गंगा अध्याय 9 गद्य-रूप

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
अब आप नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए— “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥”
उत्तर

गद्य-रूप —

अत्यधिक भय के कारण राजा जनक परशुराम को कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे। उन्हें इस प्रकार निरुत्तर और असहाय देखकर सभा में बैठे कुटिल (दुष्ट) राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे। उधर देवता, मुनि, नाग तथा नगर के सभी स्त्री-पुरुष हृदय में भारी भय लिए हुए चिंतित हो रहे थे।

यह गद्य-रूप कैसे बना — चरण-दर-चरण

चौपाई का चरणगद्य-रूपक्या-क्या बदला
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।”अत्यधिक भय के कारण राजा जनक परशुराम को कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे।‘डरु’ → ‘भय’, ‘नृपु’ → ‘राजा जनक’ (नाम स्पष्ट किया गया), ‘उतरु’ → ‘उत्तर’; और ‘के कारण’ जोड़कर कारण-संबंध साफ़ किया गया
“कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥”उन्हें निरुत्तर देखकर सभा में बैठे कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे।‘भूप’ → ‘राजा’, ‘माहीं’ → ‘में’; ‘उन्हें निरुत्तर देखकर’ जोड़कर दोनों वाक्यों की कड़ी बनाई गई
“सुर मुनि नाग नगर नर नारी।”उधर देवता, मुनि, नाग तथा नगर के सभी स्त्री-पुरुष…सूची को अल्पविराम और ‘तथा’ से जोड़ा गया; ‘उधर’ लगाकर दृश्य का बदलना दिखाया गया
“सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥”…हृदय में भारी भय लिए हुए चिंतित हो रहे थे।‘सोचहिं’ → ‘चिंतित हो रहे थे’, ‘त्रास’ → ‘भय’, ‘उर’ → ‘हृदय’; शब्द-क्रम बदलकर सीधा किया गया

गद्य-रूप लिखने के नियम — पुस्तक के अपने उदाहरण से सीखिए

पुस्तक ने पहले यह उदाहरण दिया है — “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥” का गद्य-रूप: “इसमें राम परशुराम से विनम्रतापूर्वक कहते हैं— हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा। आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? राम की यह बात सुनकर क्रोधित परशुराम कहते हैं।” इससे ये नियम निकलते हैं —

  1. अवधी शब्दों को खड़ी बोली में बदलिए। ‘डरु’ → ‘भय’, ‘उतरु’ → ‘उत्तर’, ‘नृपु’ → ‘राजा’, ‘माहीं’ → ‘में’, ‘उर’ → ‘हृदय’।
  2. पदक्रम सीधा कीजिए। कविता में शब्द लय के अनुसार आगे-पीछे हो जाते हैं; गद्य में कर्ता → कर्म → क्रिया का सामान्य क्रम रखिए।
  3. जो बात संकेत में है, उसे खोल दीजिए। ‘नृपु’ कहने से पाठक को यह पता नहीं चलता कि कौन-सा राजा; इसलिए गद्य में ‘राजा जनक’ लिखिए।
  4. वाक्यों को जोड़िए। कविता के दो चरण अलग-अलग खड़े रहते हैं; गद्य में उनके बीच ‘क्योंकि’, ‘इसलिए’, ‘उधर’, ‘यह देखकर’ जैसे शब्द लगाकर संबंध दिखाना पड़ता है।
  5. विराम-चिह्न लगाइए। कविता के ‘।’ और ‘॥’ की जगह गद्य में पूर्ण विराम, अल्पविराम, प्रश्नवाचक और विस्मयादिबोधक चिह्न आते हैं।
  6. भाव और अर्थ में कुछ जोड़िए-घटाइए मत। गद्य-रूप अनुवाद है, व्याख्या नहीं। जो चौपाई में नहीं है, वह गद्य-रूप में भी नहीं आना चाहिए।
अभ्यास के लिए दो और चौपाइयाँ (स्वयं कीजिए, नमूना उत्तर साथ है):
(क) “देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥” → परशुराम का भयानक वेष देखते ही सभा में उपस्थित सभी राजा भय से व्याकुल होकर उठ खड़े हुए।
(ख) “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥ बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥” → मुनि परशुराम के ये वचन सुनकर लक्ष्मण मुसकराए और उनका अपमान करते हुए बोले — हमने बचपन में बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी हैं, पर हे गोसाईं! आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ