गंगा अध्याय 9 सृजन

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।
उत्तर

‘मौन संवाद’ क्या होता है — वह बातचीत जो मुँह से नहीं, केवल आँखों, चेहरे और मन से होती है। दोनों पात्र एक-दूसरे की बात बिना कहे समझ जाते हैं। लिखते समय हर कथन के साथ यह भी दिखाइए कि वह ‘कहा’ कैसे गया — दृष्टि से, सिर हिलाकर, हाथ थामकर।

अच्छे उत्तर में क्या-क्या होना चाहिए —

  • दोनों पात्रों की मनःस्थिति पाठ से निकले — सुनयना की चिंता “बिधि अब सँवरी बात बिगारी” से, सीता की व्यग्रता “अरध निमेष कलप सम बीता” से।
  • दोनों की भाषा और भाव अलग सुनाई दें — माँ की चिंता व्यावहारिक और सुरक्षा-भरी हो, पुत्री की चिंता कोमल, संकोच-भरी और प्रेमजनित हो।
  • एक भी शब्द बोला हुआ न हो — सारा संवाद कोष्ठक में दिए संकेतों और मन के वाक्यों से चले।
  • अंत में एक सांत्वना या संकल्प का क्षण हो, ताकि संवाद अधूरा न लगे।

नमूना उत्तर:

मौन संवाद — सीता और सुनयना

(दृश्य: मिथिला की सभा का एक कोना। दूर परशुराम की गरजती आवाज़ सुनाई दे रही है। सीता सखियों के बीच खड़ी हैं, पर उनकी दृष्टि बार-बार सभा की ओर जा रही है। सुनयना पास आकर उनके कंधे पर हाथ रखती हैं।)

कौनमन में जो कहा गयावह कैसे ‘कहा’ गया
सुनयना‘बेटी, घबरा मत। जो होना है वह होकर रहेगा — पर तू यहीं मेरे पास खड़ी रह।’सीता के कंधे पर हाथ रखकर, उन्हें अपनी ओर हल्का-सा खींचते हुए
सीता‘माँ, वे इतना क्रोध क्यों कर रहे हैं? धनुष ही तो टूटा है… और वह भी अपने आप।’एक बार माँ की ओर देखकर, फिर तुरंत दृष्टि झुकाकर
सुनयना‘तू नहीं जानती बेटी। वह धनुष उनके आराध्य का था। और जो कोप उनके शरीर में समा चुका है, वह शब्दों से नहीं उतरता।’धीरे से सिर हिलाकर, आँखों में गहरी चिंता लिए
सीता‘पर उन्होंने तो कुछ भी अनुचित नहीं किया। मैंने उन्हें देखा है, माँ — उनके चेहरे पर अभी भी वैसी ही शांति है।’सभा की दिशा में एक क्षण देखकर, फिर काँपते होंठों को दबाकर
सुनयना(मन ही मन) ‘हे विधाता! तूने बनी-बनाई बात क्यों बिगाड़ दी? कल तक तो सब कुछ सँवरा हुआ था…’आकाश की ओर एक क्षण देखकर, फिर आँचल का कोना मुट्ठी में भींचकर
सीता(मन ही मन) ‘यह आधा पल भी क्यों नहीं बीत रहा? लगता है जैसे एक पूरा युग बीत गया हो और अभी भी वहीं खड़ी हूँ…’पलकें झपकाना भूलकर, एक ही दिशा में स्थिर दृष्टि
सुनयना‘मत देख उधर। तेरा देखना ही तुझे और तोड़ेगा।’सीता का चेहरा दोनों हथेलियों में लेकर अपनी ओर मोड़ते हुए
सीता‘माँ, आपका हाथ काँप रहा है। आप भी तो डर रही हैं।’माँ का हाथ अपने हाथ में लेकर, आँखों में देखते हुए
सुनयना(एक क्षण रुककर) ‘हाँ… पर माँ का डर बेटी को दिखाना नहीं चाहिए।’एक थकी-सी, आधी मुसकान — जो पूरी नहीं हो पाती
सीता‘मैंने उन्हें मन से वर लिया है, माँ। अब जो होगा, उसे भी मन से ही सह लूँगी।’आँखें बंद कर, गहरी साँस लेकर, हाथ जोड़कर
सुनयना‘तो चल, हम दोनों यहीं खड़ी होकर प्रतीक्षा करें। कम-से-कम साथ तो हैं।’सीता का हाथ अपने हाथ में कसकर पकड़ते हुए; दोनों की दृष्टि फिर सभा की ओर

(दूर से आवाज़ आती है — “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” दोनों की पकड़ और कस जाती है। पर्दा गिरता है।)

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: पूरा संवाद पाठ की दो पंक्तियों पर टिका है — माँ की ‘बिधि अब सँवरी बात बिगारी’ और पुत्री की ‘अरध निमेष कलप सम बीता’ — और दोनों पंक्तियाँ संवाद के भीतर सहज रूप से आ गई हैं। साथ ही दोनों के भाव अलग रखे गए हैं: माँ का भय व्यावहारिक है (क्या होगा, कैसे बचेगा), बेटी का भय भावनात्मक है (उनके साथ कुछ न हो जाए)। यही अंतर उत्तर को जीवंत बनाता है।
प्र2.
2. सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए। (संकेत– लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)
उत्तर

यह प्रश्न एक साथ दो चीज़ें माँगता है — भावों की सूची और सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण। दोनों नीचे अलग-अलग दिए गए हैं।

क — घटना के हर मोड़ पर सीता के मन के भाव

घटना का मोड़सीता के मन का भावकारण
परशुराम का आगमन और उनका कराल वेषआशंका, संकोचसारी सभा भय से खड़ी हो गई — “उठे सकल भय बिकल भुआला॥”
परशुराम का उन्हें आशीर्वाद देनाक्षणिक राहत, कृतज्ञता“आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं।” — लगा कि मुनि प्रसन्न हैं
टूटा धनुष देखकर परशुराम का क्रोधतीव्र भय और व्यग्रता“अरध निमेष कलप सम बीता॥” — आधा पल भी युग जैसा लगने लगा
पिता जनक का ‘जड़’, ‘मूढ़’ कहा जानापीड़ा, लज्जा और असहायतापिता का सार्वजनिक अपमान पुत्री के लिए सबसे कठिन क्षण होता है
“न त मारे जैहहिं सब राजा॥” की धमकीआतंक, अपराध-बोध‘कहीं मेरे स्वयंवर के कारण इतने लोगों पर संकट न आ जाए’
राम का शांत उत्तर — “होइहि केउ एक दास तुम्हारा”गर्व, आश्वस्ति, श्रद्धाजिस सभा में सब काँप रहे थे, वहाँ उनका स्वर स्थिर था
लक्ष्मण का मुसकराना और व्यंग्य करनाएक साथ — हँसी, गर्व, चिंता, भय और शंकाबात सच्ची और साहसी थी, पर उससे आग भड़क सकती थी
“रे नृप बालक काल बस बोलत…”घबराहट और प्रार्थनाअब स्थिति सीधे मृत्यु की चेतावनी तक पहुँच गई

ख — सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण (नमूना उत्तर, प्रथम पुरुष में)

“उस दिन मैं सबसे दूर खड़ी थी, और सबसे पास भी”

सखियाँ मुझे सभा से हटाकर अपने समाज में ले आई थीं। वे समझदार थीं — उन्हें लग रहा था कि वातावरण बिगड़ने वाला है। पर दूर आ जाने से मन थोड़े ही दूर जाता है। मेरे कान वहीं लगे थे, जहाँ मेरी आँखें नहीं पहुँच सकती थीं।

जब मुनि ने आकर मुझे आशीर्वाद दिया था, तब मुझे लगा था कि अब सब शुभ है। मेरी सखियाँ प्रसन्न थीं और मैं भी। पर वह प्रसन्नता कितनी छोटी निकली! कुछ ही क्षणों में उधर से गर्जना सुनाई देने लगी। और जब मैंने सुना कि वे मेरे पिता को ‘जड़’ कह रहे हैं, तो मेरा मन जैसे बैठ गया। मेरे पिता — जिन्हें सारा जगत ‘विदेह’ कहता है, जिनके दरबार में विद्वान बहस करने आते हैं — वे भरी सभा में एक शब्द नहीं बोल पा रहे थे। मैंने अपनी माता की ओर देखा; वे आँचल का कोना मुट्ठी में भींचे खड़ी थीं और होंठों में कुछ बुदबुदा रही थीं — शायद विधाता से शिकायत कर रही थीं।

पर मेरा भय पिता के लिए उतना नहीं था, जितना उनके लिए था जिन्होंने वह धनुष तोड़ा था। मैं उन्हें मन से वर चुकी थी। और अब वही धनुष-भंग, जो मेरे जीवन का सबसे शुभ क्षण था, उनके लिए सबसे बड़ा संकट बन गया था। यह कैसी विडंबना थी! जब मुनि ने कहा कि तोड़ने वाला अलग हो जाए, नहीं तो सब राजा मारे जाएँगे — तब मुझे लगा कि जैसे यह सारा संकट मेरे कारण खड़ा हुआ है। उस समय आधा पल भी मुझे एक कल्प जैसा लगा। मैंने बार-बार सोचा कि यदि यह स्वयंवर न हुआ होता…

फिर उनकी आवाज़ आई। इतनी शांत, इतनी संयत कि मुझे विश्वास नहीं हुआ कि यह उसी सभा से आ रही है जहाँ सब काँप रहे हैं। उन्होंने अपना नाम तक नहीं लिया — कहा कि तोड़ने वाला ‘आपका ही कोई दास’ होगा, और पूछा कि आपकी क्या आज्ञा है। उस क्षण मेरे भीतर भय की जगह गर्व ने ले ली। जो अपने पराक्रम का श्रेय तक न ले, वही तो सच्चा वीर है।

फिर लक्ष्मण बोले। सच कहूँ तो पहले क्षण मुझे उनकी बात पर हँसी आ गई — बड़ी-बड़ी धनुहियाँ तोड़ी हैं, और आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया! सभा भर में जो बात कोई नहीं कह सका, वह उस किशोर ने कह दी। मुझे उन पर गर्व भी हुआ, क्योंकि उन्होंने अपने भाई के लिए बिना डरे मुँह खोला। पर वह हँसी पल-भर की थी। तुरंत मन में शंका उठी — यह बात मुनि को और भड़का देगी। और वैसा ही हुआ। ‘रे नृप बालक, काल बस बोलत तोहि न सँभार’ — यह सुनते ही मेरा गर्व फिर भय में बदल गया।

मैंने हाथ जोड़कर आँखें बंद कर लीं। मैंने कुछ नहीं माँगा — बस इतना कि कोई अनर्थ न हो। और उस पूरे समय मुझे एक बात समझ आई, जो मैं जीवन-भर याद रखूँगी: एक ही सभा में साहस भी था और संयम भी, पर बात सँभली संयम से। लक्ष्मण के साहस ने मेरा मन ऊँचा किया, पर राम के संयम ने सबकी रक्षा की।

लिखते समय ध्यान रखिए: यह प्रश्न ‘सीता के दृष्टिकोण’ से लिखने को कहता है — इसलिए वही बातें आनी चाहिए जो सीता को सुनाई या दिखाई दे सकती थीं। जो बात केवल कवि जानता है (जैसे ‘कुटिल भूप हरषे मन माहीं’), उसे सीता के मुँह से मत कहलाइए — या कहलाइए तो अनुमान के रूप में। यही अच्छे कल्पना-लेखन की कसौटी है।
प्र3.
3. कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।
उत्तर

पहले पाठ पर एक नज़र। सभा में राजाओं ने परिचय इस तरह दिया — “पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यानी उन्होंने अपना नाम और पिता का नाम बताया, अपने कुल और पराक्रम का उल्लेख किया। पर ध्यान दीजिए — यह परिचय भय में दिया गया था और उसका उद्देश्य था स्वयं को सुरक्षित सिद्ध करना। दूसरी ओर, इसी सभा में एक और परिचय हुआ था — विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण का परिचय दिया: “रामु लखनु दसरथ के ढोटा।” यहाँ नाम और कुल तो है, पर आत्म-प्रशंसा एक शब्द भी नहीं। यही ढंग अधिक उचित है।

अच्छे आत्म-परिचय में क्या-क्या होना चाहिए —

बिंदुक्या बताएँक्यों
1. नाम और परिवारअपना नाम, माता-पिता का नाम, निवासयह परिचय की पहली और सबसे स्वाभाविक कड़ी है — पाठ के राजा भी यही करते हैं
2. अध्ययनविद्यालय, कक्षा और प्रिय विषयविद्यार्थी की पहचान का मुख्य आधार
3. रुचियाँजो काम बिना कहे मन से करते हैंरुचि व्यक्तित्व को उपलब्धि से अधिक सच्चाई से बताती है
4. स्वभाव के गुणदो-तीन गुण, हर एक के साथ एक छोटा प्रमाणबिना उदाहरण के बताया गया गुण केवल दावा रह जाता है
5. सीमाएँ और सुधारएक कमज़ोरी और उस पर आप क्या कर रहे हैंयही सबसे बड़ा अंतर है — आत्म-प्रशंसा और आत्म-परिचय के बीच की रेखा
6. लक्ष्य / जीवन-दृष्टिआगे क्या बनना/करना चाहते हैं और क्योंपरिचय को दिशा मिल जाती है

नमूना उत्तर:

“नमस्कार। मेरा नाम अनुराग वर्मा है। मेरे पिता श्री सुरेश वर्मा एक विद्यालय में गणित पढ़ाते हैं और मेरी माता श्रीमती कमला वर्मा गृहिणी हैं। हम कानपुर के गोविंद नगर में रहते हैं। मैं शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की कक्षा नौ का विद्यार्थी हूँ।

मुझे हिंदी और विज्ञान — दोनों पढ़ना अच्छा लगता है, पर सबसे अधिक आनंद मुझे कहानियाँ पढ़ने और लिखने में आता है। पिछले वर्ष हमारी विद्यालय-पत्रिका में मेरी एक कहानी छपी थी, और उस दिन मुझे पहली बार लगा था कि लिखना केवल शौक नहीं, कुछ कहने का रास्ता भी है। खेलों में मुझे कबड्डी पसंद है, क्योंकि उसमें अकेले की नहीं, पूरी टीम की साँस मिलानी पड़ती है।

अपने स्वभाव के बारे में दो बातें मैं विश्वास से कह सकता हूँ। पहली — मैं दिया गया काम समय पर पूरा करता हूँ; पिछली विज्ञान-प्रदर्शनी में हमारे समूह का मॉडल दो दिन पहले तैयार हो गया था। दूसरी — मुझे सुनना अच्छा लगता है; मेरे मित्र प्रायः अपनी परेशानी मुझे बताते हैं, और मैं बिना बीच में टोके सुन लेता हूँ।

पर मुझमें एक कमी भी है, जिसे मैं छिपाना नहीं चाहूँगा — मैं जल्दी घबरा जाता हूँ। मंच पर बोलते समय मेरी आवाज़ काँपने लगती है। इसीलिए इस वर्ष मैंने वाद-विवाद क्लब में नाम लिखवाया है और हर सप्ताह कक्षा के सामने कुछ-न-कुछ बोलने का अभ्यास कर रहा हूँ। पहले से कुछ सुधार हुआ है।

आगे चलकर मैं अध्यापक बनना चाहता हूँ — इसलिए नहीं कि मेरे पिता अध्यापक हैं, बल्कि इसलिए कि मुझे किसी को कुछ समझा पाने में जो संतोष मिलता है, वैसा और किसी काम में नहीं मिलता। धन्यवाद।”

सबसे ज़रूरी बात: परिचय में आत्म-प्रशंसा से बचिए। पाठ के राजा अपनी वीरता और पराक्रम गिनाते हैं, फिर भी परशुराम के सामने एक शब्द नहीं बोल पाते — इससे यही सीख मिलती है कि गिनाया हुआ पराक्रम कठिन क्षण में काम नहीं आता। इसके विपरीत राम अपना नाम तक नहीं लेते और पूरी सभा उन्हें याद रखती है। इसलिए अपने बारे में जो कहें, उसके साथ एक छोटा-सा प्रमाण दीजिए, और अपनी एक कमी बताने से मत हिचकिए — वही आपके परिचय को सच्चा बनाती है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ