गंगा अध्याय 9 बहुभाषिकता

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है जो कि हिंदी भाषा का ही एक स्वरूप है और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बोली जाती है। कविता में ऐसे बहुत से शब्द आए हैं, जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचान कर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए। साथ ही आपकी भाषा में इनके लिए कौन-से शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन्हें भी लिखिए। उदाहरण— कोही : क्रोधी / वेषु : वेष
उत्तर

पूरी भरी हुई तालिका नीचे दी गई है। पहली दो पंक्तियाँ पुस्तक की दी हुई हैं; शेष कविता में से चुनी गई हैं। तीसरा स्तंभ ‘मेरी भाषा में शब्द’ हर विद्यार्थी का अपना होगा — नीचे उत्तर भारत की कुछ प्रचलित बोलियों (भोजपुरी, ब्रज, बुंदेली, हरियाणवी आदि) के रूप नमूने के तौर पर दिए गए हैं। आप अपनी बोली या मातृभाषा के शब्द इस स्तंभ में लिखिए।

अवधी शब्दखड़ी बोली का शब्दमेरी भाषा में शब्द (नमूना)
कोहीक्रोधीगुस्सैल, क्रोधी, चिड़चिड़ा; भोजपुरी — गोस्सावाला
बेषुवेषभेस, पहनावा, रूप, हुलिया
करालाकराल, भयानकडरावना, भयंकर, डरौना
भुआलाभूपाल, राजाराजा, नरेश, महाराज
चितवहिंदेखते हैंनिहारते हैं, ताकते हैं, देखत हउवें (भोजपुरी)
सुभायँस्वभाव सेआदत से, सुभाव से, ढंग से
बहोरिफिर, इसके बादफिर, तब, तत्पश्चात्, फेर (ब्रज/हरियाणवी)
सिरुसिरसर, माथा, मूँड़
ढोटापुत्र, बेटाबेटा, लड़का, छोरा (ब्रज), लइका (भोजपुरी)
जोटाजोड़ाजोड़ी, युगल, जोड़ा
लोचनआँख, नेत्रआँख, नैन, नयन, अँखिया
अनतअन्यत्र, और कहींदूसरी ओर, कहीं और, दूसरी जगह
चापखंडधनुष के टुकड़ेकमान के टुकड़े, धनुष के हिस्से
महिपृथ्वी, धरतीधरती, ज़मीन, भुइँ, माटी
रिसक्रोध, रोषगुस्सा, ग़ुस्सा, रोष, तैश
जड़मूर्खबेवकूफ़, नासमझ, बुद्धू, मूरख
बेगिशीघ्र, जल्दीजल्दी, फ़ौरन, झट, तुरंत
मूढ़मूर्खमूरख, गँवार, नादान
आजूआजआज, आजु (भोजपुरी), आज के दिन
उलटउँउलट दूँगापलट दूँगा, उलट-पलट कर दूँगा
राजूराज्यराज, रियासत, इलाक़ा
नृपुराजा, नृपराजा, महाराजा
माहींमें, भीतरमें, अंदर, भीतर, माँ (ब्रज)
त्रासभय, डरडर, ख़ौफ़, दहशत, भय
बिधिविधाता, ईश्वरभगवान, ऊपरवाला, विधाता, करतार
महतारीमाता, माँमाँ, अम्मा, महतारी (भोजपुरी में आज भी यही), माई
बिलोकेदेखादेखा, निहारा, ताका
भीरुभयभीत, डरी हुईडरी हुई, सहमी हुई, घबराई हुई
हरषुहर्ष, प्रसन्नताख़ुशी, आनंद, हरख (बोलचाल में)
बिषादुविषाद, दुखदुख, उदासी, ग़म
भंजनिहारातोड़ने वालातोड़ने वाला, तोड़नहार, तोड़ैया
आयसुआज्ञा, आदेशआज्ञा, हुक्म, आदेश
रिसाइक्रोध करकेगुस्सा होकर, नाराज़ होकर, रिसियाकर (भोजपुरी)
सेवकाईसेवा (का काम)सेवा, ख़िदमत, टहल
अरिशत्रुदुश्मन, बैरी, वैरी
लराईलड़ाईलड़ाई, झगड़ा, भिड़ंत
रिपुशत्रुदुश्मन, बैरी, विरोधी
जैहहिंजाएँगेजाएँगे, जइहें (भोजपुरी), जावेंगे (हरियाणवी)
लरिकाईंलड़कपन में, बचपन मेंबचपन में, लड़कपन में, लरिकाई (भोजपुरी में आज भी यही)
गोसाईंगोस्वामी, स्वामी, महाराजमहाराज, स्वामी जी, बाबा जी
तोहितुझेतुझे, तोहे (ब्रज), तोहरा (भोजपुरी), तन्ने (हरियाणवी)
सँभारसुध, संभालहोश, सुध-बुध, सँभाल
बिदितविदित, जाना-पहचानामालूम, जगजाहिर, सबको पता

अवधी की पहचान — कुछ नियम जो इस तालिका से अपने आप निकल आते हैं

नियमउदाहरण
संज्ञा-शब्दों के अंत में प्रायः ‘उ’ जुड़ जाता हैबेषु, सिरु, नृपु, डरु, उतरु, प्रनामु, रामु, लखनु, कोपु, हरषु, बिषादु
‘व’ प्रायः ‘ब’ हो जाता हैबिस्वामित्रु (विश्वामित्र), बिधि (विधि), बिलोके (विलोके), बिषादु (विषाद), बिदेह (विदेह)
क्रिया-रूपों में ‘हिं’ और ‘हहिं’ लगते हैंचितवहिं, सोचहिं, जैहहिं, होइहि
सर्वनाम ‘जेहि, तेहि, केहि’ के रूप में चलते हैंजेहि सुभायँ, जेहि कारन, केहि हेतू
‘आ’ या ‘ऊ’ जोड़कर शब्द को लयदार बनाया जाता हैकराला, भुआला, आजू, राजू, हेतू, केतू
इससे क्या समझ में आता है: ध्यान दीजिए कि ये शब्द आज भी पूरी तरह अजनबी नहीं लगते — ‘महतारी’, ‘लरिकाई’, ‘रिसियाना’, ‘मूरख’, ‘बेगि’ जैसे शब्द उत्तर भारत के गाँव-घर में आज भी सुनाई देते हैं। इसका अर्थ है कि अवधी कोई अलग-थलग भाषा नहीं, हिंदी की ही एक जीवित शाखा है — जैसा पुस्तक ने स्वयं कहा है। यही कारण है कि पाँच सौ साल बाद भी रामचरितमानस लाखों घरों में बिना अनुवाद के पढ़ा और गाया जाता है।
अपने काम के लिए सुझाव: तीसरा स्तंभ भरने के लिए घर के बड़ों से पूछिए — दादी-नानी की भाषा में इनमें से कई शब्द ज्यों-के-त्यों मिल जाएँगे। यदि आपकी मातृभाषा हिंदी नहीं है (जैसे मराठी, तमिल, बांग्ला, ओड़िआ), तो उसी भाषा के शब्द लिखिए — तुलना और भी रोचक हो जाएगी।
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