गंगा अध्याय 9 मेरी कल्पना मेरे अनुमान

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर

यह कल्पना पर आधारित आत्मकथात्मक लेखन है। इसमें ‘मैं’ बोलेगा, इसलिए वाक्य उत्तम पुरुष में होंगे और वही बातें आएँगी जो सभा में बैठे एक राजा को दिखाई-सुनाई दे सकती थीं।

अच्छे उत्तर में क्या-क्या होना चाहिए —

  • घटना-क्रम वही रहे जो कविता में है — परशुराम का आगमन, राजाओं का भय, जनक-सीता का प्रणाम, विश्वामित्र का परिचय, टूटा धनुष देखना, क्रोध, धमकी, राम का उत्तर, लक्ष्मण का व्यंग्य।
  • पूरी कथा एक साधारण राजा की आँख से दिखे — यानी उसे भी डर लगे, वह भी चुप रहे, उसे भी अपनी जान की चिंता हो। यही इस प्रश्न की असली माँग है।
  • बीच-बीच में कविता की पंक्तियाँ उद्धृत की जाएँ, ताकि लेखन पाठ से जुड़ा रहे।
  • अंत में परशुराम का जाना भी आए। पाठ का अंश यहाँ समाप्त नहीं होता, इसलिए पाठ के नीचे दी गई पुस्तक की टिप्पणी का सहारा लेना होगा — “अंततः राम के विनय और विश्वामित्र के समझाने पर तथा राम की शक्ति की परीक्षा लेकर परशुराम का आक्रोश शांत होता है।”
  • अंत में एक-दो वाक्य का अपना निष्कर्ष हो — उस राजा ने उस दिन क्या सीखा।

नमूना उत्तर:

उस दिन जनक की सभा में — एक राजा की ज़बानी

वह दिन मैं जीवन-भर नहीं भूल सकता। मिथिला की सभा सजी हुई थी। हम अनेक देशों के राजा वहाँ आए थे और हम में से हर एक को विश्वास था कि शिव-धनुष उसी के हाथों उठेगा। पर धनुष हिला तक नहीं। हम सब अपनी-अपनी जगह लौट आए थे — कुछ लज्जित, कुछ चिढ़े हुए। तभी दशरथ-कुमार राम ने वह धनुष उठाया और उसे भंग कर दिया। सभा में हर्ष की लहर दौड़ी, पर सच कहूँ तो मेरे मन में उस समय भी एक काँटा चुभ रहा था।

कुछ ही देर बाद द्वार पर हलचल हुई। सामने जो आकृति खड़ी थी, उसे देखकर मेरा रक्त जम-सा गया — जटाजूट, तनी हुई भौंहें, कंधे पर फरसा। भृगुकुल के स्वामी परशुराम! उनका वेष इतना भयानक था कि हम सब अपने-आप उठ खड़े हुए — “देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥” मैंने भी अपने पिता का नाम लेकर अपना परिचय दिया और दंडवत् किया। उन्होंने मेरी ओर एक बार देखा — बस एक बार — और मुझे लगा जैसे मेरी आयु वहीं समाप्त हो गई हो।

महाराज जनक स्वयं आगे आए, सिर नवाया और सीता को बुलाकर प्रणाम करवाया। मुनि ने आशीर्वाद दिया। फिर विश्वामित्र जी आए और उन्होंने राम-लक्ष्मण को उनके चरणों में झुका दिया। परशुराम जी ने दोनों भाइयों की जोड़ी देखी और प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे दिया। मैंने देखा, राम को देखते हुए उनकी आँखें वहीं ठहर गईं। उस समय मुझे लगा कि सब कुछ शांति से बीत जाएगा।

पर वह शांति क्षण-भर की थी। उन्होंने महाराज जनक से पूछा कि यह इतनी भीड़ किसलिए है। महाराज ने सारा समाचार सुना दिया। बात सुनते ही मुनि मुड़े, और उनकी दृष्टि धरती पर बिखरे धनुष के टुकड़ों पर पड़ी। मैंने अपने जीवन में किसी के चेहरे का रंग इतनी तेज़ी से बदलते नहीं देखा। वे गरजे — “कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” और फिर — “बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥

महाराज जनक जैसे विद्वान और शांत राजा भी उस क्षण एक शब्द नहीं बोल सके। और मुझे स्वीकार करने में संकोच नहीं कि हम राजाओं में से कुछ के मन में उस समय एक कुटिल-सा संतोष भी उठा — जो हमसे न हुआ, वह करने वाले पर अब आफ़त आई है। पर वह संतोष टिका नहीं। मुनि ने घोषणा कर दी कि तोड़ने वाला अलग हो जाए, नहीं तो सब राजा मारे जाएँगे। मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। पूरी सभा में, नगर में, मानो देवताओं और मुनियों तक में एक ही भय दौड़ गया।

उस भरी सभा में एक ही व्यक्ति था जिसके चेहरे पर कोई परिवर्तन नहीं आया — राम। उन्होंने सबको देखा, सीता को भी देखा, और फिर अत्यंत शांत स्वर में कहा — “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ आयसु काह कहिअ किन मोही।” मैं सोचता रह गया कि जो धनुष उन्होंने स्वयं तोड़ा था, उसके लिए वे स्वयं को ‘दास’ कह रहे थे।

तभी लक्ष्मण मुसकराए। भरी सभा में, जहाँ सब काँप रहे थे, वह मुसकान बिजली की तरह गिरी। उन्होंने कहा — “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥ एहि धनु पर ममता केहि हेतू।” उस क्षण मुझे उन पर क्रोध भी आया और भीतर-ही-भीतर उनका साहस भी अच्छा लगा — जो बात हम में से कोई नहीं कह सका, वह उस किशोर ने कह दी। परशुराम जी भड़क उठे — “रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।

इसके बाद देर तक दोनों के बीच वचनों की वर्षा होती रही। लक्ष्मण हर बार व्यंग्य करते और मुनि हर बार फरसा उठाते। पर बीच-बीच में राम बोलते और उनका एक-एक शब्द ठंडे जल की तरह पड़ता। अंततः राम के विनय और विश्वामित्र जी के समझाने से बात सँभली, और जब मुनि ने राम की शक्ति की परीक्षा ली तो उनका सारा आक्रोश शांत हो गया। वे राम को आशीर्वाद देकर तपोवन की ओर चल दिए। जाते समय उनका चेहरा वैसा ही तेजस्वी था, पर उसमें अब कोई कठोरता नहीं थी।

सभा में साँस लौटी। पर मैं उस रात सो नहीं सका। मैंने सोचा — उस दिन तीन तरह के लोग वहाँ थे। एक वे जो डर से चुप रह गए (उनमें मैं भी था), दूसरे वे जो सच बोलने का साहस कर बैठे, और तीसरे वे जिन्होंने बिना ऊँचा बोले सब सँभाल लिया। और मैंने उसी दिन जाना कि सबसे बड़ा बल तलवार में नहीं, संयत वाणी में होता है।

लिखते समय ध्यान रखिए: ‘मैं’ को कहानी का नायक मत बनाइए। आप एक दर्शक हैं — आपकी भूमिका देखना, डरना और अंत में कुछ सीखना है। यही इस प्रश्न को रोचक बनाता है।
प्र2.
2. “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे? (संकेत– सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)
उत्तर

तुलसीदास ने इन राजाओं के लिए एक ही विशेषण दिया है — ‘कुटिल’, यानी टेढ़े मन वाले। उनकी यह प्रसन्नता किसी अच्छी बात पर नहीं थी; वह दूसरे के संकट पर थी। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं —

क — प्रसन्न होने के संभावित कारण

  1. स्वयंवर में हुए अपमान का बदला-सा लगना। ये वही राजा हैं जो शिव-धनुष हिला तक नहीं सके थे और भरी सभा में लज्जित हुए थे। अब जिस राजा ने वह शर्त रखी थी, वही राजा निरुत्तर खड़ा है। उन्हें लगा कि हमारे अपमान का हिसाब अपने आप बराबर हो रहा है
  2. राम से ईर्ष्या। जो काम वे नहीं कर सके, वह राम ने कर दिखाया और सीता का वरण भी उन्हीं को मिलने जा रहा था। अब परशुराम उसी धनुष-भंग को अपराध बता रहे हैं। इससे उन्हें आशा बँधी कि शायद विवाह टल जाए और अवसर फिर खुले।
  3. दंड का भागी कोई और है, वे नहीं। उस क्षण परशुराम का क्रोध जनक पर था। हर व्यक्ति को यह राहत होती है कि आपत्ति किसी और पर पड़ी। यह क्षणिक और स्वार्थी राहत है, पर बहुत सामान्य है।
  4. बड़े व्यक्ति को छोटा पड़ते देखने का सुख। जनक ‘विदेह’ कहलाते थे — विद्वान, संयमी, प्रतिष्ठित। ऐसे व्यक्ति का सार्वजनिक रूप से ‘जड़’ और ‘मूढ़’ कहा जाना उन राजाओं के अहंकार को सहलाता था, जो स्वयं को उनसे कम समझते आए थे।
  5. अपनी चुप्पी को उचित ठहराने का बहाना। जब जनक जैसा राजा भी चुप है, तो हमारी चुप्पी पर कौन उँगली उठाएगा? दूसरे की कमज़ोरी अपनी कायरता का सबसे सुविधाजनक पर्दा बन जाती है।

ख — मनुष्य के व्यवहार की कौन-सी सच्चाई यह उजागर करता है

1. ईर्ष्या दूसरे की हानि में अपना सुख ढूँढ़ लेती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी उन्नति से उतना प्रसन्न नहीं होता, जितना दूसरे की अवनति से। यहाँ राजाओं को कुछ मिला नहीं — फिर भी वे प्रसन्न हैं। यह वह सुख है जिसमें अपना कोई लाभ नहीं होता, केवल दूसरे का नुकसान होता है।

2. भीड़ का साहस भीड़ जितना बड़ा नहीं होता। सभा में अनेक राजा थे, पर एक भी नहीं बोला। भय के सामने समूह प्रायः सबसे पहले टूटता है, क्योंकि हर व्यक्ति सोचता है कि कोई और बोले।

3. मनुष्य का भीतर और बाहर अलग होता है। बाहर से वे सब भयभीत और गंभीर दिख रहे थे; भीतर से प्रसन्न थे। तुलसी ने इसीलिए ‘मन माहीं’ लिखा — यह हर्ष चेहरे पर नहीं आया, आ भी नहीं सकता था। ईर्ष्या हमेशा मन के भीतर ही रहती है, इसीलिए वह पहचानी नहीं जाती।

4. पराजय आदमी को कड़वा बना देती है। ये राजा जन्म से दुष्ट नहीं थे। पर स्वयंवर की असफलता ने उनके मन में एक गाँठ डाल दी, और वही गाँठ यहाँ कुटिल प्रसन्नता बनकर बाहर आई।

ग — आज के जीवन से जोड़िए

  • कक्षा में जब किसी होशियार विद्यार्थी के कम अंक आ जाएँ और कुछ लोग भीतर-भीतर प्रसन्न हों — यह वही ‘कुटिल भूप’ वाला भाव है।
  • खेल में जब अपनी टीम जीत न पाए, तो जीतने वाली टीम की छोटी-सी गलती पर ताली बजाना भी इसी का रूप है।
  • यही कारण है कि तुलसीदास ने इन राजाओं को ‘कुटिल’ कहकर कवि का निर्णय भी दे दिया — वे तटस्थ नहीं रहते, वे बता देते हैं कि यह भाव निंदनीय है।
निष्कर्ष एक वाक्य में: यह पंक्ति बताती है कि दूसरे की विपत्ति में प्रसन्न होना मनुष्य की सबसे छिपी हुई और सबसे कुरूप प्रवृत्ति है — और सच्चा बड़प्पन इसी प्रवृत्ति पर विजय पाने में है, जैसा राम ने करके दिखाया, जिनके हृदय में उस क्षण न हर्ष था, न विषाद।
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