गंगा अध्याय 9 मेरे उत्तर मेरे तर्क

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं? 1. “पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है? (क) आदर और सम्मान (ख) भक्ति और श्रद्धा (ग) भय और शिष्टाचार (घ) प्रेम और सहिष्णुता
उत्तर

सटीक उत्तर — (ग) भय और शिष्टाचार

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: इस पंक्ति को उससे ठीक पहले वाली पंक्ति के साथ पढ़िए — “देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥” यानी राजा उठे ही भय से व्याकुल होकर थे। उसी अवस्था में वे पिता के नाम सहित अपना-अपना नाम कह-कहकर दंडवत् प्रणाम करने लगते हैं। बाहर से यह क्रिया पूरी तरह शिष्टाचार की है — नाम बताना, कुल बताना, साष्टांग प्रणाम करना। पर इसके पीछे का भाव भय है, श्रद्धा नहीं। ‘पितु समेत’ जोड़ने का कारण भी यही है — वे यह जताना चाहते हैं कि हम कुलीन हैं, हमसे कोई अपराध नहीं हुआ। और ‘कहि कहि’ की पुनरुक्ति बताती है कि यह सब घबराहट में, जल्दी-जल्दी हो रहा था। तीसरी चौपाई इस पर मुहर लगा देती है — जिसे परशुराम हितैषी जानकर भी देख लेते, वह समझता कि मानो उसकी आयु ही पूरी हो आई। इसलिए इस पंक्ति की मनःस्थिति ‘भय और शिष्टाचार’ ही है — भीतर डर, बाहर आदर।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) आदर और सम्मानग़लतकेवल आदर होता तो ‘भय बिकल’ शब्द न आते। सच्चा आदर व्याकुलता पैदा नहीं करता; वह शांत होता है। यहाँ राजा बैठे नहीं रह सके, यही बताता है कि यह आदर स्वतःस्फूर्त नहीं था।
(ख) भक्ति और श्रद्धाग़लतभक्ति और श्रद्धा में मन प्रसन्न होता है, जबकि यहाँ पूरी सभा में त्रास फैला है — “सोचहिं सकल त्रास उर भारी”। परशुराम इन राजाओं के आराध्य नहीं, भय का कारण हैं।
(ग) भय और शिष्टाचारसही ✓‘भय बिकल भुआला’ (भय) + ‘दंड प्रनामा’ और ‘पितु समेत निज नामा’ (शिष्टाचार) — दोनों तत्त्व पाठ में सीधे मौजूद हैं। यही एकमात्र विकल्प है जो पंक्ति के दोनों पक्षों को समेटता है।
(घ) प्रेम और सहिष्णुताग़लतपूरे प्रसंग में प्रेम का कोई संकेत नहीं है, और सहिष्णुता का तो प्रश्न ही नहीं उठता — राजा कुछ सह नहीं रहे, वे केवल स्वयं को बचा रहे हैं। सहिष्णुता तो आगे राम के व्यवहार में दिखती है, इन राजाओं में नहीं।
प्र2.
2. “जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है? (क) संवेदनशीलता (ख) शिष्टता (ग) सहनशीलता (घ) उदासीनता
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) शिष्टता

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: इस पंक्ति में जनक तीन काम करते हैं और तीनों शिष्टाचार के हैं — स्वयं आना, सिर नवाना और पुत्री को बुलाकर उससे भी प्रणाम करवाना। ध्यान रखिए कि जनक इस सभा के राजा और मेज़बान हैं; चाहते तो अपने सिंहासन पर बैठे-बैठे स्वागत कर सकते थे। पर वे उठकर आते हैं। यही मर्यादा का पूरा-पूरा निर्वाह है और इसी को ‘शिष्टता’ कहते हैं। पुत्री से प्रणाम करवाना भी उसी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें घर के बड़े अतिथि को आशीर्वाद देने का अवसर देते हैं — और उसका फल तुरंत मिलता भी है: “आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं।” यानी जनक का व्यवहार केवल औपचारिक नहीं, फलदायी भी सिद्ध होता है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) संवेदनशीलताग़लतसंवेदनशीलता का अर्थ है दूसरों के दुख-सुख को गहराई से अनुभव करना। इस पंक्ति में जनक किसी की भावना नहीं पढ़ रहे; वे अतिथि-सत्कार का नियम निभा रहे हैं। संवेदनशीलता का पक्ष कविता में सुनयना और सीता के प्रसंग में दिखता है, यहाँ नहीं।
(ख) शिष्टतासही ✓‘आइ’, ‘सिरु नावा’, ‘प्रनामु करावा’ — तीनों क्रियाएँ मर्यादा और सभ्य आचरण की हैं। एक राजा का स्वयं उठकर प्रणाम करना शिष्टता की सबसे स्पष्ट पहचान है।
(ग) सहनशीलताग़लतसहनशीलता तब दिखती जब जनक कुछ कठोर सुनकर चुप रहते। इस पंक्ति तक परशुराम ने कुछ कहा ही नहीं है। जनक की सहनशीलता आगे दिखती है — “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं” — पर वह इस पंक्ति का विषय नहीं है।
(घ) उदासीनताग़लतयह विकल्प तो पंक्ति के ठीक उलटा है। उदासीन व्यक्ति न स्वयं आता, न प्रणाम करता, न पुत्री को बुलाता। जनक तीनों काम करते हैं, इसलिए उदासीनता का प्रश्न ही नहीं उठता।
प्र3.
3. “अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था— (क) उचित आदर-सत्कार न मिलना (ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना (ग) शिव-धनुष का खंडित होना (घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
उत्तर

सटीक उत्तर — (ग) शिव-धनुष का खंडित होना

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: इसका प्रमाण ठीक पिछली चौपाई में है — “सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥” यानी क्रोध का विस्फोट उसी क्षण होता है जब परशुराम की दृष्टि धरती पर बिखरे धनुष के टुकड़ों पर पड़ती है। जब तक उन्होंने टूटा धनुष नहीं देखा था, तब तक वे आशीर्वाद तक दे रहे थे — “दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥” पूरे पाठ में उनका क्रोध लगातार धनुष से ही जुड़ा रहता है — “कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा”, “जेहिं सिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा”, “धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार”। ‘मूल कारण’ का अर्थ है — जड़ में क्या है; और जड़ में शिव-धनुष का खंडित होना ही है, क्योंकि शिव उनके आराध्य हैं और वह धनुष उनके लिए पूज्य है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) उचित आदर-सत्कार न मिलनाग़लतपाठ इसका ठीक उलटा कहता है। सभी राजाओं ने नाम ले-लेकर दंडवत् किया, जनक स्वयं आकर सिर नवाकर गए, सीता ने प्रणाम किया और विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को चरणों में डाल दिया। आदर में कहीं कोई कमी नहीं रही।
(ख) जनक द्वारा समाचार छिपानाग़लतजनक ने कुछ छिपाया ही नहीं — “समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥” उन्होंने पूछे जाने पर पूरी बात सच-सच बता दी। क्रोध इसी सच को सुनने और टूटा धनुष देखने के बाद आया।
(ग) शिव-धनुष का खंडित होनासही ✓“देखे चापखंड महि डारे॥” के तुरंत बाद “अति रिस बोले बचन कठोरा” आता है — कारण और परिणाम एक-दूसरे से सटे हुए हैं। शिव परशुराम के आराध्य हैं; उनके धनुष का टूटना उनके लिए व्यक्तिगत और धार्मिक — दोनों तरह की चोट है।
(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थितिग़लतराजाओं की उपस्थिति से परशुराम को कोई आपत्ति नहीं है; उन्होंने तो केवल यह पूछा था कि इतनी भीड़ किसलिए है। और जब जनक ने बता दिया कि स्वयंवर के कारण सब आए हैं, तो उस पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी — प्रतिक्रिया टूटे धनुष पर दी।
प्र4.
4. राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है? (क) कूटनीति और चतुराई (ख) विनम्रता और मर्यादा (ग) त्याग और समर्पण (घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) विनम्रता और मर्यादा

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: इस एक वाक्य में राम तीन काम एक साथ करते हैं। पहला — वे सच स्वीकार करते हैं कि धनुष टूटा है; झूठ नहीं बोलते। दूसरा — वे अपना नाम नहीं लेते, कहते हैं ‘केउ एक’ — कोई एक। तीसरा — जिसे भी तोड़ने वाला बताते हैं, उसे ‘दास तुम्हारा’ बताते हैं, यानी स्वयं को परशुराम से नीचे रखते हैं। साथ ही वे उन्हें ‘नाथ’ कहकर संबोधित करते हैं — सामने वाले को ऊपर उठाना और स्वयं को नीचे रखना, यही विनम्रता है। और अगली ही पंक्ति में वे कहते हैं — “आयसु काह कहिअ किन मोही” यानी ‘आपकी आज्ञा क्या है, मुझसे क्यों नहीं कहते?’ बड़ों से आज्ञा माँगना मर्यादा है। पुस्तक की ‘विषयों से संवाद’ वाली टिप्पणी भी यही कहती है कि परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदात्त चरित्र का पता चलता है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) कूटनीति और चतुराईग़लतकूटनीति में सत्य छिपाया जाता है और अपना लाभ साधा जाता है। राम सत्य छिपाते नहीं — वे स्वीकार कर लेते हैं कि धनुष टूट चुका है और तुरंत स्वयं को प्रस्तुत भी कर देते हैं (‘मुझसे क्यों नहीं कहते’)। यह चतुराई नहीं, शालीनता है।
(ख) विनम्रता और मर्यादासही ✓‘नाथ’ (आदर), ‘दास तुम्हारा’ (स्वयं को नीचे रखना), अपना नाम न लेना, और आज्ञा माँगना — चारों प्रमाण एक साथ इसी विकल्प की ओर जाते हैं।
(ग) त्याग और समर्पणग़लतत्याग का अर्थ है अपना कुछ छोड़ना और समर्पण का अर्थ है स्वयं को सौंप देना। यहाँ राम कुछ त्याग नहीं रहे, न ही आत्म-समर्पण कर रहे हैं। वे केवल बात कहने का शालीन ढंग चुन रहे हैं।
(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वासग़लतराम में ये गुण अवश्य हैं — “हृदयँ न हरषु बिषादु कछु” उसी का प्रमाण है — पर इस विशेष कथन में वे प्रकट नहीं होते। दृढ़ता का स्वर तो लक्ष्मण के उत्तर में सुनाई देता है। प्रश्न इसी कथन के बारे में है, इसलिए उत्तर वही होगा जो कथन के शब्दों से सिद्ध हो।
प्र5.
5. “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था? (क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे। (ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था। (ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे। (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
उत्तर

सटीक उत्तर — (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: लक्ष्मण ठीक उस समय बोलते हैं जब परशुराम धमकी दे चुके होते हैं — “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” यानी तोड़ने वाला सामने आ जाए, नहीं तो सब राजा मारे जाएँगे। इस धमकी को लक्ष्मण स्वीकार नहीं करते, और अस्वीकार का पहला संकेत उनकी मुसकान है। सारी सभा काँप रही है, जनक निरुत्तर हैं — और लक्ष्मण मुसकरा रहे हैं। मुसकान का यहाँ एक ही अर्थ है: ‘मैं तुम्हारी धमकी को धमकी मानता ही नहीं।’ फिर वे शिव-धनुष को ‘धनुही’ बताकर उसका महत्व घटा देते हैं और पूछते हैं ‘एहि धनु पर ममता केहि हेतू’ — यानी क्रोध का आधार ही खोखला बता देते हैं। कवि स्वयं लिख देता है — ‘अपमाने’। पुस्तक की ‘कविता का सौंदर्य’ वाली भूमिका भी यही कहती है कि “परशुराम के रोष भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं” — और उत्तर देना ही यहाँ चुनौती देना है। इसकी पुष्टि परशुराम की प्रतिक्रिया से भी होती है: वे इसे चुनौती ही समझते हैं और तुरंत मृत्यु की चेतावनी देते हैं — “रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।”
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।ग़लतलक्ष्मण अपने बारे में एक शब्द नहीं कहते। उनका पूरा कथन दूसरे पक्ष पर केंद्रित है — धनुष का महत्व और परशुराम की ‘ममता’। ‘बहु धनुहीं तोरीं’ में भी वे ‘मैंने’ नहीं, ‘हमने’ कहते हैं, यानी दोनों भाइयों की बात करते हैं। आत्म-प्रदर्शन का कोई संकेत नहीं है।
(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।ग़लतभ्रातृ-प्रेम उनके भीतर अवश्य है और वही उन्हें साहस देता है — पर प्रदर्शन उनका उद्देश्य नहीं है। प्रेम दिखाना होता तो वे राम की प्रशंसा करते या उनका बचाव करते। वे इसके बजाय सीधे परशुराम के तर्क पर चोट करते हैं। प्रेम कारण की पृष्ठभूमि है, पर तात्कालिक कारण चुनौती ही है।
(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।ग़लतयह विकल्प सबसे भ्रामक है, पर पाठ इसे काट देता है। लक्ष्मण उन्हें ‘गोसाईं’ कहकर संबोधित करते हैं — यानी वे जानते हैं कि सामने कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। यदि वे अनजान होते तो ‘कबहुँ न असि रिस कीन्हि’ जैसी बात न कह पाते, जिसमें परशुराम के प्रसिद्ध क्रोधी स्वभाव की ओर संकेत है। वे सब जानते हैं और जानते हुए बोलते हैं — यही उनकी निर्भीकता है।
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।सही ✓धमकी के तुरंत बाद मुसकान, फिर धनुष को ‘धनुही’ कहकर उसका महत्व गिराना, फिर ‘ममता’ पर प्रश्न — यह क्रम स्पष्ट चुनौती का है। कवि का अपना शब्द ‘अपमाने’ और परशुराम की प्रतिक्रिया ‘रे नृप बालक’ दोनों इसे प्रमाणित करते हैं।
ध्यान दीजिए: ‘मुसकराना’ इस पाठ का सबसे अर्थपूर्ण शब्द है। सोचिए — यदि लक्ष्मण क्रोध में चिल्लाकर बोलते, तो वह केवल एक और क्रोधी आवाज़ होती। मुसकराकर बोलने से उनका उत्तर अधिक तीखा हो जाता है, क्योंकि उसमें भय का पूर्ण अभाव दिखाई देता है।
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