कक्षा ९ हिंदी अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
रचनाकार — गोस्वामी तुलसीदास का जन्म आज के उत्तर प्रदेश में हुआ था। पुस्तक के अनुसार उनका जीवन-काल 16वीं–17वीं शताब्दी (सन् 1532–1623) के मध्य माना गया है। रामचरितमानस उनका प्रसिद्ध महाकाव्य है, जो उनकी अनन्य रामभक्ति और सृजनात्मक कौशल का मनोरम उदाहरण है। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं — कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, विनयपत्रिका और हनुमान बाहुक । उनकी रचनाओं में राम मानवीय मर्यादाओं और आदर्शों के प्रतीक हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने नीति, स्नेह, शील, विनय और त्याग जैसे मूल्यों को प्रतिष्ठित किया। मानव-प्रकृति, लोकजीवन और जीवन-जगत संबंधी गहरी अंतर्दृष्टि उनके काव्य की पहचान है। काशी में उनका देहावसान हुआ। भाषा — तुलसीदास संस्कृत के श्रेष्ठ ज्ञाता थे और अवधी तथा ब्रज दोनों भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। उन्होंने रामचरितमानस की रचना अवधी में की और विनयपत्रिका तथा कवितावली की रचना ब्रज
त्वरित पुनरावृत्ति
| शब्द | अर्थ | पाठ की पंक्ति | अपने वाक्य में प्रयोग |
|---|---|---|---|
| भृगुपति | भृगुकुल के स्वामी (परशुराम) | “देखत भृगुपति बेषु कराला।” | भृगुपति का नाम सुनते ही सभा में सन्नाटा छा गया। |
| बेषु | वेष, पहनावा, रूप-सज्जा | “देखत भृगुपति बेषु कराला।” | साधु के बेषु में वह गाँव-गाँव घूमता रहा। |
| कराला | भयानक, डरावना | “देखत भृगुपति बेषु कराला।” | तूफ़ान का कराल रूप देखकर सब घरों में दुबक गए। |
| भुआला | राजा, महीप, भूपाल | “उठे सकल भय बिकल भुआला॥” | सभा में बैठे भुआल एक-एक कर उठ खड़े हुए। |
| बिकल | व्याकुल, बेचैन | “उठे सकल भय बिकल भुआला॥” | माँ की खबर सुनकर वह बिकल हो उठा। |
| दंड प्रनामा | दंडवत् प्रणाम, साष्टांग प्रणाम | “लगे करन सब दंड प्रनामा॥” | उसने गुरु को दंड प्रणाम कर आशीर्वाद लिया। |
| सुभायँ | स्वभाव, आदत, सहज प्रकृति | “जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी।” | उसके सुभाव में कहीं कड़वाहट नहीं है। |
| चितवहिं | देखना, निरखना | “जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी।” | वह द्वार की ओर चितवत ही रह गई। |
| जनु | मानो, जैसे (उत्प्रेक्षा का वाचक) | “सो जानइ जनु आइ खुटानी॥” | उसका चेहरा ऐसे उतर गया, जनु सारा रंग उड़ गया हो। |
| खुटानी | पूरी होना, समाप्त होना (आयु का अंत) | “सो जानइ जनु आइ खुटानी॥” | बिजली कड़की तो लगा जैसे साँस ही खुटानी को आई हो। |
| बहोरि | इकट्ठा करना; फिर, अनंतर, पीछे | “जनक बहोरि आइ सिरु नावा।” | बहोरि उसने सारी बात दुबारा दोहराई। |
| सिरु नावा | सिर नवाया, प्रणाम किया | “जनक बहोरि आइ सिरु नावा।” | बड़ों के सामने सिर नवाना हमारी परंपरा है। |
| आसिष / असीस | आशीर्वाद | “आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं।” | दादी की असीस ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है। |
| सयानीं | समझदार, चतुर, सयानी | “निज समाज लै गईं सयानीं॥” | सयानी सखी ने इशारे से ही सब सँभाल लिया। |
| पद सरोज | चरण-कमल (रूपक) | “पद सरोज मेले दोउ भाई॥” | संत के पद सरोज में सिर रखकर वह बैठ गया। |
| ढोटा | पुत्र, बेटा, बालक | “रामु लखनु दसरथ के ढोटा।” | गाँव में आज भी बेटे को ‘ढोटा’ कह देते हैं। |
| जोटा | जोड़ा, गोनी | “दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥” | दोनों भाइयों का जोटा देखते ही बनता है। |
| लोचन | आँख, देखने की क्रिया | “रामहि चितइ रहे थकि लोचन।” | उसके लोचन में नींद का नाम नहीं था। |
| मार | कामदेव | “रूप अपार मार मद मोचन॥” | राम का रूप मार के मद को भी चूर कर देता है। |
| बिदेह | विदेह, राजा जनक (मिथिला के राजा) | “बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु…” | बिदेह की सभा विद्वानों के लिए प्रसिद्ध थी। |
| जिमि | जैसे, की तरह (उपमा का वाचक) | “पूछत जानि अजान जिमि…” | वह ऐसे चुप था जिमि कुछ हुआ ही न हो। |
| ब्यापेउ | व्याप्त हो गया, फैल गया | “ब्यापेउ कोपु सरीर॥” | डर उसके रोम-रोम में ब्यापेउ हो गया। |
| महीप | राजा, भूपति | “जेहि कारन महीप सब आए॥” | स्वयंवर में अनेक महीप आमंत्रित थे। |
| अनत | अन्यत्र, और कहीं | “सुनत बचन फिरि अनत निहारे।” | वह बात टालकर अनत देखने लगा। |
| चापखंड | धनुष का टुकड़ा, धनुष का भाग | “देखे चापखंड महि डारे॥” | धरती पर पड़े चापखंड ही सारी कहानी कह रहे थे। |
| महि | पृथ्वी; महिमा, महत्त्व | “देखे चापखंड महि डारे॥” | महि पर बिखरे फूल किसी उत्सव की गवाही दे रहे थे। |
| रिस | रोष, क्रोध, गुस्सा | “अति रिस बोले बचन कठोरा।” | रिस में कही गई बात अक्सर पछतावा देती है। |
| जड़ | मूर्ख, जड़बुद्धि | “कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” | क्रोध में उसने मित्र को जड़ तक कह दिया। |
| बेगि | शीघ्र, जल्दी, वेगपूर्वक | “बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू।” | बेगि चलो, गाड़ी छूट जाएगी। |
| जहँ लहि | जहाँ तक, जिस स्थान तक | “उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥” | जहँ लहि नज़र जाती है, खेत ही खेत हैं। |
| लहि | तक, पर्यंत | “उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥” | सुबह से साँझ लहि वह काम में लगा रहा। |
| नृपु | राजा | “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।” | नृप का मौन भी सभा में सुनाई देता है। |
| कुटिल | टेढ़ा, दुष्ट, छल-भरा | “कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” | कुटिल मुसकान उसके इरादे खोल गई। |
| त्रास | भय, डर | “सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥” | भूकंप के बाद पूरे नगर में त्रास फैल गया। |
| उर | हृदय, छाती | “सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥” | माँ की चिंता उर में गड़ी रहती है। |
| बिधि | विधि, विधाता, ईश्वर | “बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥” | बिधि की लिखी को कौन मिटा सकता है। |
| अरध निमेष | आधा क्षण, आधा पल, आधा पलक झपकना | “अरध निमेष कलप सम बीता॥” | परीक्षा-भवन में अरध निमेष भी लंबा लगता है। |
| कलप (कल्प) | काल का एक विभाग; ब्रह्मा का एक दिन (एक हज़ार महायुग — 4 अरब 32 करोड़ मानव-वर्ष); प्रलय | “अरध निमेष कलप सम बीता॥” | प्रतीक्षा की वह रात कलप जैसी लगी। |
| सभय | भय सहित, डरा हुआ | “सभय बिलोके लोग सब…” | सभय दृष्टि से उसने चारों ओर देखा। |
| बिलोके | देखा, अवलोकन किया | “सभय बिलोके लोग सब…” | उसने एक बार सबको बिलोका और चुप रह गया। |
| भीरु | भयभीत, डरा हुआ | “जानि जानकी भीरु।” | भीरु मन कोई भी बड़ा काम नहीं कर पाता। |
| बिषादु | विषाद, दुख, उदासी | “हृदयँ न हरषु बिषादु कछु…” | हार पर भी उसके चेहरे पर बिषाद नहीं था। |
| भंजनिहारा | भंग करने वाला, तोड़ने वाला | “नाथ संभुधनु भंजनिहारा।” | नियम का भंजनिहारा अंततः स्वयं ही हारता है। |
| आयसु | आज्ञा, आदेश | “आयसु काह कहिअ किन मोही।” | गुरु का आयसु पाकर वह चल पड़ा। |
| रिसाइ | क्रोध करना, कोप करना | “सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥” | बात अधूरी सुनकर ही वह रिसाइ उठा। |
| कोही | क्रोधी | “सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥” | कोही स्वभाव मित्रों को दूर कर देता है। |
| सेवकाई | सेवा का काम | “सेवकु सो जो करै सेवकाई।” | सच्ची सेवकाई में दिखावा नहीं होता। |
| अरि | शत्रु | “अरि करनी करि करिअ लराई॥” | अरि से भी बात करने का ढंग सभ्य होना चाहिए। |
| सहसबाहु | सहस्रबाहु; (कोश में) बाणासुर, शिव, स्कंद का एक अनुचर | “सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥” | सहसबाहु की कथा परशुराम-प्रसंग से जुड़ी है। |
| रिपु | शत्रु | “सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥” | रिपु को पहचानना भी एक कला है। |
| बिलगाउ | अलग होना, अलग करने वाला | “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा।” | भीड़ से बिलगाकर वह एक ओर खड़ा हो गया। |
| बिहाइ | छोड़कर | “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा।” | घर बिहाइ वह परदेस चला गया। |
| जैहहिं | जाएँगे | “न त मारे जैहहिं सब राजा॥” | सब मिलकर जैहहिं तो रास्ता आसान लगेगा। |
| परसु (परशु) | फरसा, कुल्हाड़ी की तरह का एक शस्त्र | “बोले परसुधरहि अपमाने॥” | परशु परशुराम की पहचान है। |
| परसुधर | परशुराम (फरसा धारण करने वाले) | “बोले परसुधरहि अपमाने॥” | परसुधर का क्रोध पूरी सभा पर भारी पड़ा। |
| धनुही | छोटा धनुष, खिलौना धनुष | “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं।” | बच्चे मेले से धनुही खरीदकर लौटे। |
| लरिकाईं | लड़कपन, बचपन में, बाल्यावस्था, चंचलता | “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं।” | लरिकाईं की बातें अब भी याद आती हैं। |
| असि | ऐसी, इस प्रकार की | “कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥” | असि बात पहले कभी नहीं सुनी थी। |
| गोसाईं | स्वामी, महाराज (यहाँ व्यंग्य में आदर-संबोधन) | “कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥” | ‘गोसाईं’ कहकर उसने आदर भी दिया और चुटकी भी ली। |
| भृगुकुलकेतू | भृगुकुल के दीपक/ध्वज — परशुराम के लिए संबोधन | “सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥” | भृगुकुलकेतू का तेज सभा में साफ़ दिखता था। |
| तिपुरारि | त्रिपुरारि, शिव, शंकर | “धनुही सम तिपुरारि धनु…” | तिपुरारि का धनुष तोड़ना साधारण बात न थी। |
| बिदित | विख्यात, जाना-पहचाना | “बिदित सकल संसार॥” | उसकी ईमानदारी पूरे मुहल्ले में बिदित है। |
अभ्यास
- चौपाई 1–8 और दोहा 1
- चौपाई 9–16 और दोहा 2
- चौपाई 17–24 और दोहा 3
- मेरे उत्तर मेरे तर्क
- मेरी समझ मेरे विचार
- मेरी कल्पना मेरे अनुमान
- कविता का सौंदर्य
- भाव-पहचान एवं विश्लेषण
- काव्य-पंक्ति और भाव
- विषयों से संवाद
- सृजन
- व्याकरण की बात
- बहुभाषिकता
- लोक में भाषा
- गद्य-रूप
- गतिविधियाँ
- मेरी पहेली
- भाषा संगम
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