गंगा अध्याय 9 व्याकरण की बात

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए— “देखत भृगुपति बेषु कराला।” / “बोले परसुधरहि अपमाने॥” / “सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू” — यहाँ परशुराम को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है, जैसे- भृगुपति, परसुधर और भृगुकुलकेतू। इन नामों का अर्थ स्पष्ट कीजिए और बताइए कि कवि ने एक ही पात्र के लिए अलग-अलग नाम क्यों रखे हैं।
उत्तर

तुलसीदास ने इस छोटे-से अंश में परशुराम को कम-से-कम छह अलग-अलग नामों और संबोधनों से पुकारा है। नीचे सबका अर्थ, स्रोत-पंक्ति और वहाँ उसका औचित्य दिया गया है।

नाम / संबोधनशब्द-रचना और अर्थपाठ की पंक्तिवहीं यह नाम क्यों
भृगुपतिभृगु + पति = भृगुकुल के स्वामी“देखत भृगुपति बेषु कराला।”पहली बार परिचय देते समय — कुल और पद बताकर उनका प्रभुत्व स्थापित किया गया है, ताकि सभा का भय समझ में आ जाए।
परसुधरपरशु (फरसा) + धर (धारण करने वाला) = फरसाधारी“बोले परसुधरहि अपमाने॥”ठीक उस क्षण, जब लक्ष्मण उनका अपमान कर रहे हैं। यहाँ वे मुनि नहीं, शस्त्रधारी के रूप में देखे जा रहे हैं — यानी नाम में ही ख़तरे का संकेत है।
भृगुकुलकेतूभृगुकुल + केतु (ध्वज/दीपक) = भृगुवंश का ध्वज“सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥”जब वे लक्ष्मण के व्यंग्य पर भड़कते हैं। इतने भव्य नाम के ठीक बाद इतनी छोटी बात पर क्रोध — इससे विरोध और तीखा हो जाता है। यह रूपक भी है।
मुनि / मुनि कोहीमुनि = तपस्वी; कोही = क्रोधी“सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥”दो विरोधी शब्द एक साथ — विरोधाभास। परशुराम का पूरा द्वंद्व इसी जोड़ी में है: तपस्वी होकर भी क्रोधी।
नाथस्वामी, प्रभुनाथ संभुधनु भंजनिहारा।”यह राम का संबोधन है। इससे राम की विनम्रता प्रकट होती है — वे उन्हें अपना स्वामी मानकर बोलते हैं।
गोसाईंगोस्वामी → गोसाईं = स्वामी, महाराज“कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥”यह लक्ष्मण का संबोधन है। शब्द आदर का है, पर स्वर उपहास का — इसीलिए यह व्यंग्य (वक्रोक्ति) बन जाता है।

कवि ने एक ही पात्र के लिए अलग-अलग नाम क्यों रखे — पाँच कारण

  1. हर नाम एक नई जानकारी देता है। ‘भृगुपति’ से कुल पता चलता है, ‘परसुधर’ से शस्त्र, ‘भृगुकुलकेतू’ से प्रतिष्ठा। यानी बिना अलग से वर्णन किए, केवल नाम बदलकर कवि पात्र का पूरा परिचय दे देता है।
  2. नाम भाव के अनुसार बदलता है। ध्यान दीजिए — जहाँ भय है वहाँ ‘भृगुपति’, जहाँ टकराव है वहाँ ‘परसुधर’, जहाँ क्रोध है वहाँ ‘भृगुकुलकेतू’। नाम स्वयं वातावरण का संकेत बन जाता है।
  3. वक्ता के अनुसार बदलता है। राम कहते हैं ‘नाथ’, लक्ष्मण कहते हैं ‘गोसाईं’ — एक में श्रद्धा है, दूसरे में व्यंग्य। यानी संबोधन से बोलने वाले का चरित्र भी खुल जाता है।
  4. छंद और तुक की आवश्यकता। चौपाई में हर चरण 16 मात्रा का होता है और चरणांत में तुक चाहिए। ‘भृगुकुलकेतू’ का प्रयोग ‘केहि हेतू’ के साथ तुक बनाने के लिए भी है — हेतू – केतू
  5. दोहराव से बचाव। यदि पूरे अंश में बार-बार ‘परशुराम’ ही आता, तो पढ़ने में एकरसता आ जाती। नाम बदलते रहने से भाषा में विविधता और गति बनी रहती है।
यही बात दूसरे पात्रों पर भी लागू है: राम को कहीं ‘राम’ कहा गया है, कहीं ‘श्रीरघुबीरु’ (रघुकुल के वीर); जनक को कहीं ‘जनक’, कहीं ‘बिदेह’, कहीं ‘नृपु’ और कहीं ‘भूप’; सीता को ‘सीय’, ‘सीता’ और ‘जानकी’। हिंदी व्याकरण में ऐसे शब्दों को पर्यायवाची कहते हैं। तुलसी इनका प्रयोग केवल शब्द बदलने के लिए नहीं, अर्थ बदलने के लिए करते हैं — यह ध्यान से पढ़ने पर ही दिखाई देता है।
प्र2.
आप इस कविता में अनेक विशेषताएँ देख सकते हैं, जैसे- दोहा-चौपाई का क्रम से होना, बिना वक्ता का नाम बताए उनका कथन कह देना, मुहावरों का उपयोग करना आदि। नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और उनके एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप लिखिए। — अनुप्रास अलंकार (एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति) : अरि करनी करि करिअ लराई / अतिशयोक्ति अलंकार (बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना) : अरध निमेष कलप सम बीता / रूपक अलंकार (रूप का आरोपण करना) : पद सरोज मेले दोउ भाई
उत्तर

पूरी भरी हुई तालिका इस प्रकार है। पहला उदाहरण पुस्तक का दिया हुआ है और दूसरा उदाहरण कविता में से खोजकर जोड़ा गया है —

विशेषताअर्थउदाहरण (पुस्तक का)एक और उदाहरण
अनुप्रास अलंकारएक ही वर्ण की बार-बार आवृत्तिअरि करनी करि करिअ लराईसुर मुनि नागर नारी
अतिशयोक्ति अलंकारबात को बढ़ा-चढ़ाकर कहनाअरध निमेष कलप सम बीताउलटउँ महि जहँ लहि तव राजू
रूपक अलंकाररूप का आरोपण करनापद सरोज मेले दोउ भाईसुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू

जोड़े गए उदाहरण क्यों सही हैं —

  1. अनुप्रास — “सुर मुनि नाग नगर नर नारी”
    इस एक ही चरण में ‘’ वर्ण चार बार आया है — नाग, नगर, नर, नारी। पुस्तक की परिभाषा है “एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति”, और यहाँ आवृत्ति इतनी घनी है कि पंक्ति पढ़ते ही कानों में एक लय बन जाती है। पूरे पाठ में इससे स्पष्ट अनुप्रास दूसरा नहीं है।
    अन्य विकल्प:बहुरि बिलोकि बिदेह” (ब की तीन आवृत्तियाँ), “रूप अपार मामोचन” (म की तीन), “काहिअ किन” (क की तीन)।

  2. अतिशयोक्ति — “उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू”
    परशुराम कह रहे हैं कि वे जनक के राज्य तक फैली सारी पृथ्वी को उलट देंगे। यह बात स्पष्ट रूप से बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है — कोई भी व्यक्ति पृथ्वी उलट नहीं सकता। पर यही अतिशयोक्ति उनके क्रोध की भीषणता दिखाने का सबसे अच्छा उपाय है।
    अन्य विकल्प: “सो जानइ जनु आइ खुटानी” — केवल दृष्टि पड़ जाने से आयु समाप्त हो आने का आभास; और “रूप अपार मार मद मोचन” — सौंदर्य ऐसा कि कामदेव का गर्व भी चूर हो जाए।

  3. रूपक — “सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू”
    भृगुकुलकेतू’ का अर्थ है ‘भृगुकुल का ध्वज/दीपक’। यहाँ उपमेय (परशुराम) पर उपमान (केतु यानी ध्वज) का सीधा आरोप कर दिया गया है; बीच में ‘जैसा’, ‘सम’ या ‘सरिस’ जैसा कोई वाचक शब्द नहीं है। यही रूपक की पहचान है — जहाँ उपमेय और उपमान में अभेद स्थापित हो जाए।
    अन्य विकल्प:चरन” के लिए प्रयुक्त ‘पद सरोज’ (पुस्तक का उदाहरण) की तरह ही “बहुरि बिलोकि बिदेह” में ‘बिदेह’ भी एक अर्थपूर्ण नाम-रूपक है; और ‘श्रीरघुबीरु’ में भी राम पर ‘रघुकुल के वीर’ का आरोप है।

पुस्तक ने जिन तीन और विशेषताओं का नाम लिया है, उनके उदाहरण भी देख लीजिए

विशेषताअर्थकविता से उदाहरण
दोहा-चौपाई का क्रम से होनाआठ चौपाइयों के बाद एक दोहा — यही क्रम पूरे अंश में तीन बार चलता हैचौपाई 1–8 के बाद दोहा “बहुरि बिलोकि बिदेह सन…”; फिर चौपाई 9–16 के बाद दोहा “सभय बिलोके लोग सब…”; फिर चौपाई 17–24 के बाद दोहा “रे नृप बालक काल बस…”। चौपाई कथा को आगे बढ़ाती है, दोहा उस खंड को समेट देता है।
बिना वक्ता का नाम बताए कथन कह देनाकवि यह नहीं लिखता कि ‘राम ने कहा’ या ‘लक्ष्मण ने कहा’ — कथन सीधे आ जाता है और पाठक संदर्भ से समझ लेता हैनाथ संभुधनु भंजनिहारा…” — यह राम का कथन है, पर उनका नाम यहाँ नहीं आया (नाम पिछले दोहे में ‘बोले श्रीरघुबीरु’ के रूप में आ चुका था)। इसी तरह “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं…” लक्ष्मण का कथन है, पर उसमें उनका नाम नहीं है। और “बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥” सुनयना का कथन है, बिना किसी परिचय-वाक्य के।
मुहावरों/लोक-प्रयोगों का उपयोगबोलचाल के प्रचलित प्रयोग, जो बात को तुरंत समझा देते हैंबिधि अब सँवरी बात बिगारी” — ‘बनी-बनाई बात बिगड़ना’ आज भी घर-घर में बोला जाता है। “थकि रहे लोचन” — ‘आँखें थक जाना’ यानी टकटकी बँध जाना। “ब्यापेउ कोपु सरीर” — ‘क्रोध से शरीर भर जाना’। “सिरु नावा” — ‘सिर नवाना’।
अलंकार पहचानने का सरल सूत्र: (1) यदि पंक्ति में वही वर्ण बार-बार सुनाई दे → अनुप्रास। (2) यदि बात असंभव हद तक बढ़ी हुई लगे → अतिशयोक्ति। (3) यदि दो चीज़ों की तुलना में ‘जैसे/सम/सरिस/जिमि’ जैसा वाचक शब्द हो → उपमा; और यदि वह वाचक शब्द हो और एक को सीधे दूसरा कह दिया जाए → रूपक। इसी सूत्र से “सहसबाहु सम सो रिपु मोरा” उपमा है और “पद सरोज” रूपक।
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