‘मौन संवाद’ क्या होता है — वह बातचीत जो मुँह से नहीं, केवल आँखों, चेहरे और मन से होती है। दोनों पात्र एक-दूसरे की बात बिना कहे समझ जाते हैं। लिखते समय हर कथन के साथ यह भी दिखाइए कि वह ‘कहा’ कैसे गया — दृष्टि से, सिर हिलाकर, हाथ थामकर।
अच्छे उत्तर में क्या-क्या होना चाहिए —
- दोनों पात्रों की मनःस्थिति पाठ से निकले — सुनयना की चिंता “बिधि अब सँवरी बात बिगारी” से, सीता की व्यग्रता “अरध निमेष कलप सम बीता” से।
- दोनों की भाषा और भाव अलग सुनाई दें — माँ की चिंता व्यावहारिक और सुरक्षा-भरी हो, पुत्री की चिंता कोमल, संकोच-भरी और प्रेमजनित हो।
- एक भी शब्द बोला हुआ न हो — सारा संवाद कोष्ठक में दिए संकेतों और मन के वाक्यों से चले।
- अंत में एक सांत्वना या संकल्प का क्षण हो, ताकि संवाद अधूरा न लगे।
नमूना उत्तर:
मौन संवाद — सीता और सुनयना
(दृश्य: मिथिला की सभा का एक कोना। दूर परशुराम की गरजती आवाज़ सुनाई दे रही है। सीता सखियों के बीच खड़ी हैं, पर उनकी दृष्टि बार-बार सभा की ओर जा रही है। सुनयना पास आकर उनके कंधे पर हाथ रखती हैं।)
| कौन | मन में जो कहा गया | वह कैसे ‘कहा’ गया |
|---|---|---|
| सुनयना | ‘बेटी, घबरा मत। जो होना है वह होकर रहेगा — पर तू यहीं मेरे पास खड़ी रह।’ | सीता के कंधे पर हाथ रखकर, उन्हें अपनी ओर हल्का-सा खींचते हुए |
| सीता | ‘माँ, वे इतना क्रोध क्यों कर रहे हैं? धनुष ही तो टूटा है… और वह भी अपने आप।’ | एक बार माँ की ओर देखकर, फिर तुरंत दृष्टि झुकाकर |
| सुनयना | ‘तू नहीं जानती बेटी। वह धनुष उनके आराध्य का था। और जो कोप उनके शरीर में समा चुका है, वह शब्दों से नहीं उतरता।’ | धीरे से सिर हिलाकर, आँखों में गहरी चिंता लिए |
| सीता | ‘पर उन्होंने तो कुछ भी अनुचित नहीं किया। मैंने उन्हें देखा है, माँ — उनके चेहरे पर अभी भी वैसी ही शांति है।’ | सभा की दिशा में एक क्षण देखकर, फिर काँपते होंठों को दबाकर |
| सुनयना | (मन ही मन) ‘हे विधाता! तूने बनी-बनाई बात क्यों बिगाड़ दी? कल तक तो सब कुछ सँवरा हुआ था…’ | आकाश की ओर एक क्षण देखकर, फिर आँचल का कोना मुट्ठी में भींचकर |
| सीता | (मन ही मन) ‘यह आधा पल भी क्यों नहीं बीत रहा? लगता है जैसे एक पूरा युग बीत गया हो और अभी भी वहीं खड़ी हूँ…’ | पलकें झपकाना भूलकर, एक ही दिशा में स्थिर दृष्टि |
| सुनयना | ‘मत देख उधर। तेरा देखना ही तुझे और तोड़ेगा।’ | सीता का चेहरा दोनों हथेलियों में लेकर अपनी ओर मोड़ते हुए |
| सीता | ‘माँ, आपका हाथ काँप रहा है। आप भी तो डर रही हैं।’ | माँ का हाथ अपने हाथ में लेकर, आँखों में देखते हुए |
| सुनयना | (एक क्षण रुककर) ‘हाँ… पर माँ का डर बेटी को दिखाना नहीं चाहिए।’ | एक थकी-सी, आधी मुसकान — जो पूरी नहीं हो पाती |
| सीता | ‘मैंने उन्हें मन से वर लिया है, माँ। अब जो होगा, उसे भी मन से ही सह लूँगी।’ | आँखें बंद कर, गहरी साँस लेकर, हाथ जोड़कर |
| सुनयना | ‘तो चल, हम दोनों यहीं खड़ी होकर प्रतीक्षा करें। कम-से-कम साथ तो हैं।’ | सीता का हाथ अपने हाथ में कसकर पकड़ते हुए; दोनों की दृष्टि फिर सभा की ओर |
(दूर से आवाज़ आती है — “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” दोनों की पकड़ और कस जाती है। पर्दा गिरता है।)