गंगा अध्याय 9 गतिविधियाँ

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. यह कविता संवाद का सुंदर उदाहरण है। तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है। अपनी समझ से सही (✓) का चिह्न लगाइए— (कथन: शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। / विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। / सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। / इस कारण ये सब राजा आए हैं। / बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। / क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? / कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? / इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों!) — पात्र: राम, लक्ष्मण, परशुराम, जनक, सीता की माता (सुनयना)
उत्तर

पूरी भरी हुई तालिका इस प्रकार है —

कथनरामलक्ष्मणपरशुरामजनकसीता की माता (सुनयना)
शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है।
विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी।
सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे।
इस कारण ये सब राजा आए हैं।
बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं।
क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते?
कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है?
इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों!

हर कथन का मूल — कविता की पंक्ति के साथ

कथनवक्ताकविता की मूल पंक्तिपहचान का आधार
शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है।राम“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥”‘नाथ’ और ‘दास तुम्हारा’ — विनम्रता का यह स्वर पूरे पाठ में केवल राम का है।
विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी।सीता की माता (सुनयना)“मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥”पंक्ति में ही ‘सीय महतारी’ लिखा है; और यही पुस्तक की ‘भाव-पहचान’ तालिका में ‘चिंता’ का उदाहरण है।
सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे।परशुराम“सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥”यह राम के ‘दास तुम्हारा’ का काटता हुआ उत्तर है, इसलिए परशुराम का ही है।
इस कारण ये सब राजा आए हैं।जनक“समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥”पंक्ति में स्पष्ट लिखा है ‘जनक सुनाए’ — यह स्वयंवर का समाचार जनक ही दे सकते थे।
बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं।लक्ष्मण“बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥”ठीक पहले की पंक्ति बताती है — “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने।” यह पूरे पाठ का सबसे प्रसिद्ध व्यंग्य है।
क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते?राम“आयसु काह कहिअ किन मोही।”बड़ों से आज्ञा माँगना राम की मर्यादा का लक्षण है। पुस्तक ने ‘गद्य-रूप’ में स्वयं इसे राम का कथन बताया है (पृष्ठ 162)।
कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है?परशुराम“बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।”यह पाठ का पहला संवाद है और परशुराम का पहला वाक्य। ‘बिदेह सन’ यानी जनक से — इसलिए वक्ता परशुराम ही हैं।
इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों!लक्ष्मण“एहि धनु पर ममता केहि हेतू।”यह लक्ष्मण के व्यंग्य की दूसरी चोट है। इसके तुरंत बाद ‘सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू’ आता है, यानी सुनने वाले परशुराम हैं — इसलिए बोलने वाले वे नहीं हो सकते।
ध्यान देने योग्य बात: इस अभ्यास में राम और लक्ष्मण — दोनों के दो-दो कथन हैं, और उनका फ़र्क़ बहुत साफ़ है। राम के दोनों वाक्य प्रश्न-रूप में भी विनम्र हैं, लक्ष्मण के दोनों वाक्य प्रश्न-रूप में व्यंग्य हैं। और परशुराम के दोनों कथन तर्क-भरे हैं — एक में वे जानकर भी अनजान बनते हैं, दूसरे में वे राम की ही बात काटते हैं। जनक और सुनयना का एक-एक ही कथन है, क्योंकि इस अंश में वे बहुत कम बोलते हैं — जनक भय से चुप हैं और सुनयना मन-ही-मन बोलती हैं।
पहचान का सरल सूत्र: यदि वाक्य में आदर और स्वयं को छोटा रखने का भाव हो → राम। यदि चुभता हुआ प्रश्न या उपहास हो → लक्ष्मण। यदि आदेश, धमकी या तर्क हो → परशुराम। यदि सूचना हो → जनक। यदि पछतावा या चिंता हो → सुनयना।
प्र2.
2. रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

यह करके दिखाने वाली गतिविधि है। नीचे मंचन की पूरी योजना दी गई है, जिसे आप ज्यों-का-त्यों अपना सकते हैं।

क — पात्र और वेशभूषा

पात्रवेशभूषामुख्य भाव
परशुरामगेरुआ धोती, कंधे पर जनेऊ, सफ़ेद जटा-जूट और दाढ़ी, रुद्राक्ष की मालाएँ, कंधे पर गत्ते या थर्मोकोल का बना फरसा (चाँदी के रंग से रँगा हुआ)क्रोध, तेज, अहंकार
रामपीला धोती-दुपट्टा, मुकुट, हाथ में धनुष; मुख पर हल्का नीला रंग (रामलीला की परंपरा के अनुसार)शांति, विनय
लक्ष्मणकेसरिया धोती-दुपट्टा, छोटा मुकुट, कंधे पर तरकशनिर्भीकता, व्यंग्य
जनकश्वेत वस्त्र, राजसी पगड़ी, गले में मोतियों की मालाशिष्टता, फिर भय
विश्वामित्रश्वेत धोती-उत्तरीय, दंड और कमंडलगंभीरता, सूझ-बूझ
सीता और सुनयनालाल-हरी साड़ी, आभूषण; सीता के हाथ में वरमालाव्यग्रता और चिंता
अन्य राजा (4–6 विद्यार्थी)रंग-बिरंगे दुपट्टे और पगड़ियाँ; मंच के दोनों ओर आसनों परभय और छिपी ईर्ष्या
सूत्रधारसादा कुर्ता-पजामा, हाथ में पोथीदोहे का सस्वर वाचन

ख — मंच-सज्जा और सामग्री

  • बीच में ऊँचा आसन — जनक का सिंहासन; उसके सामने ज़मीन पर लाल कपड़ा और उस पर टूटे धनुष के दो टुकड़े (लकड़ी या मोटे गत्ते के)।
  • पृष्ठभूमि में महल के खंभों का चित्र बना चार्ट या पर्दा।
  • फरसा हलका सामान (थर्मोकोल/गत्ता) का ही बनाइए — सुरक्षा सबसे पहले।

ग — ध्वनि और संगीत की योजना

दृश्यध्वनि / संगीतप्रभाव
परशुराम का प्रवेशढोल की तेज़ थाप + शंख; प्रकाश एकाएक तेज़भय और आगमन की भव्यता
राजाओं का उठ खड़ा होनासब पात्र एक साथ खड़े हों; एक झटके की ध्वनि (ताली/मंजीरा)“उठे सकल भय बिकल भुआला॥”
टूटा धनुष दिखनापूर्ण मौन — 3 सेकंड; केवल एक स्पॉटलाइट टूटे धनुष परमोड़-बिंदु; मौन सबसे बड़ा प्रभाव पैदा करता है
परशुराम का क्रोधनगाड़े की लगातार थाप, बढ़ता हुआ स्वररौद्र रस
सीता-सुनयना का दृश्यबाँसुरी की धीमी, उदास धुनचिंता और व्यग्रता
राम का उत्तरसारा वाद्य बंद; केवल शांत, स्पष्ट स्वरसंयम — शोर के बीच शांति
लक्ष्मण की मुसकानएक हल्की मंजीरे की टंकार, फिर मौनव्यंग्य का प्रवेश
अंतिम दोहाढोल की तेज़ थाप, प्रकाश लाल, फिर एकदम अँधेरातनाव पर पर्दा गिरना

घ — दृश्य-विभाजन (लगभग 12–15 मिनट)

  1. दृश्य 1 — आगमन (2 मिनट): सूत्रधार पहली चौपाई पढ़ता है। परशुराम का प्रवेश; राजाओं का उठना, नाम लेकर प्रणाम करना।
  2. दृश्य 2 — स्वागत (2 मिनट): जनक और सीता का प्रणाम; आशीर्वाद; विश्वामित्र द्वारा राम-लक्ष्मण का परिचय; परशुराम का राम को देखते रह जाना (यहाँ 2 सेकंड का ठहराव अवश्य लीजिए)।
  3. दृश्य 3 — विस्फोट (3 मिनट): ‘कहहु काह अति भीर’ से लेकर ‘उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू’ तक। जनक का मौन; कुटिल राजाओं की तिरछी मुसकान (दर्शक इसे देख सकें — यही इस दृश्य की जान है)।
  4. दृश्य 4 — भय (2 मिनट): मंच के एक कोने में स्पॉटलाइट — सीता और सुनयना; बाँसुरी; ‘अरध निमेष कलप सम बीता’।
  5. दृश्य 5 — विनय (2 मिनट): राम का शांत उत्तर; परशुराम का तर्क; ‘सहसबाहु सम सो रिपु मोरा’।
  6. दृश्य 6 — व्यंग्य और अंत (3 मिनट): लक्ष्मण की मुसकान और व्यंग्य; परशुराम का अंतिम दोहा; अँधेरा। सूत्रधार अंत में बताता है कि आगे राम की विनय और विश्वामित्र के समझाने से आक्रोश शांत होता है।

ङ — कठपुतली रूप में करना हो तो

  • छह कठपुतलियाँ पर्याप्त हैं — परशुराम, राम, लक्ष्मण, जनक, सीता, सुनयना। परशुराम की कठपुतली सबसे बड़ी और उसका फरसा सबसे चमकीला बनाइए, ताकि दूर से भी पहचानी जाए।
  • कठपुतली में चेहरे का भाव नहीं बदलता, इसलिए सारा काम आवाज़ और गति से लेना पड़ेगा — परशुराम की कठपुतली तेज़ी से हिले, राम की लगभग स्थिर रहे।
  • पीछे से चौपाइयाँ सस्वर बोली जाएँ और बीच-बीच में गद्य-रूप में अर्थ भी बताया जाए, ताकि छोटे बच्चे भी समझ सकें।
तैयारी का सुझाव: मंचन से पहले पूरे समूह के साथ चौपाइयाँ तीन बार सस्वर पढ़िए — केवल लय पकड़ने के लिए। अवधी के शब्दों का उच्चारण ठीक कीजिए (‘उलटउँ’, ‘जैहहिं’, ‘लरिकाईं’, ‘भृगुकुलकेतू’), क्योंकि इन्हीं रूपों में कविता की खनक है। और सबसे कठिन भूमिका राम की है — जिसे सबसे कम करना है, उसे सबसे अधिक अभ्यास चाहिए।
प्र3.
3. ‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।’ इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।
उत्तर

यह वाद-विवाद की गतिविधि है, इसलिए दोनों पक्ष तैयार रखने चाहिए। नीचे पक्ष, विपक्ष, संचालन का ढंग और एक पूरा नमूना भाषण दिया गया है।

क — पक्ष में तर्क (सत्य कहने का साहस आवश्यक है)

  1. सत्य न कहने से अन्याय बढ़ता है। जनक की सभा में सब जानते थे कि धनुष किसने तोड़ा, फिर भी कोई नहीं बोला। परिणाम — “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं” और पूरा राज-समाज मृत्यु की धमकी के नीचे खड़ा रहा। चुप्पी ने किसी को नहीं बचाया, केवल संकट को लंबा किया।
  2. चुप्पी अन्याय करने वाले का साहस बढ़ाती है। परशुराम का क्रोध हर चौपाई में एक पायदान ऊपर चढ़ता गया — ‘जड़’, फिर ‘मूढ़’, फिर पूरी पृथ्वी उलट देने की धमकी। जब तक कोई सामने नहीं आया, तब तक कोई रुकावट नहीं थी।
  3. साहस दूसरों को भी साहस देता है। इसी पाठ में लक्ष्मण के बोलते ही सभा का ठहरा हुआ भय टूटता है और संवाद आगे बढ़ता है। एक व्यक्ति के बोलने से माहौल बदल जाता है।
  4. सत्य कहने का अर्थ लड़ना नहीं होता। राम ने भी सत्य ही कहा — “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” — पर विनम्रता से। यानी साहस और शालीनता साथ-साथ चल सकते हैं, और यही सबसे अच्छा रास्ता है।
  5. आधुनिक जीवन के उदाहरण। गाँधी जी का ‘सत्याग्रह’ शब्द ही ‘सत्य’ पर आग्रह से बना है। आज भी जो कर्मचारी भ्रष्टाचार की सूचना देता है (जिसे ‘विसलब्लोअर’ कहते हैं), वह इसी परंपरा में खड़ा है। कक्षा में भी जब कोई किसी की चोरी या नकल के बारे में सच बताता है, तो वह यही साहस दिखा रहा होता है।

ख — विपक्ष के तर्क (जिन्हें आपको काटना होगा, या मानना होगा)

  1. सत्य कहने का समय और ढंग भी देखना चाहिए। यदि लक्ष्मण उस क्षण चुप रहते, तो शायद बात इतनी न बढ़ती। सत्य गलत समय पर कहा जाए तो वह टकराव बन जाता है।
  2. कभी-कभी मौन से बड़ी हानि टल जाती है। जनक के मौन ने ही राम को आगे आकर बात सँभालने का अवसर दिया।
  3. सत्य के साथ ज़िम्मेदारी भी आती है। उस सभा में सीता, सुनयना और सैकड़ों नागरिक थे। बोलने वाले को यह सोचना पड़ता है कि उसके शब्दों का परिणाम किन-किन पर पड़ेगा।

ग — नमूना भाषण (पक्ष में, लगभग 2 मिनट)

“माननीय संचालक महोदय, आदरणीय शिक्षकगण और मेरे प्रिय साथियो! मैं आज इस विषय के पक्ष में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूँ कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।

अपनी बात मैं अपनी पाठ्यपुस्तक से ही शुरू करूँगा। जनक की सभा में परशुराम आते हैं और घोषणा कर देते हैं कि धनुष तोड़ने वाला सामने आ जाए, नहीं तो सब राजा मारे जाएँगे। उस सभा में अनेक राजा बैठे थे, सब जानते थे कि सच क्या है — पर एक भी नहीं बोला। तुलसीदास लिखते हैं — ‘अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं’। मैं आपसे पूछता हूँ — क्या उस चुप्पी से किसी की रक्षा हुई? नहीं। उससे केवल भय बढ़ा और अन्याय को और समय मिला।

और दूसरी ओर देखिए। उसी सभा में दो लोग बोले। पहले राम बोले — बहुत शांत स्वर में, पर सच बोले। फिर लक्ष्मण बोले — बहुत तीखे स्वर में, पर सच बोले। और ध्यान दीजिए, जिस क्षण ये दोनों बोले, उसी क्षण से बात सुलझने की दिशा में बढ़ी। अंततः राम की विनय से ही परशुराम का आक्रोश शांत हुआ।

कुछ लोग कहेंगे कि सत्य कहने से बात बिगड़ती है। मैं मानता हूँ कि सत्य कहने का ढंग महत्वपूर्ण है — और इसीलिए मैं राम का उदाहरण देता हूँ, लक्ष्मण का नहीं। पर ढंग बदलने और चुप हो जाने में बहुत अंतर है। धीरे बोलना और न बोलना — एक बात नहीं है।

हमारे अपने जीवन में भी यही होता है। कक्षा में जब कोई कमज़ोर साथी चिढ़ाया जाता है और हम चुप रह जाते हैं, तो हम चिढ़ाने वाले का साथ दे रहे होते हैं। जब हम अपनी गलती छिपाते हैं, तो उसका बोझ हर दिन बढ़ता जाता है। इसीलिए मैं कहता हूँ — सत्य कहना केवल एक अच्छा गुण नहीं, यह एक ज़िम्मेदारी है। और यह ज़िम्मेदारी सबसे अधिक तब निभानी पड़ती है, जब निभाना सबसे कठिन हो। धन्यवाद।”

घ — गतिविधि का संचालन कैसे करें

चरणक्या करेंसमय
1कक्षा को दो दलों में बाँटिए — पक्ष और विपक्ष; एक संचालक और तीन निर्णायक चुनिए3 मिनट
2हर दल 10 मिनट तैयारी करे — हर तर्क के साथ एक उदाहरण अवश्य ढूँढ़े (पाठ से, इतिहास से या अपने जीवन से)10 मिनट
3हर पक्ष से तीन-तीन वक्ता, प्रत्येक को 2 मिनट12 मिनट
4खंडन-दौर — हर दल दूसरे के एक तर्क का उत्तर दे5 मिनट
5निर्णायक तीन आधारों पर अंक दें — तर्क की मज़बूती, उदाहरण की सटीकता, प्रस्तुति5 मिनट
6अंत में सब मिलकर एक साझा निष्कर्ष लिखें, जिसमें दोनों पक्षों की अच्छी बात हो5 मिनट
साझा निष्कर्ष का नमूना: “सत्य कहना आवश्यक है, पर उसे कहने का ढंग उतना ही आवश्यक है। राम ने सत्य विनय से कहा, लक्ष्मण ने साहस से — दोनों ने सत्य ही कहा। इसलिए सही प्रश्न यह नहीं है कि सच बोलें या नहीं; सही प्रश्न यह है कि उसे इस तरह कैसे कहें कि वह सुना भी जाए और किसी का अहित भी न हो।”
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