प्र1.
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं? 1. “पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है? (क) आदर और सम्मान (ख) भक्ति और श्रद्धा (ग) भय और शिष्टाचार (घ) प्रेम और सहिष्णुता
उत्तर
सटीक उत्तर — (ग) भय और शिष्टाचार।
यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: इस पंक्ति को उससे ठीक पहले वाली पंक्ति के साथ पढ़िए — “देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥” यानी राजा उठे ही भय से व्याकुल होकर थे। उसी अवस्था में वे पिता के नाम सहित अपना-अपना नाम कह-कहकर दंडवत् प्रणाम करने लगते हैं। बाहर से यह क्रिया पूरी तरह शिष्टाचार की है — नाम बताना, कुल बताना, साष्टांग प्रणाम करना। पर इसके पीछे का भाव भय है, श्रद्धा नहीं। ‘पितु समेत’ जोड़ने का कारण भी यही है — वे यह जताना चाहते हैं कि हम कुलीन हैं, हमसे कोई अपराध नहीं हुआ। और ‘कहि कहि’ की पुनरुक्ति बताती है कि यह सब घबराहट में, जल्दी-जल्दी हो रहा था। तीसरी चौपाई इस पर मुहर लगा देती है — जिसे परशुराम हितैषी जानकर भी देख लेते, वह समझता कि मानो उसकी आयु ही पूरी हो आई। इसलिए इस पंक्ति की मनःस्थिति ‘भय और शिष्टाचार’ ही है — भीतर डर, बाहर आदर।
| विकल्प | सही / ग़लत | कारण |
|---|---|---|
| (क) आदर और सम्मान | ग़लत | केवल आदर होता तो ‘भय बिकल’ शब्द न आते। सच्चा आदर व्याकुलता पैदा नहीं करता; वह शांत होता है। यहाँ राजा बैठे नहीं रह सके, यही बताता है कि यह आदर स्वतःस्फूर्त नहीं था। |
| (ख) भक्ति और श्रद्धा | ग़लत | भक्ति और श्रद्धा में मन प्रसन्न होता है, जबकि यहाँ पूरी सभा में त्रास फैला है — “सोचहिं सकल त्रास उर भारी”। परशुराम इन राजाओं के आराध्य नहीं, भय का कारण हैं। |
| (ग) भय और शिष्टाचार | सही ✓ | ‘भय बिकल भुआला’ (भय) + ‘दंड प्रनामा’ और ‘पितु समेत निज नामा’ (शिष्टाचार) — दोनों तत्त्व पाठ में सीधे मौजूद हैं। यही एकमात्र विकल्प है जो पंक्ति के दोनों पक्षों को समेटता है। |
| (घ) प्रेम और सहिष्णुता | ग़लत | पूरे प्रसंग में प्रेम का कोई संकेत नहीं है, और सहिष्णुता का तो प्रश्न ही नहीं उठता — राजा कुछ सह नहीं रहे, वे केवल स्वयं को बचा रहे हैं। सहिष्णुता तो आगे राम के व्यवहार में दिखती है, इन राजाओं में नहीं। |