पूरी भरी हुई तालिका इस प्रकार है —
| कथन | राम | लक्ष्मण | परशुराम | जनक | सीता की माता (सुनयना) |
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| शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। | ✓ | ||||
| विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। | ✓ | ||||
| सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। | ✓ | ||||
| इस कारण ये सब राजा आए हैं। | ✓ | ||||
| बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। | ✓ | ||||
| क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? | ✓ | ||||
| कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? | ✓ | ||||
| इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों! | ✓ |
हर कथन का मूल — कविता की पंक्ति के साथ
| कथन | वक्ता | कविता की मूल पंक्ति | पहचान का आधार |
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| शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। | राम | “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥” | ‘नाथ’ और ‘दास तुम्हारा’ — विनम्रता का यह स्वर पूरे पाठ में केवल राम का है। |
| विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। | सीता की माता (सुनयना) | “मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥” | पंक्ति में ही ‘सीय महतारी’ लिखा है; और यही पुस्तक की ‘भाव-पहचान’ तालिका में ‘चिंता’ का उदाहरण है। |
| सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। | परशुराम | “सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥” | यह राम के ‘दास तुम्हारा’ का काटता हुआ उत्तर है, इसलिए परशुराम का ही है। |
| इस कारण ये सब राजा आए हैं। | जनक | “समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥” | पंक्ति में स्पष्ट लिखा है ‘जनक सुनाए’ — यह स्वयंवर का समाचार जनक ही दे सकते थे। |
| बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। | लक्ष्मण | “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥” | ठीक पहले की पंक्ति बताती है — “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने।” यह पूरे पाठ का सबसे प्रसिद्ध व्यंग्य है। |
| क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? | राम | “आयसु काह कहिअ किन मोही।” | बड़ों से आज्ञा माँगना राम की मर्यादा का लक्षण है। पुस्तक ने ‘गद्य-रूप’ में स्वयं इसे राम का कथन बताया है (पृष्ठ 162)। |
| कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? | परशुराम | “बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।” | यह पाठ का पहला संवाद है और परशुराम का पहला वाक्य। ‘बिदेह सन’ यानी जनक से — इसलिए वक्ता परशुराम ही हैं। |
| इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों! | लक्ष्मण | “एहि धनु पर ममता केहि हेतू।” | यह लक्ष्मण के व्यंग्य की दूसरी चोट है। इसके तुरंत बाद ‘सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू’ आता है, यानी सुनने वाले परशुराम हैं — इसलिए बोलने वाले वे नहीं हो सकते। |