गंगा अध्याय 9 लोक में भाषा

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नीचे कोष्ठक में कविता से कुछ शब्द चुनकर दिए गए हैं। उन शब्दों से संबंधित लोकोक्ति और उनका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए। — मन, राम, राजा, बात, सिरु (सिर)
उत्तर

पहले एक बात स्पष्ट कर लें — लोकोक्ति (कहावत) एक पूरा वाक्य होती है, जो लोक के अनुभव से बनी होती है और अपने-आप में पूरा अर्थ रखती है; जैसे ‘मन के जीते जीत है’। मुहावरा वाक्यांश होता है, जिसे वाक्य में ढालना पड़ता है; जैसे ‘सिर नवाना’। नीचे पाँचों शब्दों की लोकोक्तियाँ, उनके अर्थ और स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग दिए गए हैं।

शब्दलोकोक्तिअर्थस्वतंत्र वाक्य में प्रयोग
मनमन के जीते जीत है, मन के हारे हार।आत्मविश्वास, साहस और मनोबल से सफलता निश्चित है।फ़ाइनल मैच से पहले कोच ने कहा — “याद रखो, मन के जीते जीत है, मन के हारे हार; इसलिए मैदान में उतरने से पहले हार मत मानना।”
राममुँह में राम, बगल में छुरी।ऊपर से मीठा बोलना और भीतर से हानि पहुँचाने की सोचना; कपटपूर्ण व्यवहार।जो व्यक्ति सामने आपकी प्रशंसा करे और पीठ पीछे शिकायत करे, उसके लिए ही कहा गया है — मुँह में राम, बगल में छुरी।
राजाजैसा राजा वैसी प्रजा।शासक या नेता के गुण-अवगुण का प्रभाव उसके अधीन लोगों पर भी पड़ता है।जिस विद्यालय के प्रधानाचार्य स्वयं समय के पक्के हों, वहाँ के विद्यार्थी भी देर से नहीं आते — जैसा राजा वैसी प्रजा।
बातमुँह से निकली बात और कमान से निकला तीर वापस नहीं आते।कही हुई बात वापस नहीं ली जा सकती, इसलिए सोच-समझकर बोलना चाहिए।क्रोध में उसने मित्र को जो कह दिया, उसका पछतावा उसे वर्षों रहा — सच ही कहा है, मुँह से निकली बात और कमान से निकला तीर वापस नहीं आते।
सिरु (सिर)सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े।काम शुरू करते ही विघ्न या विपत्ति आ जाना।नई दुकान खोलने के दूसरे ही दिन बाज़ार बंद हो गया — बेचारे के तो सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े।

हर शब्द की एक-एक और लोकोक्ति (यदि आप दूसरी लिखना चाहें)

शब्दवैकल्पिक लोकोक्तिअर्थ
मनमन चंगा तो कठौती में गंगा।यदि मन शुद्ध है तो तीर्थ जाने की आवश्यकता नहीं; भक्ति भीतर की चीज़ है।
रामराम मिलाई जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी।बिलकुल बेमेल लोगों का मेल हो जाना।
राजाराजा करे सो न्याय।शक्तिशाली व्यक्ति जो कर दे, वही नियम मान लिया जाता है (व्यंग्य में)।
बातबात का बतंगड़ बनाना।छोटी-सी बात को बहुत बड़ा बना देना।
सिरसिर सलामत तो पगड़ी हज़ार।जान बची रहे तो बाक़ी सब फिर से पाया जा सकता है।
पाठ से जोड़िए — ये पाँचों लोकोक्तियाँ इसी कविता पर लागू होती हैं:
  • “मन के जीते जीत है” — भरी सभा में जो मन से हार गए, वे चुप रह गए; जो मन से नहीं हारे (राम और लक्ष्मण), वे बोले।
  • “मुँह में राम, बगल में छुरी” — ठीक वही चित्र जो तुलसी ने खींचा है: “कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” बाहर से चिंतित, भीतर से प्रसन्न।
  • “जैसा राजा वैसी प्रजा” — जनक चुप हुए तो पूरी सभा चुप हो गई; एक भी राजा नहीं बोला।
  • “मुँह से निकली बात… वापस नहीं आती” — लक्ष्मण की एक मुसकान और एक वाक्य ने पूरे प्रसंग का रुख बदल दिया, और उसे वापस नहीं लिया जा सका। इस कहावत में ‘कमान’ का उल्लेख है — और हमारा पूरा पाठ ही धनुष पर टिका है!
  • “सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े” — धनुष टूटा, विवाह तय हुआ, और उसी क्षण परशुराम आ पहुँचे। सुनयना की पंक्ति ‘बिधि अब सँवरी बात बिगारी’ ठीक इसी भाव की है।
अपने काम के लिए: अपने घर के बड़ों से इन पाँच शब्दों पर और कहावतें पूछिए और उन्हें एक कॉपी में इकट्ठा कीजिए। हर कहावत के साथ यह भी लिखिए कि वह किस स्थिति में बोली जाती है — क्योंकि लोकोक्ति का असली अर्थ उसके शब्दों में नहीं, उसके अवसर में होता है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ