों में जल एकत्र न होने दीजिए जहाँ मच्छर पनपते हैं।

ऐसा क्यों होता है: ध्यान दीजिए कि हर उपाय एक ही ढंग से कार्य करता है — या तो वह रोगाणु को भीतर आने से रोकता है, या शरीर की अपनी प्रतिरक्षा को उस लड़ाई में जिताता है जो वह पहले से लड़ रही है। दस्त में दिया जाने वाला ओ.आर.एस. भी ऐसे ही कार्य करता है: वह रोगाणु को नहीं मारता, वह शरीर से निकल रहे जल और लवणों की पूर्ति करता है ताकि शरीर लड़ाई पूरी करने योग्य बना रहे।
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