गंगा अध्याय 9 मेरी पहेली

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अब अपने समूह में मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों— समाचार, धनुष, मन, नाग, नगर
उत्तर

अच्छी पहेली बनाने के तीन नियम — (1) उत्तर का नाम कहीं न आए; (2) दो-तीन ऐसे संकेत हों जो केवल उसी वस्तु पर ठीक बैठें; (3) अंत में तुक मिले, ताकि पहेली याद रह जाए। नीचे हर शब्द के लिए दो-दो पहेलियाँ दी गई हैं — एक तुकबंद और एक गद्य-रूप की।

उत्तरपहेली (तुकबंद)पहेली (गद्य-रूप)संकेत / पाठ से जोड़
समाचारपाँव नहीं, फिर भी दौड़ूँ सारे गाँव,
कोई सुनकर हँसे, कोई खो दे ठाँव।
काग़ज़ पर छपूँ, हवा में भी जाऊँ,
अच्छा हूँ तो मीठा, बुरा हूँ तो रुलाऊँ।
मैं वह चीज़ हूँ जो सबसे तेज़ चलती है, पर मेरे पैर नहीं हैं। मैं रेडियो में बोलता हूँ, अख़बार में छपता हूँ और मोबाइल में चमकता हूँ। कोई मुझे सुनकर मुसकराता है, कोई रो पड़ता है। बताओ मैं कौन?“समाचार कहि जनक सुनाए।” — इसी समाचार ने तो पूरी सभा का वातावरण बदल दिया था!
धनुषटेढ़ा मेरा शरीर है, सीधा मेरा काम,
डोरी खींचो तो चले, बिना डोरी विश्राम।
राम ने तोड़ा मुझे, अर्जुन ने साधा,
वर्षा में रंगों वाला भाई मेरा आधा।
मैं टेढ़ा रहता हूँ, पर मेरा निशाना सीधा होता है। मेरे साथ एक डोरी रहती है और एक तेज़ नुकीला साथी। मुझे कोई कमान कहता है, कोई चाप। बरसात में आसमान में भी मेरा एक रंगीन रूप दिखाई देता है। बताओ मैं कौन?“कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” — पूरा पाठ इसी एक वस्तु पर टिका है।
मनन दिखूँ, न पकड़ में आऊँ, पर सबके भीतर हूँ,
पल में यहाँ, पल में वहाँ — पवन से भी तेज़ हूँ।
जीत लो तो जीत है, हार लो तो हार,
मुझको साध ले जो, वही सच्चा होशियार।
मैं शरीर में रहता हूँ, पर किसी चीरफाड़ में मिलता नहीं। मैं एक क्षण में हज़ारों कोस चला जाता हूँ। मेरे जीतने पर आदमी जीत जाता है और मेरे हारने पर हार। बताओ मैं कौन?“कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” और लोकोक्ति — ‘मन के जीते जीत है, मन के हारे हार।’
नागपैर नहीं, फिर भी चलूँ, बल खाकर चलूँ,
फन उठाऊँ तो सब डरें, बीन सुनूँ तो झूमूँ।
शिव के गले में सजूँ, बाँबी मेरा घर,
सावन में पूजा जाऊँ — पहचानो सत्वर।
मेरे पैर नहीं हैं, फिर भी मैं तेज़ चलता हूँ। मैं बाँबी में रहता हूँ, बीन की धुन पर झूमता हूँ और भगवान शिव के गले में शोभा पाता हूँ। एक तिथि पर लोग मुझे दूध चढ़ाते हैं। बताओ मैं कौन?“सुर मुनि नाग नगर नर नारी।” — यही वह चौपाई है जिसमें ‘न’ का सुंदर अनुप्रास है।
नगरगाँव से बड़ा हूँ, पर देश से छोटा,
सड़कें मेरी नसें, बाज़ार मेरा जोटा।
दिन-रात जागता हूँ, कभी न लूँ विश्राम,
दिल्ली, पटना, इंदौर — सब मेरे ही नाम।
मैं गाँव से बड़ा हूँ और देश से छोटा। मेरे भीतर मुहल्ले होते हैं, बाज़ार होते हैं और हज़ारों घर होते हैं। मैं रात में भी सोता नहीं, मेरी बत्तियाँ जलती रहती हैं। बताओ मैं कौन?“सुर मुनि नाग नगर नर नारी।” — यहाँ पूरे नगर के स्त्री-पुरुष भयभीत बताए गए हैं।

समूह में यह गतिविधि कैसे कीजिए

  1. कक्षा को पाँच समूहों में बाँटिए और हर समूह को एक शब्द दीजिए।
  2. हर समूह पहले उस शब्द के चार गुण लिखे — वह कैसा दिखता है, क्या करता है, कहाँ मिलता है, उसका क्या असर होता है।
  3. फिर उन गुणों को पहेली की भाषा में बदलिए — यानी ‘मैं’ बनाकर कहिए और नाम कहीं मत आने दीजिए।
  4. अंत की दो पंक्तियों में तुक मिलाइए। तुक मिलाना कठिन लगे तो पहले गद्य-रूप की पहेली बनाइए, फिर उसे तुक में ढालिए।
  5. हर समूह अपनी पहेली कक्षा के सामने पढ़े और बाकी समूह उत्तर बताएँ। सबसे कम संकेतों में बूझी जाने वाली पहेली सबसे अच्छी मानी जाएगी।
पहेली बनाना भाषा का अच्छा अभ्यास क्यों है: पहेली में आपको वस्तु का नाम लिए बिना उसका पूरा वर्णन करना पड़ता है। इसके लिए आपको पर्यायवाची शब्द, विशेषण, तुक और लय — सब का प्रयोग करना पड़ता है। यह ठीक वही काम है जो कवि करता है — जैसे तुलसीदास ने ‘परशुराम’ कहे बिना ‘भृगुपति’, ‘परसुधर’ और ‘भृगुकुलकेतू’ कहकर उन्हीं का चित्र खींच दिया।
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